Friday, 31 March 2017

एन्टी करप्शन ब्‍यूरो विरूद्ध माधव सिंह चन्देल

प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्य एवं दस्तावेजां से यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त का, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के तहत् आपराधिक अवचार का अपराध कारित करने का आपराधिक आशय था । विवेचना एवं विचारण की कार्यवाही में कुछ विसंगतियां दर्शित हुई हैं, किन्तु उक्त विसंगतियां तात्विक नहीं हैं । अभियोजन द्वारा आरोपित अपराध के आवश्यक तत्वों की पूर्ति किया गया है । इस प्रकार अभियोजन द्वारा आरोपित अपराध को सन्देह से परे प्रमाणित किया गया है । अतएव विचारणीय बिंदु क्रमांक-1 से 3 का निष्कर्ष ’’प्रमाणित’’ में दिया जाता है, अतः अभियुक्त को आरोपित अपराध, अंतर्गत धारा-7 एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, में दोष-सिद्ध पाया जाता है । 


न्यायालय : विशेष न्यायाधीश (भ्रष्‍टाचार निवारण अधिनियम), दुर्ग (छ.ग.) 
(पीठासीन अधिकारी : सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू) 
विशेष प्रकरण क्रमांक-03/2005 
संस्थित दिनांक : 24-09-2005 (सी.आई.एस.नं.102000000212005) 
छत्तीसगढ़ शासन, द्वारा : पुलिस अधीक्षक,
एन्टी करप्शन ब्‍यूरो, रायपुर (छ.ग.)                                                     ..... अभियोजन
।। विरूद्ध ।। 
माधव सिंह चन्देल आत्मज स्व0 नेपाल सिंह चन्देल,
वर्तमान उम्र करीब 49 वर्ष, तत्कालीन पटवारी,
प.ह.नं. 43, ग्राम सुरडुंग, रा.नि.मं.अहिवारा,
तहसील धमधा, जिला दुर्ग
वर्तमान पता : कैलाशनगर, कुम्हारी, जिला दुर्ग (छ.ग.)                               ..... अभियुक्त
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एन्टी करप्शन ब्यूरो, रायपुर द्वारा पंजीबद्ध अपराध क्रमांक-11/2003 से उद्भुत विशेष प्रकरण । 
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राज्य की ओर से सुश्री फरिहा अमीन, विशेष लोक अभियोजक । अभियुक्त की ओर से श्री विवेक शर्मा एवं श्री उपेन्द्र सिंह, अधिवक्तागण 
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।। निणर्य ।। 
(आज दिनांक 30-03-2017 का घोषित किया गया) 

1- अभियुक्त के विरूद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा-7, 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के अंतर्गत यह आरोप है कि उसने दिनांक 30-12-2003 को छत्तीसगढ़ शासन के अंतर्गत पटवारी, जो कि लोक-सेवक का पद है, पर पदस्थ रहकर अपने पदीय हैसियत से कार्य करते हुए ग्राम सुरडुंग, जिला दुर्ग स्थित कृषि भूमि के सम्बंध में प्रार्थी अर्जुन साहू से उसकी खानदानी जमीन के प्रमाणीकरण के कार्य सम्पादन हेतु वैध पारिश्रमिक से भिन्न 2,000/-रुपये रिश्वत की मांग कर प्राप्त किया तथा उक्त वैध पारिश्रमिक से भिन्न अवैध रूप से 2,000/-रुपये की रिश्वत प्राप्त कर आपराधिक कदाचरण किया । 


2- अभियोजन कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि ग्राम खेरधा, पोस्ट सुरडुंग निवासी अर्जुन साहू द्वारा पुलिस अधीक्षक, एन्टी करप्शन ब्यूरो, रायपुर के समक्ष लिखित में आवेदन प्रस्तुत किया गया कि वे लाग तीन भाईयों के बंटवारा के लिये वर्ष 2002 में 5,000/-रुपये में पटवारी से बात तय किये थे । पटवारी माधव सिंह चन्देल ने 5,000/-रुपये रिश्वत लेकर उनकी जमीन का खाता फोड़कर तीन हिस्सा कर दिया और 06 माह पहले जून में तीनां भाईयां को ऋण पुस्तिका भी दे दिया था। उनके पुराने ब्यारा से लगी जमीन 06 डिसमिल है, जिसे उनकी मॉं ने 20 वर्ष पूर्व खरीदा था, उसका प्रमाणीकरण अभी तक नहीं कराया गया है । इसी जमीन के लिये उसने पटवारी से याचना किया, तो पहले वह टरकाता रहा, फिर बार-बार बोलने पर कहता है कि 2,000/-रुपये रिश्वत दोगे तभी प्रमाणीकरण करूंगा और उस जमीन का स्टॉम्प, खसरा की नकल और उसके मझले भाई राजकुमार साहू के नाम की ऋण पुस्तिका को भी मांगकर पटवारी ने अपने पास रख लिया है । प्रमाणीकरण के लिये 2,000/-रुपये रिश्वत लेकर कल दिनांक 31-12-2003 को सुबह 9.00 बजे उसके सुरडुंग के ऑफिस में बुलाया है । वह रिश्वत नहीं देना चाहता है, पटवारी माधव सिंह चन्देल का रिश्वत लेते हुये रंगेहाथों पकड़वाना चाहता है । प्रार्थी की उपरोक्त शिकायत का जांच हेतु पुलिस अधीक्षक द्वारा निरीक्षक नवीनशंकर चौबे को दिया गया, जिसे शून्य पर प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी-16 दर्ज किया गया । उसके पश्चात् पंच साक्षियों का तलब कर ट्रेप दल का गठन किया गया तथा योजना बनाकर ट्रेप आयाजित किया गया । पंच साक्षियों का परिचय प्रार्थी से कराया गया तथा प्रार्थी के आवेदन को पंच साक्षियों का प्रार्थी से पूछताछ करने और जानकारी लेने के लिये दिया गया तथा उनके सन्तुष्ट हाने पर साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा 500-500 रुपये के चार नोटों का नम्बर लिखा गया तथा प्रारम्भिक पंचनामा कार्यवाही की गई, जिसमें प्रार्थी सहित पंचसाक्षियों का शिवबदन मिश्रा, आरक्षक द्वारा यह जानकारी दी गई कि सोडियम कार्बोर्नेट के घोल में फिनॉफ्थलीन पाउडर लगे हाथ अथवा नोट को डुबाने पर घोल के रंग में कैसा परिवर्तन आता है । 
3- घटना के अनुक्रम में नोटों पर पाउडर लगाकर पंच साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा प्रार्थी की तलाशी लेकर उसकी शर्ट की ऊपरी बांयी जेब में रिश्वती नोटों को रख दिया गया और उसे हिदायत दी गई कि रिश्वत देने के बाद सिर में बंधे गमछे को खोलकर इशारा करेगा । दिनांक 31-12-2003 को प्रार्थी द्वारा पटवारी के कार्यालय में जाकर उसे रिश्वती रकम देकर बाहर आकर गमछे से इशारा करने पर अभियुक्त माधव सिंह चन्देल का 2,000/-रुपये रिश्वत लेते ट्रेप दल के सदस्यों द्वारा रंगेहाथों पकड़ा गया। प्रार्थी द्वारा दिये गये रिश्वती रकम को आरोपी से बरामद किया गया । सोडियम कार्बोनेट के घोल में आरोपी का हाथ धुलवाने पर घोल का रंग गुलाबी हा गया, जिसे सीलबंद किया गया । पंच साक्षी शमीमुद्दीन की जामा-तलाशी अन्य पंच साक्षी रणवीर सिंह से कराकर जामातलाशी पंचनामा प्रदर्श पी-4 तैयार किया गया । पंच साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा आरोपी द्वारा थैले के अन्दर रखी गई राजकुमार की ऋण पुस्तिका निकलवाने पर पृष्ठ क्रमांक-2 और 3 के बीच 500-500 के चार नोट रखे मिले, जिसके नम्बरों का मिलान करने पर वही नम्बर पाये गये, जिसे पूर्व में लिखकर रखा गया था । जप्तशुदा रिश्वती नोटों, ऋण पुस्तिका तथा प्रार्थी के हाथां की उंगलियों को डुबाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया । मौके पर कार्यवाही का पंचनामा तैयार किया गया। घोल प्रदर्शन कार्यवाही एवं आरोपी द्वारा रिश्वती रकम लेने के उपरान्त तैयार किये गये समस्त घोलों का रासायनिक परीक्षण कराया गया । अभियुक्त के विरुद्ध आरोप सबूत पाये जाने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7, 13(1) डी सहपठित धारा-13(2) के अंतर्गत अपराध क्रमांक-11/2003 पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना के अनुक्रम में प्रार्थी की शिकायत से सम्बंधित जांच रिपोर्ट के दस्तावेज जप्त किये गये। आरोपी की सेवा-पुस्तिका तथा पदस्थापना सम्बंधी आदेश एवं अन्य आवश्यक दस्तावेज व जानकारियां एकत्रित की गई । प्रार्थी सहित साक्षियों के कथन लेखबद्ध किये गये तथा आरोपी के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति प्राप्त की गई। आरापी को गिरफ्तार किया गया तथा अपराध सबूत पाये जाने पर अन्य आवश्यक विवेचना उपरान्त अभियुक्त के विरुद्ध अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया, जो विशेष प्रकरण क्रमांक-03/2005 के रूप में पंजीबद्ध हुआ । 
4- तत्कालीन पीठासीन अधिकारी द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा-7, 13(1) डी सहपठित धारा-13(2) का आरोप विरचित किया जाकर, पढकर सुनाये व समझाये जाने पर अभियुक्त ने आरोप अस्वीकार करते हुये विचारण किये जाने का निवेदन किया। 
5- अभियोजन की ओर से अपने पक्ष-समर्थन में साक्षी अरविन्द कुमार शर्मा, पटवारी (अ.सा-1), रणवीर सिंह, पंच साक्षी (अ.सा-2), अरुण कुमार मिश्रा (असा-3), सैय्यद शमीमुद्दीन, पंच साक्षी (अ.सा-4), जे.एस.राजूपत (अ.सा-5), अर्जुन साहू, प्रार्थी (अ.सा-6), रामकुमार शर्मा (अ.सा-7), मनहरण लाल (अ.सा-8), नवीनशंकर चौबे (अ.सा-9) एवं शिवबदन मिश्रा (अ.सा-10) का कथन कराया गया है। 


6- अभियोजन की ओर से घटनास्थल का नजरी नक्शा प्रदर्श पी-1, घोल प्रदर्शन की जप्ती प्रदर्श पी-2, प्रारम्भिक पंचनामा प्रदर्श पी-3, पंच साक्षी का जामा तलाशी प्रदर्श पी-4, रिश्वती रकम का जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-5, दस्तावेजों की जप्ती प्रदर्श पी-6, कार्यवाही के दौरान घोलों की जप्ती प्रदर्श पी-7, अभियुक्त का गिरफ्तारी पंचनामा प्रदर्श पी-8, घटनास्थल का कार्यवाही पंचनामा प्रदर्श पी-9, अभियोजन स्वीकृति आदेश प्रदर्श पी-10 से प्रदर्श पी-12, प्रार्थी का आवेदन प्रदर्श पी-14, अभियाग-पत्र प्रदर्श पी-15, प्रथम सूचना प्रतिवेदन प्रदर्श पी-16, अभियुक्त का जमानतनामा/मुचलकानामा प्रदर्श पी-17 व प्रदर्श पी- 18 को प्रदर्शांकित कराया गया है। 
7- अभियोजन साक्षियों के कथनों के उपरान्त, धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अभियुक्तगण का परीक्षण कराया गया । धारा-233 दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबंधों के अनुसार प्रतिरक्षा में प्रवेश कराये जाने पर अभियुक्तगण ने अभियोजन साक्षियों के कथनों को झूठा फंसाने का कथन करते हुए प्रतिरक्षा में साक्षी अरविन्द कुमार शर्मा (ब.सा-1), किशोर कुमार वर्मा (ब.सा-2), दधीचि सिंह (बसा-3) एवं श्रीकान्त वर्मा (ब.सा-4) का कथन कराया गया है । 
8- इस प्रकरण में साक्षी अरविन्द कुमार शर्मा का अभियोजन साक्षी क्रमांक-1 तथा बचाव साक्षी क्रमांक-1 के रूप में साक्ष्य अभिलिखित किया गया है । अभियोजन साक्ष्य के दौरान पंच साक्षी अ.सा-2 रणवीर सिंह के पुलिस बयान प्रदर्श डी-1 राजस्व विभाग से ए.सी.बी. को भेजा गया पत्र, प्रदर्श डी-2 नामान्तरण पंजी के पृष्ठ क्रमांक-12 में की गई प्रविष्टि प्रदर्श डी-1ए प्रदर्श अंकित किया गया है। 
9- प्रकरण के निराकरण के लिये विचारणीय बिंदु यह है कि :- 
1. क्या अभियुक्त द्वारा स्वैच्छिक रूप से प्रार्थी अर्जुन साहू से वैध पारिताषिक से भिन्न राशि का मांग किया गया ? 
2. क्या अभियुक्त के लोक-सेवक के पद पर पदस्थ रहते हुये पदीय कर्तव्य के निर्वहन में अवैध पारिश्रमिक के मांग के लिये प्रार्थी अर्जुन साहू का कोई कार्य लम्बित था ? 
3. क्या उक्त कार्य के दौरान अभियुक्त ने 2,000/-रुपये रिश्वत को स्वेच्छया स्वीकार कर, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7, 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के तहत् अपराध कारित किया ? 
।। निष्‍कर्ष के आधार ।। 
विचारणीय बिंदु क्ररमांक-1 से 3 पर निष्कर्ष :- 
10- अभियुक्त की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया है कि आरोप प्रमाणित करने के लिये स्वैच्छिक मांग व स्वीकृति तथा उद्देश्य का साक्ष्य एवं दस्तावेज से प्रमाणित करना होगा। सर्वप्रथम प्रार्थी द्वारा 20 वर्ष पूर्व जमीन खरीदना और उसका प्रमाणीकरण कराने का कार्य होने का कथन किया गया है । प्रार्थी ने अपने भाई के कहने पर पैसे देने का कथन किया है तथा स्वयं 5,000/-रुपये न देकर उसके मंझले भाई द्वारा 5,000/-रुपये देने का कथन किया है । उसके भाई ने उसे 5,000 रुपये क्यों दिया, इसका कारण भी नहीं बताया है । अभियुक्त द्वारा 2,000/- रुपये मांगने के समय तथा 15-20 बार घुमाने का उल्लेख, आवेदन में नहीं है । ब्यारा के सम्बंध में 2,000/-रुपये की मांग का कथन किया गया है, किन्तु प्रार्थी ने कथन किया है कि ब्यारा उसका नहीं है । प्रार्थी का आरोपी द्वारा रिश्वत की मांग के सम्बंध में दिया गया साक्ष्य शंकापूर्ण है और न ही आरापी के पास उसका कोई व्यक्तिगतकार्य लम्बित था । प्रार्थी ने टेप में कही गई बातें उसके सामने लिखे जाने की बात याद नहीं होने का कथन किया है और यह भी कथन किया है कि अभियुक्त की जेब से रकम बरामद नहीं हुआ था और उसने ऋण पुस्तिका में आरोपी द्वारा पैसे का लपेटकर बैग में रखने की बात नहीं बतायी थी । रिश्वती रकम लेनदेन की बातचीत को रिकार्ड करने के लिये उसे टेपरिकार्डर नहीं दिया गया था । ए.सी.बी. द्वारा तैयार किये गये दस्तावेजां को प्रार्थी ने बिना पढ़े हस्ताक्षर किया था । प्रार्थी के भाई राजकुमार ने आरापी द्वारा 2,000/-रुपये की मांग किये जाने का कथन किया है, परन्तु राजकुमार का साक्ष्य न्यायालय में नहीं कराया गया है । अभियोजन ने रिश्वती रकम झोले में कैसे आया, इसे प्रमाणित नहीं किया है । अभियोजन साक्षियों के साक्ष्य से स्पष्ट है कि प्रार्थी द्वारा पैसा मांगने पर आरोपी का पैसा दिया गया, इस सम्बंध में विरोधाभास है । 


11- यह भी तर्क किया गया है कि प्रार्थी ने पूर्व रंजिशवश मनहरण लाल के कहने पर आरोपी को झूठा फंसाया है । रिश्वती रकम व झोले की जप्ती प्रमाणित नहीं हुई है । अभियाजन द्वारा आवेदन प्राप्त करने से लेकर प्रारम्भिक कार्यवाही व ट्रेप के पश्चात् की गई कार्यवाही में अनियमितता की गई है, जिससे अभियोजन-पक्ष संदिग्ध हो गया है । प्रार्थी और आरोपी के बीच रिश्वती रकम के लेनदेन और बातचीत को देखा-सुना नहीं गया है, जिससे आरोपी द्वारा प्रार्थी से रिश्वत की मांग की बात प्रमाणित नहीं है । अभियुक्त के हाथां को धुलवाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी होने से उसके दोषी हाने की उपधारणा नहीं की जा सकती है, अन्य कारणों से भी हाथ धुलवाये जाने पर गुलाबी रंग आ सकता है । अभियोजन स्वीकृति के साक्षी ने अभियोजन स्वीकृति आदेश का प्रदर्श अंकित किया है । अभियोजन स्वीकृति देने वाले अधिकारी के साक्ष्य के अभाव में अभियाजन स्वीकृति प्रमाणित नहीं है, जिसके आधार पर भी अभियुक्त दोषमुक्त किये जाने का अधिकारी है। अभियोजन, अभियुक्त के विरुद्ध आराप प्रमाणित करने में असफल रहा है । यदि अभियुक्त के विरुद्ध अभियोजन साक्ष्य से दो दृष्टिकोण उत्पन्न हो रहे हों, तो अभियुक्त सन्देह का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है, अतः अभियुक्त को आरोप से दोषमुक्त किया जावे। 
12- अभियुक्त की ओर से समर्थन में न्याय दृष्टान्त शिवकुमार विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य (अब छत्तीसगढ़) 2015(5) सी.जी.एल.जे. 315, यशवन्त राव मराठा विरुद्ध म.प्र.राज्य (अब छत्तीसगढ़) 2012(1) सी.जी.एल.जे. 132, केरल राज्य एवं अन्य विरुद्ध सी.पी.राव, (2011) 6 सुप्रीम कोर्ट केसेस 450, रामकुमार वर्मा विरुद्ध म.प्र.राज्य 2010(1) सी.जी.एल.जे. 68, महाराष्ट्र राज्य विरुद्ध दयानेश्वर लक्ष्मण राव वानखेड़े 2010(1) सी.जी.एल.जे. 384 (एस.सी.), म.प्र.राज्य (अब छत्तीसगढ़) विरुद्ध विजय कुमार, 2007(2) सी.जी.एल.जे. 536, वी.वेंकट सुब्बाराव विरुद्ध आंध्रप्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 2007 सुप्रीम कोर्ट 489, श्रीमती मीना बलवन्त हेमके विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर. 2000 सुप्रीम कार्ट 3377, एम.के.हर्षन विरुद्ध केरल राज्य, (1996) 11 सुप्रीम कोर्ट केसेस 720, पन्नालाल दामोदर राठी विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, (1979) 4 सुप्रीम कोर्ट केसेस 526, नामदेव दौलत दयागुडे़ एवं अन्य विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर. 1977 सु.को. 381, सी.बी.आई. विरुद्ध अशोक कुमार अग्गरवाल, 2014 क्रि.लॉ.ज. 930, दीवानचंद विरुद्ध राज्य, 1982 क्रि.लॉ.ज. 720, निरंजन खटुवा विरुद्ध उड़ीसा राज्य, 1990 क्रि.लॉ.ज. 2790, महाराष्ट्र राज्य विरुद्ध रामकृष्ण डोरकर, 1995 क्रि.लॉ.ज. 2521, ज्ञानप्रकाश शर्मा विरुद्ध सेण्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन, छत्तीसगढ़ एवं अन्य, 2004 क्रि.लॉ.ज. 3817, राजेश सिंह विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य, 2007(2) एम.पी.एच.टी. 76 प्रस्तुत किये गये हैं, जिसका सार में आधार है कि अभियोजन स्वीकृति सम्पूर्ण तथ्यों पर मस्तिष्क का प्रयोग करते हुये प्रदान नहीं किया गया है, जिससे अभियोजन स्वीकृति अवैध है । अभियुक्त से पाउडर लगे नोट जप्त होने और उसके हाथों को धुलाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी हो जाने पर भी उक्त आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती है, जब तक रिश्वत की स्वैच्छिक मांग और स्वैच्छिक प्रतिग्रहण को प्रमाणित नहीं किया जाता है । नामान्तरण में पटवारी का कोई अधिकार व भूमिका नहीं है । प्रार्थी का कथन स्वतंत्र साक्षियों के साक्ष्य से समर्थित नहीं हुआ है । रिश्वत की रकम अभियुक्त से जप्त नहीं हुआ है । राशि की मांग एवं समय व स्थान के सम्बंध में विसंगतियां हैं । अभियुक्त का आपराधिक आशय, मांग व प्रतिग्रहण पंच साक्षियों के साक्ष्य से प्रमाणित हाना चाहिये, अन्यथा अभियुक्त सन्देह का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी होगा । 
13- अभियोजन की ओर से विशेष लोक अभियोजक ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि प्रार्थी ने उसके भाई की ओर से कार्य लम्बित होने पर आरोपी द्वारा रिश्वत की मांग किये जाने का स्पष्ट कथन किया है । अभियोजन साक्षियों के साक्ष्य से अभियुक्त द्वारा स्वैच्छिक रूप से प्रार्थी के परिवार के लम्बित कार्य के लिये रिश्वत की मांग किया जाना प्रमाणित हुआ है । प्रार्थी तथा अन्य साक्षियों के साक्ष्य से ए.सी. बी.कार्यालय में शिकायत आवेदन प्रस्तुत किया जाना, प्रारम्भिक कार्यवाही किया जाना निर्विवाद रूप से प्रमाणित हुआ है । ट्रेप   दिनांक को अभियुक्त को रंगेहाथों रिश्वत लेते हुये ट्रेप दल द्वारा ट्रेप किया गया है । बचाव-पक्ष, अभियाजन की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों का खण्डन करने में असफल रहा है । अभियुक्त की ओर से निराधार प्रतिरक्षा ली गई है, जो न्यायालय द्वारा स्वीकार करने योग्य नहीं है । स्वतंत्र साक्षियों द्वारा अभियुक्त की ओर से वैध पारिश्रमिक से भिन्न, पदीय कर्तव्य के निर्वहन के लिये अवैध राशि की मांग एवं उसकी स्वैच्छिक स्वीकृति का प्रमाणित किया गया है, अतः अभियुक्त को कठोर दण्ड से दण्डित किया जावे । 


14- अभियुक्त पर आराप है कि उसके द्वारा दिनांक 30-12-2003 को पटवारी के पद पर कार्यरत् होते हुये प्रार्थी अर्जुन साहू के पारिवारिक जमीन के प्रमाणीकरण हेतु 2,000/-रुपये की रिश्वत की मांग कर, प्राप्त किया गया । उक्त आरोप के परिप्रेक्ष्य में प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्य एवं दस्तावेजों का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि प्रार्थी अर्जुन साहू (अ.सा-6) का साक्ष्य है कि ग्राम खेरधा में स्थित पारिवारिक जमीन का खाता अलग करने के लिये आरोपी ने 5,000/-रुपये की मांग किया था, जिसे तीनों भाईयां ने मिलकर दे दिया था, परन्तु पटवारी ने कार्य नहीं कर उन्हें तारीखें दे-देकर घुमाता रहा । पटवारी ने उनकी मॉं के द्वारा 20 साल पहले लिये गये जमीन की प्रमाणीकरण के लिये 2,000/-रुपये की और मांग किया, तब उसने अपने जीजा मनहरण को बताया था, जिसके कहने पर वे लोग लोकायुक्त कार्यालय गये थे, जहां उसने आवेदन प्रदर्श पी-14 लिखा था । लोकायुक्त वाले उसे बातचीत रिकार्ड करने के लिये टेप दिये थे तथा पकड़ाने वाले दिन उसे बुलाये थे । 2,000/-रुपये के नोट में पाउडर लगाकर उसे दिये थे और वहीं पर हाथ धुलवाने की कार्यवाही भी की गई थी । आरोपी के कार्यालय जाने पर उसने अभियुक्त पटवारी को नोट दिया था, जिसे उसने अपने बैग में डाल दिया था । पटवारी ने नोट को बैग में रखा था, उसके बाद लोकायुक्त वाले क्या लिखापढ़ी किये, वह नहीं जानता है । अन्य पटवारी ने प्रदर्श पी-1 का नक्शा बनाया था । लोकायुक्त वालों ने उसका कोई बयान नहीं लिया था, पर आज उसने जो बयान दिया है, वह भी उससे नहीं पूछा था । लोकायुक्त वाले नोट के नम्बर भी लिखे थे । 
15- प्रार्थी अर्जुन साहू (अ.सा-6) ने प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि आवेदन-पत्र प्रदर्श पी-14 में उल्लेखित 5,000/-रुपये उसने गांव के पटेल को दिया था, परन्तु पटेल द्वारा काम नहीं करने पर उसने वापस मांग लिया था । उसने 5,000/-रुपये पटवारी को नहीं दिया था, उसके मझला भाई ने दिया था । उक्त बात प्रदर्श पी-14 में नहीं लिखी गई है । उक्त आवेदन में 2,000/-रुपये पटवारी द्वारा मांगने का समय नहीं लिखा है । आवेदन-पत्र उसने लिखकर दिया था । उसके आवेदन-पत्र में नोट के नम्बर और नोट कितने-कितने का था, इसका उल्लेख नहीं है । जिस ब्यारा के सम्बंध में 2,000/-रुपये मांग की शिकायत की गई है, वह उसके भाई राजकुमार के नाम पर है । उसके और भाईयों के बीच में बंटवारा हो गया है । उसका व्यक्तिगत कार्य अभियुक्त से नहीं था, परन्तु वह बड़ा होने के नाते राजकुमार को मदद कर रहा था, जो बात उसके आवेदन में नहीं लिखी गई है । प्रदर्श पी-14 के आवेदन में किस खसरा नम्बर की भूमि का नामान्तरण या बंटवारा या प्रमाणीकरण किया जाना है, इसका उल्लेख नहीं है । 
16- प्रतिपरीक्षण में प्रार्थी का आगे यह भी कथन है कि मनहरण ने उसे सलाह दिया था कि रायपुर जाकर शिकायत करो । राजकुमार भी उसके साथ रायपुर गया था । शिकायत के सत्यापन का टेप उसने और अधिकारियों ने सुना था, किन्तु रिकार्ड की गई बातें उसके सामने लिखी गई कि नहीं, यह याद नहीं है । रुपयों में फिनाफ्थलीन पाउडर लगाकर उसे दिया गया था । उसने रिश्वती रकम को ऋण पुस्तिका में डालकर आरापी को नहीं दिया था । आरोपी को रिश्वती रकम देने के बाद उसके जीजा मनहरण ने बाहर जाकर इशारा किया था, तब ट्रेप दल वाले आये थे । अभियुक्त से तलाशी लेने पर रकम उसकी जेब से बरामद नहीं हुआ था । ऋण पुस्तिका में आरोपी ने पैसे को लपेटकर बैग में रख दिया था, इस बात को उसने पुलिस वाले को नहीं बताया था । रिश्वती रकम के लेनदेन की बातचीत को रिकार्ड करने के लिये उसे टेपरिकार्डर नहीं दिया गया था । उसके हाथ को धुलवाने से हाथ का रंग गुलाबी हो गया था । उसने घटनास्थल पर कोई हस्ताक्षर नहीं किया था, वह सभी कागजातों पर ए.सी.बी.कार्यालय में बिना पढे, उनके कहने पर हस्ताक्षर किया था। 
17- प्रार्थी के जीजा अ.सा-8 मनहरण लाल का साक्ष्य है कि अर्जुन सिंह का अपने भाई राजकुमार और उमेश के साथ बंटवारा हुआ था, जिसका पटवारी रिकार्ड में खाता खोलने के लिये अर्जुनसिंह ने 5,000/-रुपये आरोपी पटवारी का दिया था, जिसमें उसी गांव की एक जमीन छूट गई थी । उक्त कार्य करने के लिये आरोपी द्वारा 2,000/-रुपये की मांग की गई, तब उसके द्वारा कहा गया कि 5,000 रुपया दे चुके हैं, तसे आरापी ने कहा कि 2,000/-रुपये नहीं देने पर काम नहीं होगा। उसके बाद वे लोग एन्टी करप्शन कार्यालय, रायपुर गये थे। दूसरे दिन एन्टी करप्शन के लाग कार्यवाही के लिये आये थे और रेंगहीभाठा में लिखापढी हुई थी, फिर पटवारी के कार्यालय में जाकर पटवारी से पूछे कि काम हो गया है, तो पटवारी ने कहा कि अभी नहीं बना है, पैसा दोगे तो बन जायेगा, तब अर्जुन सिंह के द्वारा अपनी जेब से पैसा भी निकालकर पटवारी को दिया गया, जिसे आरोपी ने ऋण पुस्तिका के अन्दर रखकर थैला में रख दिया । उसने पूर्व समझाईश के अनुसार बाहर निकलकर गमछा निकालकर इशारा किया था । एन्टी करप्शन वाले द्वारा रिश्वत रकम की पूछताछ करने पर आरोपी ने रिश्वत लेना तथा रकम थैले में रखना स्वीकार किया था । पटवारी का हाथ धुलवाने पर घोल का रंग लाल निकला था । पटवारी ने नजरी नक्शा बनाया था । उसका बयान लिया गया था । पक्षद्रोही घाषित होने और सूचक- प्रश्न पूछने पर इस साक्षी ने प्रार्थी द्वारा आरोपी के विरुद्ध एन्टी करप्शन ब्यूरो, रायपुर में शिकायत करना, नोटों का नम्बर नोट करना, प्रारम्भिक कार्यवाही करने की कार्यवाही तथा रिश्वती रकम की जप्ती पश्चात् नोटों का नम्बर मिलान करने के तथ्य को स्वीकार किया है । 


18- इस साक्षी ने प्रतिपरीक्षण में आरोपी से उसे पूर्व की कोई शिकायत नहीं होने से इन्कार करते हुये कथन किया है कि पटवारी 5,000/-रुपये पहले ले लिया था और 2,000/-रुपये और मांग रहा था, इसलिये वह अपने साले अर्जुन के साथ ए.सी.बी.कार्यालय गया था । शिकायत आवेदन किसने लिखा तथा आवेदन में क्या लिखा गया था, इसकी जानकारी उसे नहीं है । नारधा में दूसरे दिन अधिकारियों के मिलने पर वह और अर्जुन रेंगनीभाठा आये थे तथा सुरडुंग पहुंचकर पटवारी के कार्यालय में गये थे । अर्जुन ने रिश्वती रकम को ऋण पुस्तिका के अन्दर दबा दिया था । बाद में कथन किया है कि ऋण पुस्तिका के अन्दर रिश्वती रकम रखकर झोले में अर्जुन ने नहीं डाला था । उन लोगां ने पटवारी कार्यालय से निकलने के बाद कोई इशारा नहीं किया था, पर उनके निकलते ही अधिकारी आ गये थे । 
19- प्रार्थी द्वारा किये गये शिकायत पर कार्यवाही किये जाने के साक्षी असा-7 रामकुमार शर्मा, ए.आई.जी. (सी.आई.डी.) का साक्ष्य है कि प्रार्थी द्वारा लिखित शिकायत प्रदर्श पी-14 प्रस्तुत किये जाने पर उसने निरीक्षक चौबे को आदेश दिया था तथा ट्रेप दल के प्रभारी अधिकारी के रूप में ट्रेप दल में शामिल हुआ था । आरोपी के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य पाये जाने पर अभियोग-पत्र प्रदर्श पी-15 प्रस्तुत किया था । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि प्रार्थी ने पहले से लिखा हुआ आवेदन प्रदर्श पी-14 उसके समक्ष प्रस्तुत किया था । उस समय प्रार्थी अकेला था । आवेदन पत्र में किस जमीन का खाता अलग करना है, इसका उल्लेख नहीं है । शिकायत के समय प्रार्थी के भाई उपस्थित नहीं हुये थे और उसके भाईयों का बयान भी नहीं लिया गया है । 
20- अ.सा-10 शिवबदन मिश्रा का साक्ष्य है कि उसने दिनांक 31-12-2003 को ट्रेप दल के सदस्य के रूप में सोडियम कार्बोर्नेट का घोल तैयार कर, सभी सदस्यों का हाथ धुलवाया था, जिसमें अभियुक्त एवं प्रार्थी के हाथ तथा ऋण पुस्तिका को घोल में डुबाने से घोल का रंग गुलाबी हो गया था, जिसे जप्ती पत्र प्रदर्श पी-7 के माध्यम से जप्त किया गया था । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि ट्रेप दल रवाना होने के पूर्व उसके सामने ट्रेप के लिये रखे गये सामग्रियों का पंचनामा नहीं बनाया गया था । अभियुक्त को पकडंने के पहले अभियुक्त की जामातलाशी नहीं करवाये थे । अभियुक्त के पकड़ाने के बाद प्रार्थी का छोडकर ट्रेप दल के सभी सदस्यों का हाथ धुलवाया गया था, जिसकी जप्ती की गई थी । 
21- पंच साक्षी अ.सा-2 रणवीर सिंह, तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी, लोक निर्माण विभाग का साक्ष्य है कि उसे ओर उसके विभाग के अन्य अधिकारी शमीमुद्दीन का कलेक्टर के माध्यम से एन्टी करप्शन ब्यूरो में उपस्थित होने के लिये निर्देशित किया गया था । दिनांक 31-12-2004 का सुबह 4.30 बजे एन्टी करप्शन ब्यूरो के कार्यालय में पहुंचने पर प्रार्थी सहित अन्य 5-6 व्यक्ति व ब्यूरो के पाठक उपस्थित थे, जिसके साथ चारपहिया वाहन में भिलाई के रास्ते नाला किनारे जामुल तरफ किसी गांव में गये थे । गांव से एक किलामीटर पहले 500-500 के 2500 या 3000 के नोट के नम्बर नोट कराया गया था, जिसे प्रार्थी ने दिया था । नोटों में जो पाउडर लगाया गया था, उसे पानी में डालने पर पानी का रंग लाल हो जायेगा, ऐसा प्रदर्शन दिखाया गया था । नोटों का पाउडर लगाकर प्रार्थी को दे दिया गया था, उसके बाद पटवारी कार्यालय स्थित गांव में रवाना होकर पटवारी कार्यालय से 150- 200 मीटर की दूरी में रुक गये थे । नोट देने के बाद प्रार्थी के साथ गये साथी ने इशारा किया, तो दल के सभी लोग पटवारी कार्यालय के अन्दर पहुंचे, वहां उसने देखा कि ब्यूरो टीम के सिपाही ने आरोपी का हाथ पकड़ा था । आरोपी के जेब से या उसके बैग से पैसा निकाला गया, उसे याद नहीं है । पैसा निकालने के बाद आरोपी का हाथ धुलवाया गया था तथा जप्तशुदा नोटों का उसके द्वारा चेक कराया गया था । वहां पर ब्यूरो द्वारा कुछ रिकार्ड जप्त किया गया था । उसके सामने ट्रेप के पहले किसी घोल की जप्ती कार्यवाही नहीं हुई थी । बहुत सी चीजों की लिखापढी में पढकर उसने हस्ताक्षर किया था । 
22- अ.सा-2 रणवीर सिंह के पक्षद्रोही घोषित होने और सूचक-प्रश्न पूछने पर इस साक्षी ने ट्रेप पूर्व हाथ धुलवाने के जलीय घोल की जप्ती कार्यवाही प्रदर्श पी-2, प्रारम्भिक पंचनामा प्रदर्श पी-3, जामातलाशी प्रदर्श पी-4, ऋण पुस्तिका व नायलोन का पुराना थैला जप्त करने की जप्ती पत्र प्रदर्श पी-5, आरापी से जप्तशुदा रिकार्ड की जप्ती प्रदर्श पी-6 में उसके हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है। यह भी कथन किया है कि आरापी के हाथ धुलवाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया था, जिसे हस्ताक्षरयुक्त पर्ची में सीलबंद किया गया था । बाद में कथन किया है कि पैसा थैले से निकाला गया था, जिसके नोटों के नम्बर का मिलान करने पर प्रारम्भिक पंचनामा के नोट के नम्बर पाये गये थे । नोटों को डुबाने पर भी घोल का रंग गुलाबी हो गया था । ऋण पुस्तिका को घोल में डुबाकर देखने की बात उसे याद नहीं है । प्रार्थी के हाथ धुलाने पर प्राप्त गुलाबी रंग का जप्ती पत्र प्रदर्श पी-7, आरोपी के गिरफ्तारी पंचनामा प्रदर्श पी-8 तथा नजरी नक्शा प्रदर्श पी-1 एवं सम्पूर्ण कार्यवाही पंचनामा प्रदर्श पी-9 में उसके हस्ताक्षर हैं । ब्यूरो द्वारा उसका बयान लिया गया था । 


23- इस साक्षी ने प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि घटना का वर्ष वास्तव में 2003 है, जिसे उसने पहले 2004 बोल दिया था । प्रार्थी क्या शिकायत लेकर आया था, वह नहीं बता सकता है, पर उसके साथ एक और आदमी आया था । प्रार्थी द्वारा लोकायुक्त में दिये गये आवेदन को उसे दिखाया नहीं गया था और न ही क्या शिकायत किया गया है, यह बताया गया था । प्रार्थी उसके खुद के सम्बंध में शिकायत लेकर आया था, किसी दूसरे के सम्बंध में नहीं था । शिकायत, प्रार्थी से सम्बंधित थी । शिकायत नहीं देखने के कारण वह नहीं बता सकता कि प्रार्थी से कितने रुपये की मांग की गई थी । उसे ध्यान नहीं है कि पाउडर लगाने के लिये दिये गये रकम 2,500 था या 3,000 रुपये था । उसे 500-500 का नोट पाउडर लगाने के लिये दिया गया था । नक्शा प्रदर्श पी-1 के अनुसार वह जिस स्थान पर बैठा था, वहां से पटवारी कक्ष के अन्दर का दृश्य दिखाई नहीं देता है, इसलिये उसने प्रार्थी और अभियुक्त के बीच बातचीत या लेनदेन को देखा नहीं था । वह नहीं बता सकता है कि पटवारी कक्ष में रखे थैले में किसने नोट डाला था । उसने प्रारम्भिक पंचनामा में हस्ताक्षर किया था, बाकी कागजां पर हस्ताक्षर उसने घटनास्थल पर किया था । वह नहीं बता सकता है कि रिश्वती रकम जप्त होने वाला झोला कपड़ा का था या जूट का था, या किस रंग का था । उसका बयान ट्रेप कार्यवाही के दिन ही घटनास्थल पर लिया गया था । कार्यवाही पंचनामा में पुलिस वालों ने क्या लिखा है, उसे याद नहीं है, पर उसने पढंकर हस्ताक्षर किया था । जप्ती पत्र प्रदर्श पी-5 से प्रदर्श पी-8 एवं प्रदर्श पी-2 में क्या लिखा है, उसे याद नहीं है, पर सभी कागजात 31 तारीख का बनाये गये थे । प्रदर्श डी-1 का पुलिस बयान, पुलिस ने कैसे लगाया है, वह नहीं बता सकता, उससे पूछ-पूछकर बयान नहीं लिखा गया था। 
24- अन्य पंच साक्षी अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन का साक्ष्य है कि वह दिनांक 31-12-2003 को ब्यूरा कार्यालय पहुंचा था, वहां पर उसके विभाग के रणवीर सिंह तथा ब्यूरो के पाठक तथा शर्मा व अन्य चार लाग उपस्थित थे । वे लोग एक 18 वाहन में बैठकर रवाना हुये थे, रास्ते में घोल प्रदर्शन की कार्यवाही की गई थी । थोड़ी दूर पर एक आदमी मिला था, जिसका नाम याद नहीं है, जिसके बारे में बताया गया था कि पटवारी ने नामान्तरण के सम्बंध में रिश्वत की मांग किया है । उस व्यक्ति के द्वारा नोट निकालकर दिये जाने पर 500-500 के चार नग नोट में पाउडर लगाये गये, उसके बाद उन नोटो ं का उस व्यक्ति के पास रखवा दिया गया तथा नोट देने के बाद गमछा हिलोकर इशारा करने की बात बतायी गई । पाउडर लगाने के पूर्व नोट का नम्बर किसने लिखा, उसे याद नहीं है । नोट पर पाउडर लगाने के बाद घोल को जप्ती करने की कार्यवाही प्रदर्श पी-2, प्रारम्भिक पंचनामा प्रदर्श पी-3 की कार्यवाही की गई । 
25- इस साक्षी ने आगे यह भी कथन किया है कि पटवारी के गांव पहुंचने पर वह व्यक्ति अन्दर गया और बाहर निकलकर कपड़ा हिलोकर इशारा किया, तो सब लोग दौडे । वहां जाकर देखा कि हाजिर अदालत आरापी के हाथ का पुलिस वाले पकड़े हुये थे, तब प्रार्थी ने पटवारी द्वारा ऋण पुस्तिका के अन्दर पैसा रखकर ऋण पुस्तिका को पैसा सहित झोला में रखना बताया । उसकी तलाशी पंचनामा प्रदर्श पी-4 तैयार करने के बाद उसने आरापी की तलाशी लिया था, तब उसने कुछ नहीं पाया था । झोले की तलाशी लेने पर एक ऋण पुस्तिका में 500 रुपये के 04 नोट कुल 2000 रुपये रखे हुये थे, जिसका मिलान करने पर पूर्व में लिखे गये नोटों का ही नम्बर पाया गया । उसके बाद नोट, ऋण पुस्तिका, झोला की जप्ती कार्यवाही प्रदर्श पी-5, पटवारी व अन्य लोगां का हाथ धुलवाने के बाद प्राप्त लाल रंग के घोलों का जप्ती पत्र प्रदर्श पी-7 तैयार किया गया था । जप्ती पत्र प्रदर्श पी-6 तैयार 19 किया गया था, पर क्या जप्ती हुई, उसे याद नहीं है । आरोपी का गिरफ्तार कर, गिरफ्तारी पंचनामा प्रदर्श पी-8, नजरी नक्शा प्रदर्श पी-1, घटनास्थल की पूरी कार्यवाही का पंचनामा प्रदर्श पी-9 तैयार किया गया था । 
26- अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन ने प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि उसने प्रार्थी का केवल एक ही आवेदन-पत्र पढा था, जिसमें नामान्तरण से पहले भी पैसा ले चुका है, लिखा था । उसने प्रार्थी के किस क्षेत्र, किस खसरा नम्बर के नामन्तरण के सम्बंध में आवेदन का सत्यापन नहीं किया था । लोकायुक्त के अधिकारी द्वारा समस्त दस्तावेजो में पूरी कार्यवाही के बाद हस्ताक्षर लिया गया था । प्रदर्श पी-14 में प्रार्थी द्वारा दिये गये नोटों का नम्बर नहीं लिखा गया है । प्रार्थी ने यह नहीं बताया था कि शिकायत वाली जमीन प्रार्थी की थी या अन्य किसी की थी। अभियुक्त के कपड़े से तलाशी के दौरान कोई रिश्वती रकम नहीं मिला था । पैसा बरामद नहीं होने पर प्रार्थी ने कहा था कि अभियुक्त ने झोले में पैसा डाल दिया है, पर उसने झोले में पैसा डालते हुये अपनी ऑखों से नहीं देखा था । काई एसा पात्र, जिसमे फिनॉफ्थलीन पाउडर लगा हा और उसमें सोडियम काबार्नेट का घोल डाला जाये, तो रंग गुलाबी हो जायेगा । प्रार्थी और अभियुक्त के बीच अभियुक्त के कार्यालय में क्या बातचीत हुई, क्या लेनदेन हुआ, उसे नहीं मालूम है । 


27- अ.सा-1 अरविन्द कुमार शर्मा, पटवारी का साक्ष्य है कि उसने गवाहां के बताये अनुसार ग्राम सुरडुंग, ह0ह0न0 43, रा0नि0म0 अहिवारा, तहसील धमधा, जिला दुर्ग के पटवारी कार्यालय का नक्शा प्रदर्श पी-1, दिनांक 31-12-2003 का तैयार किया था । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि पटवारी कार्यालय एक ही कमरा 20 है और उसमे शटर लगा हुआ है । चिन्ह क्रमांक-3, 4 और 5 में खड़े हुये व्यक्तियो को घटनास्थल क्रमांक-1 दिखाई नहीं पड़ता है । उसने जा टिप्पणी लिखी है, वह अर्जुन सिंह के बताये अनुसार लिखी है । 
28- अ.सा-3 अरुण कुमार मिश्रा, सहायक ग्रेड-3, विधि एवं विधायी कार्य विभाग, मंत्रालय रायपुर का साक्ष्य है कि एन्टी करप्शन ब्यूरो के अपराध क्रमांक- 11/2003 में आरोपी के विरुद्ध अभियाजन स्वीकृति प्रदर्श पी-10, दिनांक 28-06-2005 को श्री टी.पी.शर्मा, तत्कालीन प्रमुख सचिव, विधि एव विधायी कार्य विभाग द्वारा दिया गया था, जिसमें उनके हस्ताक्षर हैं । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि अभियाजन स्वीकृति आदेश पारित किये जाने के पूर्व ए.सी.बी.कार्यालय से कौन- कौन से दस्तावेज भेजे गये थे, इसकी जानकारी उसे नहीं है । अभियाजन स्वीकृति प्रदर्श पी-10 के पृष्ठ क्रमांक-2 के पैरा-4 के ब से ब भाग में प्रशासकीय विभाग द्वारा सहमति दी गई, लिखा हुआ है, परन्तु उक्त प्रशासकीय स्वीकृति पेश नहीं किया गया है । प्रदर्श डी-2 के पत्र के बारे में वह कुछ नहीं बता सकता है । प्रशासकीय विभाग द्वारा स्वीकृति ली गई है कि नहीं, इसकी जानकारी उसे नहीं है । 
29- अ.सा-5 जे.एस.राजपूत, तत्कालीन तहसीलदार, धमधा का साक्ष्य है कि उसने अभियुक्त के सेवा-पुस्तिका की फोटो प्रति का सत्यापित कर, ए.सी.बी. के अधिकारी को प्रदान किया था । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि आरापी को सेवा पुस्तिका की प्रति प्रदान किये जाने पर जा पत्र प्राप्त हुआ था, उसे वह लेकर नहीं आया है । 
30- विवेचक अ.सा-9 नवीनशंकर चौबे का साक्ष्य है कि प्रार्थी ने एक लिखित शिकायत, अभियुक्त द्वारा 2000/-रुपये की रिश्वत की मांग के सम्ब ंध में दिया था, जिसे पुलिस अधीक्षक द्वारा कार्यवाही के लिये उसे दिया गया था । शिकायत में प्रार्थी ने लेख किया था कि वे लोग तीन भाई हैं, उनकी जमीन के बंटवारे के लिये अभियुक्त ने 5,000/-रुपये लेकर खाता विभाजन कर दिया है । उनके पुराने ब्यारे से लगा हुआ 60 डिसमिल जमीन, जिसे उनकी मॉं ने 20 वर्ष पूर्व खरीदा था, का प्रमाणीकरण अभी तक नहीं करवाया है, जिसके लिये पटवारी ने उन्हे 2,000/-रुपये देने पर ही प्रमाणीकरण करने का कथन किया था, जिसके लिये जमीन का स्टॉम्प पेपर, खसरे की नकल और मझले भाई राजकुमार साहू के नाम की ऋण पुस्तिका भी अपने पास मांगकर रख लिया था और दूसरे दिन 31-12-2003 को 9.00 बजे 2,000/-रुपये रिश्वत लेकर आने के लिये कहा था । प्रार्थी के लिखित शिकायत आवेदन पर उसने शून्य पर प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी-16 दर्ज किया था । उसके पश्चात् पंच साक्षियों को तलब कर प्रार्थी को नारधा नहर पुल के पास दिनांक 31-12-2003 को प्रातः 8.30 बजे मिलने की हिदायत दिया था । ट्रेप दल के साथ दिनांक 31-12-2003 को 7.00 बजे ए.सी.बी. कार्यालय से निकलने पर नारधा नहर पुल के पास प्रार्थी अर्जुन साहू और मनहरण लाल साहू मिले थे । ग्राम सुरडुंग से थोड़ी देर पहले खान बाड़ी के पास वाहन रोककर प्रारम्भिक पंचनामा की कार्यवाही किये थे । प्रार्थी के आवेदन को पंच साक्षियों का पूछताछ और जानकारी लेने के लिये दिया गया था और उनके सन्तुष्ट होने पर 500-500 रुपये के चार नोटों में पंच साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा नोटों का नम्बर लिखा गया । नोटों पर पाउडर लगाकर पंच साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा प्रार्थी की तलाशी लेकर उसकी शर्ट की ऊपरी बांयी जेब में नोट रख दिया गया और उसे हिदायत दी गई कि रिश्वत देने के बाद सिर में बंधे गमछे को खालकर इशारा करे। प्रदर्शन घोल की कार्यवाही कर जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-2, प्रारम्भिक पंचनामा की कार्यवाही प्रदर्श पी-3 की गई । उसके बाद 9.45 बजे ग्राम सुरडुंग पहुंचकर ट्रेप दल के सदस्य थोड़ी दूर पर खड़े हो गये । 


31- इस साक्षी का आगे साक्ष्य है कि प्रार्थी और छाया साक्षी पटवारी कार्यालय के अन्दर गये तथा छाया साक्षी ने सिर में बंधे गमछे को खोलकर इशारा किया, तो ट्रेप दल के सदस्य कार्यालय के तरफ दौडे, तब पटवारी अपने कार्यालय से बाहर निकलकर मोटरसायकल की तरफ जा रहा था । उसने दाहिना हाथ तथा प्रधान आरक्षक शिवबदन मिश्रा ने बांये हाथ को पकड़कर ट्रेप दल का परिचय कराकर रिश्वती रकम के बारे में आरापी से पूछा, तो अभियुक्त ने रिश्वती रकम कार्यालय में बैठने की कुर्सी के पीछे टंगे नायलान के थैले में राजकुमार की ऋण पुस्तिका के अन्दर रखना बताया । आरोपी का हाथ धुलवाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया, जिसे सीलबंद किया गया। पंच साक्षी शमीमुद्दीन की जामा-तलाशी अन्य पंच साक्षी रणवीर सिंह से कराकर जामातलाशी पंचनामा प्रदर्श पी-4 तैयार किया गया । पंच साक्षी शमीमुद्दीन द्वारा आरोपी द्वारा थैले के अन्दर रखी गई राजकुमार की ऋण पुस्तिका निकलवाने पर पृष्ठ क्रमांक-2 और 3 के बीच 500- 500 के चार नोट रखे मिले, जिसका मिलान करने पर सही होना पाया गया । नोटों और ऋण पुस्तिका तथा प्रार्थी के हाथों की उंगलियों का डुबाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया, जिसे शीशियों में भरकर जप्ती पत्र प्रदर्श पी-7 तैयार किया गया। राजकुमार फकीरा लिखा हुआ भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका भाग-1 एवं भाग-2, नायलोन का पुराना थैला जप्ती पत्र प्रदर्श पी-5 के अनुसार जप्त किया गया था । बंटवारा और नामान्तरण के लिये कार्यालय में रखे दस्तावेज को जप्त कर प्रदर्श पी-6, घटनास्थल का नजरी नक्शा प्रदर्श पी-1 तैयार किया गया । गवाहों का बयान उनके बताये अनुसार लेखबद्ध किया गया । गिरफ्तारी पंचनामा प्रदर्श पी-8 तैयार किया गया । घटनास्थल पर कार्यवाही पंचनामा प्रदर्श पी-9 भी तैयार किया गया । 
32- इस साक्षी ने प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि प्रदर्श पी-14 का आवेदन प्रार्थी अपने घर से लेकर आया था । आवेदन किसने लिखा था, वह नहीं बता सकता है । आवेदन में कहां और कब रिश्वत की मांग की गई है, इस बात का उल्लेख नहीं किया गया है, केवल रिश्वत लेकर कार्यालय में आने की बात लिखी गई है । नामान्तरण संशोधन, प्रमाणीकरण की प्रक्रिया तहसीलदार द्वारा की जाती है । आवेदन-पत्र में ब्यारा के खसरा नम्बर एवं रकबा का उल्लेख नहीं है । पटवारी के कार्यालय के अन्दर का भाग, जहां वे लाग खडं थे, वहां से दिखाई नहीं देता है । उसने रिश्वत देते समय प्रार्थी और अभियुक्त की बातचीत का नहीं सुना था । जब वे लाग अभियुक्त के कार्यालय पहुंचे थे, उस समय दो-तीन व्यक्ति बैठे थे । उसने अभियुक्त के भाई और तहसीलदार का बयान नहीं लिया है । 
33- बचाव साक्षी क्रमांक-1 अरविन्द कुमार शर्मा का साक्ष्य है कि उसने जांच में पाया था कि मनहरण साहू जिस जमीन में काबिज था, उक्त जमीन में मनहरण साहू का नाम दर्ज नहीं था । प्रमाणीकरण, नायब तहसीलदार के आदेश से होता है और प्रमाणीकरण का अधिकार पटवारी को नहीं है । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि वह मनहरण लाल साहू के बंदोबस्त त्रुटि सुधार के प्रकरण में जांच दल के साथ निरीक्षण करने गया था । ब.सा-2 किशोर कुमार वर्मा का साक्ष्य है कि सामान्यतः जब किसी क्रेता-विक्रेता के नाम में अन्तर या खसरा, रकबा में अन्तर हो और विक्रेता की मृत्यु हो गई हो, या भूमि के पंजीयन के समय क्रेता नाबालिग हो, तो प्रमाणीकरण का कार्य तहसीलदार द्वारा, आवेदक के आवेदन प्रस्तुत करने पर किया जाता है । पटवारी, प्रमाणीकरण के लिये सक्षम नहीं होता है । इस प्रकार का प्रमाणीकरण तहसीलदार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत होने तथा रिकार्ड की जांच करने, रिपोर्ट आने तथा साक्षियों के बयान लेने के पश्चात् आदेश हाने पर पटवारी उसमें सुधार कर सकता है । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि उसने एक सामान्य प्रक्रिया के बारे में बताया है । 
34- ब.सा-3 दधीचि सिंह का साक्ष्य है कि घटना दिनांक को 7.00-7.30 बजे पटवारी कार्यालय में गया था, उसी समय अर्जुन और मनहरण आये थे और आकर ऋण पुस्तिका मांगे थे । मांगे जाने पर पटवारी ने थैला से ऋण पुस्तिका निकालकर अर्जुन को दिया था, जिसे कुछ समय पश्चात् अर्जुन ने पटवारी को वापस कर दिया और पटवारी ने ऋण पुस्तिका को थैले में डाल दिया । उसी समय मनहरण तेजी से बाहर निकला और 4-5 लाग आकर पटवारी को पकड़ लिये । उस समय लोकायुक्त वाले उसे बाहर जाने के लिये कहे, तो वह बाहर चला गया । उसके सामने पैसा लेने की कोई बातचीत नहीं हुई थी । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि उसकी भूमि में 25 डिसमिल रकबा कम हो गया था, जिसके सुधार के लिये वह पटवारी के पास गया था । ब.सा-4 श्रीकान्त वर्मा, तत्कालीन नायब तहसीलदार, 25 दुर्ग का साक्ष्य है कि उसने मनहरण लाला साहू के कृषि भूमि के बंदाबस्त त्रुटि सुधार के सम्बंध में प्रकरण में जांच किया था । त्रुटि सुधार का अधिकार उसे है, पटवारी न्यायालय के आदेश के बिना बंदाबस्त त्रुटि सुधार नहीं कर सकता है । उसने प्रार्थी अर्जुन साहू के खाता विभाजन का आदेश दिनांक 07-07-2003 का पारित किया था। उसके पदस्थ रहते तक अभियुक्त के कार्य के सम्बंध में कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई थी और उसका कार्य संताषप्रद था । प्रकरण में संलग्न संशोधन नामान्तरण पंजी, पृष्ठ क्रमांक-12 प्रदर्श डी-1 में उसके हस्ताक्षर हैं । प्रतिपरीक्षण में कथन किया है कि सामान्यतः खाता विभाजन आदेश के बाद पटवारी द्वारा रिकार्ड में सुधार किया जाता है और सम्बधित पक्षकार का नाम चढाया जाता है । 


35- उपरोक्त साक्षियों के साक्ष्य एवं दस्तावेजो ं के अवलोकन से ज्ञात होता है कि अभियुक्त के प0ह0न0 43, ग्राम सुरडुंग में पटवारी के पद पर पदस्थ होने के सम्बंध में पदस्थापना आदेश तथा सेवा-पुस्तिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्रकरण में संलग्न है । अ.सा-5 जे.एस.राजपूत, तत्कालीन तहसीलदार, धमधा ने कथन किया है कि अभियुक्त, पटवारी के पद पर पदस्थ था और उसने उसकी सेवा-पुस्तिका की सत्यापित प्रति ए.सी.बी. वालों को प्रदान किया था । ब.सा-4 श्रीकान्त वर्मा, तत्कालीन नायब तहसीलदार का साक्ष्य है कि आरापी उसके अधीनस्थ हल्का पटवारी के पद पर पदस्थ था । अभियुक्त की ओर से उसकी पदस्थापना और लोक-सेवक के पद पर पदस्थ रहने के तथ्य को चुनौती नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि घ् ाटना दिनांक 31-12-2003 का अभियुक्त ग्राम सुरडुंग, प0ह0नं0 43, जिला दुर्ग का पटवारी रहा है । इस प्रकार अभियुक्त के दिनांक 31-12-2003 को लोक-सेवक, पटवारी के पद पर पदस्थ होना प्रमाणित होता है । 
36- अभियुक्त की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अभियाजन स्वीकृत उचित रूप से नहीं दी गई है तथा अभियाजन स्वीकृति प्रदान करने वाले अधिकारी का साक्ष्य न्यायालय में नहीं कराया गया है । अभियाजन स्वीकृति देने वाले अधिकारी ने समस्त दस्तावेजो एवं साक्ष्य का अवलोकन किये बिना अभियाजन स्वीकृति प्रदान किया है, जिससे अभियाजन स्वीकृति अवैध है और अभियुक्त का अभियाजन नहीं किया जा सकता है । उक्त सम्बंध में अ.सा-3 अरुण कुमार मिश्रा ने तत्कालीन प्रमुख सचिव, विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा पारित आदेश प्रदर्श पी-10 में प्रमुख सचिव के हस्ताक्षर का प्रमाणित किया है । अभियाजन स्वीकृति आदेश के साथ अवलोकन किये गये दस्तावेज एवं गवाहों के बयान की सूची संलग्न है, जिससे स्पष्ट है कि अभियाजन स्वीकृति अधिकारी द्वारा दस्तावेजां का अवलोकन करते हुये अभियुक्त के प्रकरण में अभियाजन स्वीकृति प्रदान की गई है । 
37- माननीय वरिष्ठ न्यायालयों द्वारा पारित निर्णयों में यह सिद्धान्त स्थापित कर दिया गया है कि प्रशासकीय विभाग द्वारा अभियाजन स्वीकृति प्रदान नहीं किये जाने पर विधि एव  विधायी कार्य विभाग, अभियोजन स्वीकृति प्रदान करने के लिये सक्षम है । धारा-19 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि जब तक प्रकरण में प्रस्तुत अभियाजन स्वीकृति आदेश से न्याय की हानि न हा, तब तक अभियुक्त द्वारा अभियोजन स्वीकृति आदेश के सम्बंध में प्रस्तुत आक्षेप पर विचार नहीं किया जावेगा । प्रकरण के समस्त तथ्यां, संलग्न साक्ष्य एवं दस्तावेजां के अवलोकन से स्पष्ट है कि अभियाजन स्वीकृति प्रदान करने में यदि कोई अनियमितता की गई हो, तो भी अभियुक्त उक्त अनियमितता का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता है । उपरोक्त स्थिति में अभियुक्त के विरुद्ध वैध अभियोजन स्वीकृति आदेश पारित किया जाना पाया जाता है । 
38- इस प्रकरण में शिकायत के सत्यापन हेतु एवं ट्रेप के समय बातचीत को रिकार्ड करने के लिये टेपरिकार्डर का प्रयोग नहीं किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप अभियुक्त व प्रार्थी के बीच हुये बातचीत का लिप्यान्तरण भी संलग्न नहीं है । उपरोक्त स्थिति में अभियुक्त द्वारा प्रार्थी से रिश्वत की रकम मांग किये जाने के सम्बंध में प्रार्थी अ.सा-6 अर्जुन साहू का साक्ष्य है कि उन लागो ने तीनों भाईयां के बीच खाता विभाजन के लिये अभियुक्त को 5,000/-रुपये दिया था । उसके बाद उसकी मॉं का 20 साल पहले खरीदी गई जमीन का प्रमाणीकरण करने के लिये कहने पर 2,000/-रुपये का मांग किया था, तब उसने आवेदन प्रदर्श पी-14 लोकायुक्त को दिया था । यद्यपि इस साक्षी ने भ्रमवश उसे शिकायत के सत्यापन हेतु लोकायुक्त द्वारा टेप दिये जाने का कथन किया है । प्रदर्श पी-14 में किस समय और कब पटवारी ने मांग किया, इसका उल्लेख नहीं है, परन्तु इस साक्षी ने कथन किया है कि पटवारी ने उससे 2,000/-रुपये की मांग किया था, जिसका उल्लेख प्रदर्श पी-14 के आवेदन में है । इस साक्षी के साक्ष्य का समर्थन अ.सा-8 मनहरण लाल ने किया है कि पटवारी के पास वह और अर्जुन गये थे कि एक जमीन नाम चढाने के लिये छूट गई है, जिसके लिये आरापी के द्वारा 2,000/-रुपये की मांग की गई । उनके द्वारा यह बोलने पर कि 5,000/-रुपये पहले दे चुके हैं, 2,000/-रुपये नहीं देंगे, तो पटवारी ने काम नहीं होने का कथन किया था । 


39- अ.सा-9 विवेचक नवीनशंकर चौबे ने साक्ष्य में कथन किया है कि पटवारी ने 5,000/-रुपये रिश्वत लेकर प्रार्थी और उसके भाईयां के बीच का खाता विभाजन कर दिया था और पुराने ब्यारा से लगी हुई प्रार्थी की मॉं द्वारा 20 वर्ष पूर्व खरीदे गये 60 डिसमिल जमीन की प्रमाणीकरण के लिये पटवारी 2,000/-रुपये रिश्वत मांग रहा था । इसके लिये उसने जमीन का स्टॉम्प पेपर और राजकुमार का ऋण पुस्तिका अपने पास रख लिया था । उल्लेखनीय है कि उक्त दस्तावेज पटवारी से जप्त हुये हैं । पंच साक्षी अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन ने भी कथन किया है कि उसने प्रार्थी का आवेदन पढा था, जिसमें लिखा था कि नामान्तरण से पहले भी पैसा ले चुका है । यह भी कथन किया है कि प्रार्थी ने पटवारी द्वारा नामान्तरण के सम्बंध में रिश्वत की मांग किया जाना बताया था । 
40- प्रदर्श पी-6 में पंच साक्षियों के समक्ष निम्नानुसार दस्तावेज भी जप्त किये गये हैं, जिसका विवरण इस प्रकार है :- 
1. ग्राम खेरधा, प.ह.नं. 43 के वर्ष 2002-2003 की नामान्तरण पंजी, जिसमें पृष्ठ क्र.1 से 92 तक है, जिसके पेज नबर-1 से लेकर 19 तक इन्द्राज किया गया है, जो क्र.1 से लेकर 67 तक नामान्तरण किये गये हैं, जिसके ना.क्र.40 पर बंटवारा दर्ज कर नायब तहसीलदार द्वारा प्रमाणित किया गया है । 
2. ग्राम खेरधा, प.ह.नं. 43 की नामान्तरण पंजी, जिसमे 1 से लेकर 92 तक पेज हैं, जिसमें नामान्तरण क्र.1 पर दिनांक 10-11-2003 से नामान्तरण प्रारम्भ किये गये हैं तथा कुल 08 नामान्तरण दर्ज हैं, सभी नायब तहसीलदार से प्रमाणित हैं । 
3. एक रफ कापी, जिसमे 1 से लेकर 71 तक पन्ने हैं, जिसके पेज नं.69 पर दिनांक 31-12-2003, 556, अर्जुन, 550 का टुकड़ा 0.40 डिसमिल भर्री तथा 550 का टुकड़ा धनहा 7 डिसमिल आरापी द्वारा आज दिनांक 31-12-2003 का दर्ज किया गया है । 
4. एक रजिस्ट्री बैनामा नाम विक्रेता - दिलबुध अली वो खिदमत अली पिता दिलदार अली, मुस0, साकिन खेरधा, तहसील व जिला दुर्ग, नाम क्रेता - अर्जुन ना0बा0 राज ना0बा0 उमेश ना0बा0 पिता फकीरा वली मॉं चेतीबाई बेवा फकीरा साहू, साकिन खेरधा, तहसील व जिला दुर्ग का जमीन क्र. 663 का टुकड़ा रकबा 0.07 हेक्टेयर 0.028 का 1978 का छः पृष्ठो में स्टॉम्प पेपर, साथ ही लगान रसीद क्र. 89 दिलबुध अली तथा एक बी-1 खाता की नकल, खाता नं.90, दिलबुध अली व0 खिदमत अली को, जप्त कर कब्जे में लिया गया । 41- उपरोक्त दस्तावेज जप्त किये गये हैं, जिसके अवलोकन से जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-6 में दर्शाये प्रविष्टि सत्य पाये गये हैं । प्रदर्श पी-6 की कार्यवाही की पुष्टि पंच साक्षी अ.सा-2 रणवीर सिंह तथा अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन के कथनां से भी होती है । विवेचक अ.सा-9 नवीनशकर चौबे ने भी उक्तानुसार कथन किया है । असा-6 प्रार्थी अर्जुन साहू ने भी आरापी का सम्बंधित भूमि का दस्तावेज देने का कथन किया है । इसी प्रकार प्रदर्श पी-5 के अनुसार अभियुक्त से पंच साक्षियों के समक्ष नोट व ऋण पुस्तिका तथा थैला जप्त किया गया है, जो इस प्रकार है :- 
1. पटवारी माधव सिंह चन्देल, प0ह0नं0 43, मुख्यालय ग्राम सुरडुंग के बताये अनुसार जरिये पंचसाक्षी प्राप्त रिश्वती रकम 2000/-रुपयों का वजह सबूत में जप्त किया गया । जप्तशुदा रिश्वती नोटों के नम्बर जा 500-500/रुपयां के चार नोट कुल 2000/-रुपये हैं, निम्नानुसार है- (1) 3 बी के 587114 (2) 7 सी सी 938726 (3) 1 सी एच 627787 (4) 8 बी एफ 953741 उपरोक्त नोटों को सूखने के बाद कारे लिफाफे में रखकर पंच साक्षियों के हस्ताक्षर लेकर विधिवत् सीलबंद किया गया । 
2. एक भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका भाग-1, पुस्तिका क्र. 2485779, जो राजकुमार - फकीरा के नाम की है, जिसके पृष्ठ नंबर-2 व 3 के बीच रिश्वती रकम 2,000/-रुपये, जो 500/-रुपयों के चार नोट थे, का रखकर नायलोन के थैले में रख दिया था, जिस पर ना0क्र0-40/7/ 7/03, खाता क्रमांक-587 लिखा है । 
3. एक भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका भाग-2, राजकुमार, फकीरा, खेरधा, प0ह0न ं0 43, पुस्तिका क्रमांक-2485779, राजस्व निरी0मण्डल अहिवारा, विकासखण्ड धमधा, तहसील धमधा, जिला दुर्ग । 
4. एक नायलोन की खड़ी धारीदार नमूने का थैला पुराना इस्तेमाली, जिसमें नीचे बीचा-बीच से जला हाकर छेद है, जिसके अन्दर रिश्वती रकम 500/-रुपयों के 4 नोट कुल 2,000/-रुपये, ऋण पुस्तिका भाग-1 के अन्दर रखकर व ऋण पुस्तिका भाग-2 राजकुमार-फकीरा के नाम की रखकर बैठने की कुर्सी के कोने पर टांग दिया था, का वजह सबूत जप्त कर, कब्जे में लिया गया । 
42- उपरोक्त प्रदर्श पी-5 एवं प्रदर्श पी-6 के जप्ती कार्यवाही की पुष्टि पंच साक्षियों, विवेचक, प्रार्थी अर्जुन साहू तथा अ.सा-8 मनहरण लाल ने भी किया है । अभियुक्त की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया है कि प्रार्थी का कोई भी कार्य आरोपी के पास लम्बित नहीं था तथा वह बताये गये कार्य को करने में सक्षम नहीं था, इसलिये उसे प्रकरण में झूठा फंसाया गया है । उक्त सम्बंध में अ.सा-6 अर्जुन साहू ने अपने साक्ष्य में स्पष्टीकरण दिया है कि वह अपने भाई राजकुमार के लिये कार्य कर रहा था, क्योंकि वह बड़ा भाई था और वे लाग एक-दूसरे की मदद करते हैं । प्रार्थी और उसके भाईयां के मध्य खाता विभाजन की कार्यवाही दिनांक 07-07-2003 को की गई थी, जिसका उल्लेख नामान्तरण पंजी में है और जिसे अभियुक्त की ओर से विवादित नहीं किया गया है । बचाव साक्षी क्रमांक-4 श्रीकान्त वर्मा ने खाता विभाजन का आदेश पारित करना तथा रिकार्ड अद्यतन करने का निर्देश हल्का पटवारी का देना स्वीकार किया है । प्रार्थी अ.सा-6 अर्जुन साहू का यह भी स्पष्टीकरण है कि उन्हें बाद में जानकारी हुई कि ब्यारा की 60 डिसमिल जमीन, जो उनकी मॉं के द्वारा 20 वर्ष पूर्व खरीदा गया था, उसका नामान्तरण नहीं हो पाया है, जिसे वे लाग आपसी राजीनामा से अपने भाई राजकुमार के नाम चढ ़ाना चाहते थे, 31 जिसके सम्बंध में बातचीत करने पर आरापी ने जमीन का स्टॉम्प पेपर और राजकुमार का ऋण पुस्तिका अपने पास रखा था । उल्लेखनीय है कि राजकुमार के नाम की ऋण पुस्तिका और क्रय किये गये भूमि का पंजीकृत विक्रय-पत्र दिनांक 26-04-1978 स्टॉम्प मूल स्वरूप में तथा सम्बंधित भूमि का राजस्व दस्तावेज जप्त किये गये हैं तथा प्रकरण में संलग्न हैं । 


43- धारा-109 भू-राजस्व संहिता में भूमि के अधिकार अर्जन की मौखिक या लिखित रिपोर्ट पटवारी को किये जाने का उल्लेख किया गया है तथा धारा-110 भू-राजस्व संहिता में लेख है कि :- 
धारा 110. क्षेत्र-पुस्तक तथा अन्य सुसंगत भू-अभिलेखों में अधिकार अज र्न बाबत नामान्तरण - (1) पटवारी अधिकार के प्रत्येक ऐसे अर्जन को, जिसकी कि रिपोर्ट उसे धारा 109 के अधीन की गई हो या जो ग्राम पंचायत या किसी अन्य स्त्रात से प्राप्त प्रज्ञापन पर से उसकी जानकारी में आये, उस रजिस्टर में दर्ज करेगा, जा कि उस प्रयाजन के लिये विहित किया गया । 
(2) पटवारी अधिकार अर्जन सम्बंधी समस्त ऐसी रिपोर्टे, जो उपधारा (1) के अधीन उसे प्राप्त हुई हां, उन रिपार्टों के उसे प्राप्त होने के तीस दिन के भीतर तहसीलदार को प्रज्ञापित करेगा । 
(3) उपधारा (2) के अधीन पटवारी से प्रज्ञापना के प्राप्त हाने पर, तहसीलदार उसे विहित रीति में ग्राम में प्रकाशित करवायेगा और उसकी लिखित प्रज्ञापना उन समस्त व्यक्तियां को, जा कि उसे नामान्तरण में हितबद्ध प्रतीत होते हों, तथा साथ-ही ऐसे अन्य व्यक्तियो ं एव ं प्राधिकारियां को भी देगा, जा कि विहित किये जाएं । 
(4) तहसीलदार हितबद्ध व्यक्तियों का सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् तथा ऐसी अतिरिक्त जांच, जैसी कि वह आवश्यक समझे, करने के पश्चात्, क्षेत्र-पुस्तक तथा अन्य सुसंगत भू-अभिलेखां में आवश्यक प्रविष्टि करेगा । 
44- उपरोक्त प्रावधान के अनुसार पटवारी को अधिकार अर्जन की रिपोर्ट किये जाने पर वह तहसीलदार के समक्ष प्रस्ताव प्रस्तुत करता है । छत्तीसगढ़ राज्य में सामान्यतः ग्रामीण व्यक्ति नामान्तरण सम्बंधी मामले के लिये पटवारी पर निर्भर रहते हैं । अभियुक्त पटवारी के पास प्रार्थी तथा राजकुमार की मॉं के व अन्य के पक्ष में 32 निष्पादित मूल बैनामा तथा राजकुमार का भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका जप्त किया गया है। यद्यपि अभियुक्त पटवारी बिना तहसीलदार के आदेश के प्रमाणीकरण करने में सक्षम नहीं था, किन्तु वह नामान्तरण की कार्यवाही के लिये एक माध्यम था तथा प्रक्रिया के अनुसार प्रस्ताव बनाकर प्रार्थी के भाई राजकुमार के नाम से वांछित भूमि का नामान्तरण कराने की कार्यवाही कराने में सक्षम था । इस सम्बंध में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 का स्पष्टीकरण ’घ’ अवलोकनीय है । इस प्रकार अभियुक्त की ओर से प्रस्तुत तर्क कि, अभियुक्त के पास प्रार्थी का काई कार्य लम्बित नहीं था, स्वीकार करने योग्य नहीं है । 
45- प्रार्थी एवं अ.सा-8 मनहरण लाल द्वारा कथन किया गया है कि प्रार्थी और उसके भाईयों के मध्य अभियुक्त ने 5,000/-रुपये लेकर खाता विभाजन कर दिया था । यद्यपि 5,000/-रुपये की लेनदेन का काई साक्ष्य नहीं है, परन्तु इन दोनां ही साक्षियों ने स्पष्ट कथन किया है कि ग्राम सुरडुंग के प्रार्थी तथा उसके भाईयां के पुराने ब्यारा से लगी हुई 60 डिसमिल जमीन, जो उसकी मॉं के द्वारा खरीदा गया था, के प्रमाणीकरण के लिये अभियुक्त 2,000/-रुपये की रिश्वत मांग रहा था । प्रार्थी अ.सा-6 अर्जुन साहू एव ं अ.सा-8 मनहरण लाल का साक्ष्य इस सम्बंध में अखण्डित रहा है । पंच साक्षी अ.सा-2 रणवीर सिंह ने शिकायत आवेदन के सम्बंध में जानकारी नहीं देने का कथन किया है, किन्तु तथा अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन ने प्रदर्श पी-14 के आवेदन को पढ ़ना स्वीकार किया है। प्रतिपरीक्षण में इन साक्षियों ने कथन किया है कि प्रार्थी, अभियुक्त के विरुद्ध शिकायत लेकर आया था । अभियोजन का यह कथन रहा है कि अभियुक्त द्वारा अवैध पारिश्रमिक से भिन्न 33 2,000/-रुपये की रिश्वत की मांग की गई, जा कि प्रार्थी तथा छाया साक्षी व पंच साक्षी सैय्यद शमीमुद्दीन के साक्ष्य एवं प्रदर्श पी-14 के आवेदन से प्रमाणित हाता है । 
46- अ.सा-9 विवेचक नवीनशंकर चौबे का साक्ष्य है कि दिनांक 31-12- 2003 को ट्रेप दल का गठन कर, अभियुक्त को रिश्वत लेते हुये रंगेहाथों पकड़ा गया तथा उसके हाथों का धुलाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया था। उक्त कार्यवाही की पुष्टि पंच साक्षी अ.सा-2 रणवीर सिंह व अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन, प्रार्थी अ.सा-6 अर्जुन साहू, अ.सा-8 मनहरण लाल एवं अ.सा-10 शिवबदन मिश्रा, आरक्षक ने भी किया है । रासायनिक परीक्षण प्रतिवेदन में अभियुक्त के हाथां को धुलाये जाने के घोल में प्रतिवेदन धनात्मक रहा है । वस्तुतः अभियुक्त की ओर से रिश्वती रकम प्राप्त होने के पश्चात् उसके हाथां को धुलाये जाने पर गुलाबी रंग होने के तथ्य को खण्डित नहीं किया जा सका है और इसके विपरीत कथन किया गया है कि स्वैच्छिक मांग व स्वैच्छिक प्रतिग्रहण के अभाव में अभियुक्त के हाथां को धुलाये जाने से गुलाबी रंग प्राप्त होने मात्र से ही दाषसिद्धि नहीं की जा सकती है । 
47- अभियुक्त की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि रिश्वत की रकम अभियुक्त से प्राप्त नहीं हुई है । रिश्वती रकम, पटवारी कार्यालय में रखे झोले से प्राप्त हुई है, जिसे कोई भी रख सकता था, इसलिये अभियुक्त सन्देह का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है । अ.सा-4 सैय्यद शमीमुद्दीन ने अभियुक्त की तलाशी लिया था और अपने साक्ष्य में स्वीकार किया है कि आरोपी की तलाशी में उसने कुछ नहीं पाया था । इस साक्षी का यह भी कथन है कि आरापी और प्रार्थी के द्वारा बताये 34 जाने पर उसने झोले की तलाशी ली थी और झाले के अन्दर एक ऋण पुस्तिका में 500-500 रुपये के 4 नोट कुल 2000/-रुपये रखा होना पाया था । उक्त नोटों और ऋण पुस्तिका के जप्ती की कार्यवाही प्रदर्श पी-5 है । झोले से नोट की रकम प्राप्त होने के तथ्य को दोनां पंच साक्षी, प्रार्थी, विवेचक व अ.सा-8 मनहरण लाल ने प्रमाणित किया है । 


48- उल्लेखनीय है कि जिस ऋण पुस्तिका में 500-500 रुपये के 4 नोट दबे थे, वह नोट प्रार्थी के भाई राजकुमार के नाम के ऋण पुस्तिका में दबे थे । उक्त ऋण पुस्तिका को भी सोडियम कार्बोनेट के घोल में डुबाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी हुआ था । बचाव साक्षी क्रमांक-3 दधीचि सिंह का साक्ष्य है कि घटना दिनांक का पटवारी कार्यालय में आकर अर्जुन ने आरोपी से ऋण पुस्तिका मांगा था, जिसे अभियुक्त पटवारी द्वारा अपने थैले से निकालकर दिया गया था तथा अर्जुन द्वारा कुछ समय बाद वही ऋण पुस्तिका वापस करने से पटवारी ने ऋण पुस्तिका लेकर अपने थैले में डाल लिया था । उसी समय मनहरण तेजी से ऑफिस से निकला और लोकायुक्त वालों ने आकर पकड़ लिया । इस प्रकार ब.सा-3 दधीचि सिंह के साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि जो झोला जप्त किया गया था, वह झाला अभियुक्त का था । इस साक्षी ने यद्यपि यह कथन किया है कि उसके सामने पैसे लेनदेन की कोई बातचीत नहीं हुई थी, परन्तु अभियुक्त ने अपने अभियुक्त कथन में राजकुमार की ऋण पुस्तिका उसके झाले में किस उद्देश्य से रखी गई थी, इसका स्पष्टीकरण नहीं दिया है और इस बात का भी स्पष्टीकरण नहीं दिया है कि ऋण पुस्तिका में रखे गये नोट यदि उसने नहीं छूआ था, तो सोडियम कार्बोनेट में धुलवाने से उसके हाथ का रंग गुलाबी कैसे हुआ । इसके अतिरिक्त अभियुक्त द्वारा प्रार्थी के भाई की ऋण पुस्तिका में रिश्वती रकम का रखे जाने से स्पष्ट निष्कर्ष प्राप्त होता है कि वह याददाश्त के लिये प्रार्थी के कार्य में रकम प्राप्त हो जाने की पुष्टि में राजकुमार की ऋण पुस्तिका में रिश्वती रकम रखा था, जिससे भी अभियुक्त द्वारा रिश्वती रकम का स्वैच्छिक प्रतिग्रहण साबित होता है । 
49- अभियुक्त द्वारा प्रार्थी अर्जुन के जीजा मनहरण लाल द्वारा रंजिशवश उसे झूठा फंसाने का भी आधार लिया गया है, परन्तु वह ब.सा-1 अरविन्द कुमार शर्मा तथा अ.सा-8 मनहरण लाल के प्रतिपरीक्षण में ऐसा काई तथ्य स्पष्ट करने में असफल रहा कि मनहरण उससे रजिश रखता था और उसके कहने पर प्रार्थी अर्जुन साहू ने अभियुक्त का झूठा फंसाया है । अभियोजन का आधार रहा है कि अभियुक्त ने प्रार्थी से 2,000/-रुपये की रिश्वत की स्वैच्छिक मांग की और उसके पास इस राशि की मांग का अवसर उपलब्ध था, जिसे उसने स्वेच्छया प्राप्त किया । अभियोजन द्वारा प्रारम्भिक कार्यवाही पंचनामा तथा ट्रेप पश्चात् कार्यवाही पंचनामा एवं जप्ती की कार्यवाही को साक्ष्य एवं दस्तावेज से प्रमाणित किया गया है । वर्ष 2003 की घटना के लगभग 4-5 साल बाद साक्ष्य होने से अभियाजन साक्षियों के साक्ष्य में, उनके धारा-161 दं0प्र0संहिता के बयानों के परिप्रेक्ष्य में कुछ विसंगतियां आई हैं, परन्तु उक्त विसंगतियों के बाद भी अभियोजन सारभूत रूप से अखण्डित रहा है तथा यह प्रमाणित हुआ है कि अभियुक्त द्वारा प्रार्थी और उसके भाईयां से स्वेच्छया नामान्तरण कार्यवाही के लिये 2,000/-रुपये रिश्वत की मांग की गई और उक्त मांग के अनुसरण में दिनांक 31-12-2003 को पटवारी कार्यालय में 2,000/-रुपये स्वैच्छिक रूप से प्राप्त किया गया । 
50- उपरोक्त परिस्थितियों में अभियुक्त की ओर से बचाव में जो आधार लिये गये हैं, वह स्वीकार करने योग्य नहीं हैं । इसी प्रकार अभियुक्त, इस प्रकरण के तथ्यों एवं परिस्थितियों में उसकी ओर से प्रस्तुत न्याय दृष्टान्त शिवकुमार विरुद्ध म0प्र0राज्य (अब छत्तीसगढ़) 2015(5) सी.जी.एल.जे. 315, यशवन्त राव मराठा विरुद्ध म0प्र0राज्य (अब छत्तीसगढ़) 2012(1) सी.जी.एल.जे. 132, केरल राज्य एवं अन्य विरुद्ध सी.पी.राव, (2011) 6 सुप्रीम कोर्ट केसेस 450, रामकुमार वर्मा विरुद्ध म0प्र0राज्य 2010(1) सी.जी.एल.जे. 68, महाराष्ट्र राज्य विरुद्ध दयानेश्वर लक्ष्मण राव वानखेड़े 2010(1) सी.जी.एल.जे. 384 (एस.सी.), म0प्र0राज्य (अब छत्तीसगढ़) विरुद्ध विजय कुमार, 2007(2) सी.जी.एल.जे. 536, वी.वेंकट सुब्बाराव विरुद्ध आंध्रप्रदेश राज्य, ए.आई.आर. 2007 सुप्रीम कोर्ट 489, श्रीमती मीना बलवन्त हेमके विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर. 2000 सुप्रीम कार्ट 3377, एम.के.हर्षन विरुद्ध केरल राज्य, (1996) 11 सुप्रीम कोर्ट केसेस 720, पन्नालाल दामोदर राठी विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, (1979) 4 सुप्रीम कोर्ट केसेस 526, नामदेव दौलत दयागुडे़ एवं अन्य विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, ए.आई.आर. 1977 सु0को0 381, सी.बी.आई. विरुद्ध अशोक कुमार अग्गरवाल, 2014 क्रि.लॉ.ज. 930, दीवानचंद विरुद्ध राज्य, 1982 क्रि.लॉ.ज. 720, निर ंजन खटुवा विरुद्ध उड़ीसा राज्य, 1990 क्रि.लॉ.ज. 2790, महाराष्ट्र राज्य विरुद्ध रामकृष्ण डोरकर, 1995 क्रि.लॉ.ज. 2521, ज्ञानप्रकाश शर्मा विरुद्ध सेण्ट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन, छत्तीसगढ़ एवं अन्य, 2004 क्रि.लॉ.ज. 3817, राजेश सिंह विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य, 2007(2) एम.पी.एच.टी. 76 में प्रतिपादित सिद्धान्तां का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी 37 नहीं होना पाया जाता है । 
51- माननीय छ0ग0उच्च न्यायालय द्वारा न्याय दृष्टान्त गया प्रसाद तेलगाम विरुद्ध मध्यप्रदेश राज्य (वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य), 2013 क्रि.लॉ.ज. 3831 में निर्धारित किया गया है कि रिश्वती रकम अभियुक्त से बरामद होने पर उसकी ओर से उचित स्पष्टीकरण नहीं आने पर न्यायालय यह उपधारणा करेगी कि उसके द्वारा अवैध पारिश्रमिक, लोक कर्तव्य के दौरान प्राप्त किया गया, जैसा कि कंडिका-23 में उल्लेखित है :- 
23. In the instant case, currency notes of Rs. 200/- were recovered from the appellant and the numbers thereof were compared with the numbers mentioned in the Pre-Trap Panchanama (Ex. P-2), which were found to be similar. The appellant did not offer any proper and plausible explanation for recovery of money from him. It is proved that tainted money was recovered from the appellant, therefore, in the facts and circumstances of the case, a presumption can be drawn against him that he demanded and accepted illegal gratification. In such a situation, this Court is under a legal compulsion to draw a legal presumption that such gratification was accepted as a reward for doing the public duty.

52- प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्य एवं दस्तावेजां से यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त का, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा-7 एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के तहत् आपराधिक अवचार का अपराध कारित करने का आपराधिक आशय था । विवेचना एवं विचारण की कार्यवाही में कुछ विसंगतियां दर्शित हुई हैं, किन्तु उक्त विसंगतियां तात्विक नहीं हैं । अभियोजन द्वारा आरोपित अपराध के आवश्यक तत्वों की पूर्ति किया गया है । इस प्रकार अभियोजन द्वारा आरोपित अपराध को सन्देह से परे प्रमाणित किया गया है । अतएव विचारणीय बिंदु क्रमांक-1 से 3 का निष्कर्ष ’’प्रमाणित’’ में दिया जाता है, अतः अभियुक्त को आरोपित अपराध, अंतर्गत धारा-7 एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, में दोष-सिद्ध पाया जाता है । अभियुक्त और शासन को दण्ड के प्रश्न पर सुने जाने के लिये निर्णय लिखना स्थगित किया गया । 
सही/-
(सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू) 
विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम)
दुर्ग (छ.ग.)
53- दण्ड के प्रश्न पर आरोपी और उसके अधिवक्ता का निवेदन है कि यह उसका प्रथम अपराध है, पूर्व से कोई दोष-सिद्धि नहीं है, पिछले 12 वषार्ं से विचारण की पीड ़ा सहन किया है तथा उसका परिवार है और वह अपने परिवार का एकमात्र आय अर्जित करने वाला व्यक्ति है, अतः उसे न्यूनतम दण्ड से दण्डित किया जावे । 54- शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक का निवेदन है कि अपराध की प्रकृति को देखते हुये अभियुक्त का कठोर दण्ड से दण्डित किया जावे । 55- उभय-पक्ष के निवेदन पर विचार किया गया । अभियुक्त को दिनांक 31-12-2003 का किये गये अपराध के परिप्रेक्ष्य में दण्डित किया जाना है । धारा-7 एवं धारा-13 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में उल्लेखित दण्डादेश में वर्ष 2014 में संशोधन हुआ है, जिसमें धारा-7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में न्यूनतम अवधि 06 माह के स्थान पर 03 वर्ष तथा अधिकतम अवधि 05 वर्ष के स्थान पर 07 वर्ष प्रतिस्थापित किया गया है एवं कारावास के दण्ड के साथ ही अर्थदण्ड का भी प्रावधान किया गया है । इसी प्रकार धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में न्यूनतम अवधि 01 वर्ष के स्थान पर 04 वर्ष तथा अधिकतम अवधि 07 वर्ष के स्थान पर 10 वर्ष प्रतिस्थापित किया गया है । इस धारा में भी कारावास के दण्ड के साथ अर्थदण्ड का भी प्रावधान किया गया है । स्थापित सिद्धान्तों के अनुसार घटना दिनांक 39 31-12-2003 का अभियुक्त द्वारा अपराध कारित करने की स्थिति का देखते हुये अभियुक्त, धारा-7 एवं धारा-13 भ्रष्टाचार अधिनियम में संशोधन पूर्व उल्लेखित दण्डादेश के अंतर्गत दण्डित किये जाने का अधिकारी है । 
56- अतः उभय-पक्ष के निवेदन पर विचार करते हुये धारा-7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अपराध में अभियुक्त का एक वर्ष के कठार कारावास और 1,000/-(एक हजार) रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया जाता है । अर्थदण्ड नहीं पटाने की दशा में एक माह का कठोर कारावास की सजा पृथक् से भुगताया जावे। अभियुक्त को धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत् दो वर्ष के कठार कारावास और 2,000/-(दो हजार) रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया जाता है एवं अर्थदण्ड नहीं पटाने की दशा में दो माह का कठोर कारावास की सजा पृथक् से भुगतायी जावे । अभियुक्त को दी गई दोनों सश्रम कारावास की सजाएं साथ-साथ भुगतायी जावे । अभियुक्त के अभिरक्षा की अवधि का पृथक् से धारा-428 दण्ड प्रक्रिया संहिता का प्रमाण-पत्र बनाया जावे । 
57- प्रकरण में जप्त रिश्वती रकम 500-500 के पुराने 04 नोट हैं । भारत सरकार द्वारा 500 के पुराने नोटों का प्रचलन बंद कर दिया गया है, जिसके कारण जप्त 500/-रुपये के 4 नोट मूल्यहीन हो गये हैं, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक में जमा किया जावे । अभियुक्त द्वारा अर्थदण्ड की राशि 3,000/-रुपये जमा करने पर उसमें से 2,000/-रुपये प्रार्थी अर्जुन साहू को क्षतिपूर्ति के रूप में प्रदान किया जावे । अन्य जप्तशुदा सम्पत्ति, यथा- प्रदर्शन घोल की सीलबंद शीशी, अभियुक्त माधव सिंह चन्देल से जप्त नायलोन का झाला तथा ट्रेप पश्चात् तैयार किये गये घोलों की 40 शीशियां मूल्यहीन होने से नष्ट किया जावे । प्रकरण में राजस्व विभाग के जप्त रजिस्टर व अभिलेख सम्बधित हल्का पटवारी को वापस किया जावे । राजकुमार के नाम की ऋण पुस्तिका तथा भूमि के सम्बंध में जप्त मूल बैनामा दिनांक 26-04-1978 व राजस्व अभिलेख राजकुमार अथवा उसके भाई प्रार्थी अर्जुन साहू को प्रदान किया जावे । उपरोक्त आदेश का क्रियान्वयन अपील अवधि पश्चात् लागू किया जावे, अपील होने की स्थिति में माननीय अपीलीय न्यायालय के आदेशानुसार सम्पत्तियों का निराकरण किया जावे। 
दुर्ग, दिनांक : 30-03-2017
सही/-
(सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू) 
विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम)
दुर्ग (छ.ग.)



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