Saturday, 29 October 2016

लोक अदालत

लोगों को शीघ्र एवं सस्ता न्याय सुलभ कराने हेतु लोक अदालतों का आयोजन तहसील, जिला तथा उच्च न्यायालय में किया जाता है। लोक अदालत में आपसी समझाईस एवं सुलह के आधार पर सौहाद्र पूर्वक वार्ता कर प्रकरणों का निराकरण किया जाता है। लोक अदालतों में दीवानी, फौजदारी (समझौता योग्य) राजस्व, श्रम तथा अन्य न्यायालयीन प्रकरणों के निराकरण हेतु संबंधित न्यायालय में आवेदन दिया जा सकता है। निराकृत प्रकरणों की अपील नहीं की जा सकती है। निराकृत प्रकरणों पर पूर्व में लगाया गया न्याय शुल्क की संपूर्ण राशि वापस की जाती है। ऐसे प्रकरण जो न्यायालय में पेश नहीं हुए हैं, प्री-लिटिगेशन को भी लोक अदालत में निराकरण हेतु विधिवत् तैयार कर बिना न्याय शुल्क के पेश किया जा सकता है। लोक अदालत का अधिनिर्णय सिविल न्यायालय की डिक्री के समतुल्य है तथा उसी प्रकार निष्पादित किया जा सकता है। प्रत्येक माह जिला तथा तहसील न्यायालयों में एक स्थायी एवं निरंतर लोक अदालतों की बैठक तथा प्रत्येक दूसरे माह एक वृहद लोक अदालत का आयोजन किया जाता है। साथ ही राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली के निर्देशानुसार नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया जाता है।
न्यायालय में विचारधीन मामलों को लोक अदालत के माध्यम से निराकृत कराने हेतु सम्बधित न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। प्री-लिटिगेशन मामले को लोक अदालत के माध्यम से निराकृत कराने हेतु जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।
प्री-लिटिगेशन मामले पर न्याय शुल्क से छूट प्रदान की गई है तथा न्यायालय के विचाराधीन मामले जिनका निराकरण लोक अदालत के माध्यम से होता है उनमें पूर्व से अदा की गई न्याय शुल्क वादी को वापस कर दिया जाता है।
पेंशन लोक अदालत
सेवानिवृत्त शासकीय/अर्द्धशासकीय सेवकों को सेवानिवृत्ति के पश्चात् मिलने वाली परिलब्धियों के निराकरण हेतु बिलासपुर, रायपुर तथा दुर्ग में पेंशन लोक अदालत का गठन किया गया है। माह के दूसरे, तीसरे एवं चौथे रविवार को जिला न्यायालय में इसकी बैठक निर्धारित की गई है। आवेदन संबंधित क्षेत्रानुसार सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पूर्ण जानकारी सहित बिना किसी शुल्क के अपने तथा नियोक्ता के पूरे नाम व पते के साथ प्रेषित की जा सकती है।
स्थायी लोक अदालत जनोपयोगी सेवाऐं
छ.ग. राज्य के अंतर्गत आम नागरिकों के लिए स्थायी लोक अदालत जनोपयोगी सेवाऐं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जगदलपुर एवं अम्बिकापुर में स्थापित की गई है। इनका जिलेवार क्षेत्राधिकार निम्नानुसार है
1. रायपुर - रायपुर, बलौदा-बाजार, महासमंुद एवं धमतरी सिविल जिले।
2. बिलासपुर - बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर-चांपा एवं रायगढ़ सिविल जिले;
3. दुर्ग - दुर्ग, राजनांदगॉव, बालोद, बेमेतरा एवं कबीरधाम सिविल जिले।
4. जगदलपुर - बस्तर (जगदलपुर), उत्तर बस्तर (कांकेर), कोंण्डागॉव एवं दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा) सिविल जिले।
5. अम्बिकापुर - सरगुजा (अम्बिकापुर), कोरिया, जशपुर एवं सुरजपुर सिविल जिले।
उपरोक्त प्रत्येक जनोपयोगीय लोक अदालत में एक न्यायिक अधिकारी (उच्चतर न्यायिक सेवा से) अध्यक्ष के रूप में तथा दो सदस्य नियुक्त किये गये है।
उक्त जनोपयोगीय स्थायी लोक अदालत के समक्ष बिना कोई शुल्क या फीस अदा किए कोई भी नागरिक निम्न सेवाओं से संबंधित अव्यवस्था, असुविधा, अनियमितता, असावधानी या सेवा में कमी को दूर कर उसे व्यवस्थित एवं ठीक कराने के साथ-साथ पीड़ित पक्षकार आवश्यक व उचित क्षतिपूर्ति भी प्राप्त करने हेतु आवेदनपत्र पूर्ण विवरण सहित कर सकता है।
जनोपयोगी स्थायी लोक अदालत में निम्न लोक उपयोगी सेवा के विषयों पर आवेदन किया जा सकता है-
01. परिवहन की सेवा जिसमें यात्री वाहन, सामग्री ढोने वाली वाहन के साथ-साथ वायु सेवा व जलयान सेवा भी शामिल है,
02. डाक तार या दूरभाष की सेवा संबंधी,
03. किसी संस्थापन (अधिष्ठान) के द्वारा जनता को शक्तिप्रकाश (लाईट) अथवा जल की आपूर्ति की जाती है उससे संबंधित शिकायत संबंधी आवेदन दे सकते हैं,
04. सार्वजनिक सफाई अथवा स्वच्छता की प्रणाली की शिकायत,
05. औषधालय या चिकित्सालय में सेवा की शिकायत,
06. बीमा सेवा (तृतीय पक्षकार के मामलों को छोड़कर)।
उपरोक्त संबंध में किसी भी प्रकार की शिकायत का आवेदन स्थायी लोक अदालत में देकर शीघ्रातिशीघ्र उस समस्या का उपचार कराया जा सकता है। संबंधित स्थायी लोक अदालत को जिम्मेदारी दी गई है कि वे संबंधित समस्या का तत्काल अर्थात अविलंब निराकरण करे।
नागरिकों को उपरोक्त सेवा का लाभ लेते हुए अविलम्ब आवश्यक सुधार करवाने की ओर कदम बढ़ाकर नगर को स्वच्छ सुन्दर और खुशहाल बनाना चाहिए।
लीगल एड क्लीनिक
जिस प्रकार बीमारियों के उपचार हेतु क्लीनिक की स्थापना की जाती है, इसी प्रकार कानूनी समस्याओं के निवारण/समाधान हेतु पैरालीगल एड क्लीनिक की स्थापना की जाती है।
इसके अंतर्गत विधि के प्राध्यापक, छात्र तथा अधिवक्ता अपनी सेवाएं देते हैं तथा पीड़ित व्यक्ति को निःशुल्क कानूनी सलाह आवश्यकता पड़ने पर विधिक सहायता उपलब्ध कराने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रत्येक लीगल एड क्लीनिक में दो प्रशिक्षित पैरालीगल वालांटियर्स की नियुक्ति की गई है जो निर्धारित कार्य दिवस में जरूरतमंद लोगो की सहायता/मदद के लिए कार्यालीन समय में उपलब्ध रहते है।

निःशुल्क कानूनी सहायता सलाह

न्याय सबके लिए है, न्याय पाने का सभी को समान अधिकार है। यदि आप अपना प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहते हैं, या आपका कोई प्रकरण न्यायालय में लम्बित है? तो आपकी गरीबी आपको न्याय दिलाने में रूकावट नहीं होगी, अब आपके प्रकरणों में तहसील स्तरीय न्यायालय से उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय तक न्याय दिलाये जाने हेतु विधिक सेवा समितियां, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण व उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समितियां कार्य कर रहे है।
कौन कौन व्यक्ति विधिक सेवा/विधिक सलाह पाने का हकदार है:-
1. वह व्यक्ति जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य है।
2. वह व्यक्ति जो मानव दुर्व्यवहारों से या बेगारों से सताया गया है।
3. स्त्री या बालक है।
4. मानसिक रूप से अस्वस्थ या अन्यथा असमर्थ है।
5. वह व्यक्ति जो अनापेक्षित अभाव जैसे बहु-विनाश, जातीय हिंसा, अत्याचार, बाढ़-सूखा, औद्योगिक विनाश की दशाओं के अधीन सताया हुआ है, या 
6. कोई औद्योगिक कर्मकार या,
7. अभिरक्षा में है जिसके अंतर्गत अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 के अंतर्गत किसी संरक्षण गृह में या किशोर मनश्चिकित्सीय अस्पताल परिचर्या गृह में रखा गया व्यक्ति भी है, या
यदि मामला उच्चतम न्यायालय से भिन्न किसी अन्य न्यायालय के समक्ष है भारत का कोई नागरिक जिसकी समस्त स्रोतों से वार्षिक आय 1,00,000/- रूपये (अंकन एक लाख) से अधिक न हो विधिक सेवा पाने का हकदार होगा।
विधिक सेवा एवं सलाह किन-किन रूपों में प्राप्त की जा सकेगी:-
1. कोर्ट फीस, आदेशिका फीस, साक्षियों तथा पेपर बुक के व्यय, वकील फीस और कानूनी कार्यवाही के संबंध में देय समस्त खर्च, कानूनी कार्यवाहियों में वकील उपलब्ध कराना।
2. कानूनी कार्यवाहियों में निर्णय आदेशों, साक्ष्य की टिप्पणियों तथा अन्य दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियां उपलब्ध कराना।
3. कानूनी कार्यवाहियों में पेपर बुक तैयार करना, जिसमें दस्तावेजों, मुद्रण-टंकण तथा अनुवाद के खर्च सम्मिलित है।
4. कानूनी दस्तावेजों का प्रारूपण कराना।
5. किसी मामले में कानूनी सलाह देना।
विधिक सहायता किन अदालतों में प्राप्त की जा सकती है:-
विधिक सहायता जिले तथा तहसील में स्थित दीवानी, फौजदारी, राजस्व सहित सभी न्यायालय, उच्च न्यायालय, राजस्व मंडल एवं सर्वोच्च न्यायालय हेतु प्राप्त की जा सकती है।
विधिक सेवा के लिए आवेदन कैसे करें:-
1. विधिक सहायता के लिए आवेदन पत्र जिले में सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या
जिला विधिक सहायता अधिकारी को।
2. तहसील में स्थित व्यवहार न्यायालय में पदस्थ वरिष्ठ न्यायाधीश को।
3. उच्च न्यायालय के लिए सचिव, उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति को।
4. सुप्रीम कोर्ट के लिए सचिव सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेस कमेटी नई दिल्ली को।
5. आवेदन प्त्र संबंधित न्यायालय के न्यायाधीश को भी दिये जा सकते हैं।
मजिस्ट्रेट न्यायालय में विधिक सहायता अधिवक्ता:-
प्रतिनिधित्व विहीन व्यक्तियों को अभिरक्षा अवधि में न्यायालय में सम्मानजनक पैरवी सुनिश्चित करने एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिए रिमाण्ड का विरोध करने, जमानत कराने तथा मजिस्ट्रेट न्यायालय में पैरवी कराने हेतु विधिक सहायता अधिवक्ता की नियुक्ति की गयी है ताकि प्रतिनिधित्व विहीन अभिरक्षा में रह रहे व्यक्तियों को समानता के आधार पर न्याय प्राप्त हो सके।
जिला तथा तहसील के न्यायिक तथा कार्यपालिक दंडाधिकारी के न्यायालय हेतु अधिवक्ताओं की नियुक्ति की गयी है। अभिरक्षाधीन व्यक्ति विधिक सहायता अधिवक्ता के माध्यम से पैरवी कराने हेतु आवेदन कर सकते हैं।
विधिक सेवा ऑन लाईन:-
दूरस्थ ग्रामीण एवं वनांचल में रहने वाले विधिक सेवा ऑन लाईन के जरिये विधिक सेवा योजनाओं की जानकारी तथा निःशुल्क विधिक सलाह प्राप्त कर सकते हैं, उसके लिए प्रत्येक जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों में ऑनलाईन टेलीफोन स्थिपित है। साथ ही राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, बिलासपुर के दूरभाष क्रमांक 07752-410210 में अथवा टोल फ्री नं. 1800 233 2528 में भी संपर्क कर सकते हैं।

समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976

अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाएं:-
1. पारिश्रमिक:- पारिश्रमिक से अर्थ है कि किसी व्यक्ति को उसके काम के बदले में दी जाने वाली मजदूरी या वेतन और अतिरिक्त उपलब्धियां चाहे वे नगद या वस्तु के रूप में दी गयी हो।
2. एक ही काम या समान प्रकृति का काम:- एक ही काम या समान प्रकृति के काम से तात्पर्य ऐसे कार्य से है जिसके करने में समान मेहनत, कुशलता या जिम्मेदारी की जरूरत हो, ज बवह समान परिस्थिति में किसी महिला या पुरूष द्वारा किया जाता है।
पुरूष और महिला काम करने वालों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए मजदूरी देने के लिए मालिक के कर्तव्य:- कोई भी मालिक किसी भी मजदूर को लिंग के आधार पर एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिए एक समान मजदूरी या वेतन भुगतान करेगा। मजदूरी दर में अंतर नही करेगा।
भर्ती में लिंग के आधार पर भेदभाव:- किसी भी व्यक्ति समान प्रकृति के कार्य की भर्ती के दौरान पुरूष व महिला में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। पदोन्नति (प्रमोशन) अभ्यास (प्रशिक्षण) या स्थानांतरण में भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है। परंतु अगर कोई कानून किसी कार्य में महिला की भर्ती पर रोक लगाता है, तो यह अधिनियम उस पर लोगू नहीं होगा।
सलाहकार समितियां:- महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराने के लिए सरकार एक या एक से ज्यादा सलाहकर समितियों का गठन करेगी , जो ऐसे प्रतिष्ठानों या केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचित रोजगारों में महिलाओं को नियोजित करने की सीमा के संबंध में सलाह देगी। सलाहकार समिति अपनी सलाह सरकार को सौंपते समय प्रतिष्ठानों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या, काम की प्रकृति, काम के घंटे और वह सभी आवश्यक बातें महिलाओं को रोजगार प्रदान करने के अवसरों को बढ़ावा देती हो उनका ध्यान रखेगी।
शिकायतें एवं दावे:- सरकार अधिसूचना द्वारा अधिकारियों की नियुक्ति करेगी, जो इस अधिनियम के उल्लंघन की शिकायतें और समान मजदूरी न प्राप्त होने से संबंधित दावों की सुनवाई और उस पर फैसला देंगे। यह अधिकारी श्रम अधिकारी के पद से नीचे का काम नहीं होगा। यह अधिकारी पूरी जांच के बाद शिकायत करने वाले को समान मजदूरी के संबंध में वह रकम जिसका वह हकदार है, देने का आदेश देगा तथा यह अधिकारी मालिक को आदेश दे सकता है कि वह ऐसे कदम उठायें जिससे इस अधिनियम का पालन हो सके। अगर शिकायतकर्ता या मालिक आदेश से खुश नहीं है तो वह 30 दिन के भीतर सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के सामने अपील कर सकते हैं।
रजिस्टर:- प्रत्येक मालिक उसके द्वारा कार्य करने वालों की सूची का रजिस्टर बनायेगा।
निरीक्षक (इंसपेक्टर):- सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत एक निरीक्षक नियुक्त करेगी, जो यह देखेगा कि अधिनियम के अंतर्गत दिये गये नियमों का सही ढंग से पालन हो रहा है या नहीं।
निरीक्षक किसी कार्य स्थान में जा सकता है। किसी भी व्यक्ति से पूछताछ कर सकता है और कोई भी कागजी रिकार्ड देख या मंगवा सकता है या उसकी फोटोकापी करवा सकता है।
निरीक्षक जब किसी व्यक्ति को पूछताछ या कागजी रिकार्ड के संबंध में बुलाता है तो ऐसे व्यक्ति का आना जरूरी है।
दण्ड एवं सजा:- इस अधिनियम के अंतर्गत अगर कोई भी मालिक -
1. अपने मजदूरी का रजिस्टर सुरक्षित नहीं रखता है
2. किसी भी तरह का कागजी रिकार्ड जो मजदूरों से संबंध रखता है, पेश नहीं करता।
3. किसी मजदूर को पेश होने से रोकता है।
4. कोई सूचना देने से इंकार करता है , तो उसे एक महीने की जेल एवं 10 हजार रूपये तक का जुर्माना हो सकता है।
इस तरह अगर कोई मालिक किसी मजदूर को:-
1.समान मजदूरी नियम का उल्लंधन करके भर्ती करता है।
2. वेतन में लिंग के आधार पर भेदभाव करता है।
3. किसी भी प्रकार का लिंग भेदभाव करता है।
4. सरकार के आदेशों का पालन नहीं करता है।
तो उसे कम से कम 10 हजार रूपये और अधिक से अधिक 20 हजार रूपये तक का जुर्माना हो सकता है या कम से कम तीन महीने, और अधिक से अधिक एक साल तक की जेल या दोनों भी हो सकती है। अगर वह व्यक्ति दुबारा ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसे दो साल तक की जेल हो सकती है।
अगर कोई भी व्यक्ति मालिक के कहने पर कोई भी कागजी रिकार्ड छिपाता है या उपलब्ध कराने से इंकार करता है तो उसे पांच सौ रू. का जुर्माना हो सकता है।
कंपनी द्वारा अपराध:- अगर यह अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो तो वह व्यक्ति जो उस समय कंपनी के कार्य को देख रहा हो और जिसका कंपनी के कार्य पर पूर्ण रूप से नियंत्रण हो, वह व्यक्ति और कंपनी जिम्मेदार माने जाएंगे।

बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986

बाल श्रम एक सामाजिक बुराई है जो एक समाज के एक कमजोर वर्ग की गरीबी व अशिक्षा से जुड़ी है। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्स मूलर ने कहा है कि ’’ पश्चिम में बच्चे दायित्व समझे जाते हैं जबकि पूर्व में बच्चे सम्पति’’ यह कथन भारत के संदर्भ में शत्-प्रतिशत सही है। 14 वर्ष के कम उम्र के बच्चे जो नियोजित है उन्हें बाल श्रमिक कहा जाता है जिनके हित संरक्षण हेतु बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 बनाया गया है जिसकी धारा-3 के अंतर्गत अधिसूचित खतरनाक क्षेत्रों में बाल श्रमिक नियोजन पूर्णतः प्रतिबंधित है जो मुख्यतः निम्न है:-
1. बीड़ी बनाना, तम्बाकू प्रशंसकरण
2. गलीचे बुनना
3. सीमेंट कारखाने में सीमेंट बनाना या थैलों में भरना
4. कपड़ा बुनाई, छपाई या रंगाई
5. माचिस, पटाखे या बारूद बनाना
6. अभ्रक या माईका काटना या तोड़ना
7. चमड़ा या लाख बनाना
8. साबुन बनाना
9. चमड़े की पीटाई, रंगाई या सिलाई
10. ऊन की सफाई
11. मकान, सड़क, वाहन आदि बनाना
12. स्लेट पेंसिल बनाना व पैक करना
13. गुमेद की वस्तुएं बनाना
14. मोटर गाड़ी वर्कशॉप व गैरेज
15. ईंट भट्ठा व खपरैल
16. अगरबत्ती बनाना
17. आटोमोबाईल मरम्म्त
18. जूट कपड़ा बनाना
19. कांच का सामान बनाना
20. जलाऊ कोयला और कोयला ईंट का निर्माण
21. कृषि प्रक्रिया में ट्रेक्टर या मशीन में उपयोग
22. कोई ऐसा काम जिसमें शीसा, पारा, मैगनीज, क्रोमियम, अगरबत्ती, वैक्सीन, कीटनाशक दवाई और ऐसबेस्टस जैसे जहरीली धातु व पदार्थ उपयोग में लाये जाते हैं आदि। 
खतरनाक क्षेत्रों में बाल श्रमिक नियोजित किये जाने पर धारा-14 के अंतर्गत दोषी नियोजक को कम से कम तीन माह एवं अधिकतम 1 वर्ष का कारावास एवं कम से कम 10 हजार रूपये तथा अधिकतम 20 हजार रूपये का जुर्माना से दंडित किया जावेगा।
10 अक्टूबर 2006 से बच्चों को घरेलू नौकर तथा ढाबों आदि में कार्य करने पर प्रतिबंध ः- सरकार द्वारा निर्णय लिया गया है कि बच्चों के रोजगार (बालश्रम) को निम्न क्षेत्रों में जैसे घरेलू नौकर, ढाबा (सड़क किनारे), होटल, मोटल, चाय की दुकान, सैरगाह, पिकनिक के स्थानों पर प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस प्रतिबंधित को बालश्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम 1986 के अंतर्गत 10 अक्टूबर 2006 से लागू किया गया है।
गैर खतरनाक क्षेत्रों में बाल श्रमिक कार्य कर सकते हैं परंतु निम्न प्रावधानों का पालन किया जाना अनिवार्य है:-
1. बच्चों से 6 घंटे से अधिक समय तक काम नहीं करवाया जा सकता है।
2. एक साथ तीन घंटों से ज्यादा उनसे काम नहीं किया जा सकता है।
3. रात के 7 बजे से लेकर सुबह 8 बजे के बीच में उनसे कोई भी काम नहीं लिया जा  सकता।
4. सप्ताह में उन्हें कम से कम एक दिन छुट्टी दी जानी चाहिए।
सबसे अच्छा तो यह है कि बच्चों को किसी काम पर रखा ही नहीं जाये क्योंकि इससे उनके सेहत पर बुरा असर पड़ता है और शारीरिक व मानसिक विकास प्रभावित होता है। उन्हें पढ़ने का मौका भी नहीं मिल पाता है। बचपन तो खेलने खाने और पढ़ने के लिए होता है। हर बच्चे को उनके यह अधिकार दिलाया जाना चाहिए। 06 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 ’’ए’’ के तहत मौलिक अधिकार है तथा माता पिता व संरक्षक का अनुच्छेद 51 क भारतीय संविधान के तहत 06 से 14 वर्ष तक के बच्चों को शिक्षा दिलाया जाना मौलिक कर्तव्य है।
अतः अधिकार एवं कर्तव्य का अनिवार्य रूप से पालन होना चाहिए।
बाल श्रम केवल कानून से दूर नहीं किया जा सकता है। बाल श्रम के विरूद्ध संघर्ष में कोई भी समाज सेवी व्यक्ति या संगठन निम्नानुसार सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकता है:-
1. जनता के बीच इस समस्या के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
2. यह मांग करना कि सरकार विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों एवं निकायों में  बाल श्रम के उन्मूलन के लिए सघन कार्यवाही की जरूरत का मुद्दा उठाये।
3. विश्व व्यापार संगठन के ढांचे के अंतर्गत किये गये करारों सहित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार  करारों में उस सामाजिक खण्ड के आह्वान का सक्रिय (समर्थन) विरोध करना। जिसे सीधे  रूप में बाल श्रम के साथ जोड़ा गया है।
4. सरकार से मांग करना कि ऐसी नीति अपनाये जो विकासशील देशों में आर्थिक पुनः संरचना कार्यक्रमों को प्रभावित करने वाली हो। ताकि वे शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अन्य ऐसी सेवाओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित न करें जिन पर परिवार व बच्चे विशेष रूप से आश्रित हैं।
5. मांग करना कि निर्णायक अंतर्राष्ट्रीय कार्यवाही सुनिश्चित की जावे और आवश्यक होने पर संबंधित सरकारों पर कठोर प्रतिबंध लगाये जायें ताकि बाल श्रम पर तुरंत प्रतिबंध लगाने और उनके उपर हो रही ज्यादतियों को रोकने के लिए विवश हो सके। जिन कार्यों में बच्चों का शारीरिक अथवा मानसिक विकास खतरे में है उन्हें रोकने के उपाय करने के लिए विवश हो सके।
6. ऐसी विकास सहायता परियोजनाओं के कार्यन्वयन की मांग करना जिनके प्रत्यक्ष प्रयोजन निर्धनता दूर करना, वयस्क रोजगार को बढ़ाना, शिक्षा के पहुंच में सुधार करना और अन्य दशाओं को प्रभावित करना हो ताकि बाल श्रम को सीमित और अन्ततः उसका उन्मूलन किया जा सके।
7. उन देशों के विकास और सहायता परियोजनाओं का कार्यन्वयन करना और उनका समर्थन करना जो बाल श्रम के विरूद्ध संघर्ष में अपना योगदान देना चाहते हैं। जिससे उनकी ट्रेड यूनियनों की क्षमताओं में सुधार आ सके।
8. अपनी घरेलू बाजारों में बाल श्रमिकों द्वारा नियमित समान की खरीद व वितरण पर प्रतिस्पर्धा के एक घटक के रूप में बाधा उत्पन्न करके बाल श्रम के इस्तेमाल को अधिक कठिन बनाना अन्ततः इसके इस्तेमाल को असंभव बना देना।
9. एक प्रभावी दबाव के समूह के रूप में कार्य करना।
10. राज्य और जिला स्तर पर बाल श्रम प्रकोष्ठ स्थापित करना।
11. अपने समस्त करारों और कार्ययोजनाओं में बाल श्रमिकों का मुद्दा शामिल करना।
12. बाल श्रमिकों के स्थान पर वयस्कों को काम दिये जाने पर जोर देना और व्यावसायिक शिक्षा, पोषाहार, स्वास्थ्य एवं मनोरंजन का समर्थन करना।
13. बाल श्रम कार्यक्षेत्रों का अध्ययन और विश्लेषण करना और बाल श्रम को प्रभावित करने वाली नीतियों का समर्थन करना जिससे वैकल्पिक रणनीति बनाने में सहयोग मिले।
14. बाल श्रम के बारे में सूचना का प्रचार करना।
15. बाल श्रम दिवस मनाये जाने का आह्वान करना।
16. ऐसी परियोजनायें शुरू करना जिनकी आवश्यकता बाल श्रम के समस्या वाले क्षेत्रों में महसूस की जा रही है और इस समस्या को हल करने में सहयोग देना।
17. अधिक अनुभव होने के कारण जमीनी हकीकत के अधिक निकट सरकार के प्रवर्तन-तंत्र के आंख कान की तरह काम करना।
18. क्षेत्र में लगे अपने सदस्यों (खास करके जो बाल श्रम बहुल क्षेत्रों में लगे हुए) को बाल श्रम को समाप्त करने संबंधी कानूनों की जानकारी प्रदान करना।
19. समस्या और उससे जुड़े कानूनों के बारे में बताना ताकि सजग प्रहरी के रूप में अधिक दक्षतापूर्वक कार्य किया जा सके।
20. अपनी खुद की कार्योन्मुख परियोजनाएं और कार्यक्रम चलाना।
व्यक्तिगत रूप से बाल श्रम के विरूद्ध संघर्ष में निम्नानुसार सहयोग प्रदान किया जा सकता है:-
1. कार्यकर्ता अपने घर में किसी बच्चे को काम पर न रखे।
2. अपने साथी कार्यकर्ताओं को बाल श्रमिक न रखने की सलाह दें।
3. अन्य ट्रेड यूनियनों के कार्यकर्ताओं को बाल श्रमिक न रखने की सलाह दें।
4. मजदूर कालोनी में मजदूरों के घर में बाल श्रमिकों को काम करने से रोकने की कोशिश करें।
काम करने के स्थान पर:-
1. कार्यकर्ता जहां काम कर रहा है उस स्थान पर किसी भी बाल श्रमिक को काम पर न लगाने की सलाह प्रबंधकों को दे सकता है।
2. कारखानों की कैंटीनों में काम करने वाले बाल श्रमिकों को काम करने से रोकने के लिए अपने ट्रेड यूनियनों में सक्रिय भूमिका अदा कर सकता है।
3. कार्य स्थल पर ठेकेदार द्वारा किये जाने वाले कार्यों के लिए, जिसमें अधिकतर बाल श्रमिक काम करते हैं यूनियन के माध्यम से किये जाने वाले एग्रीमेंट में बाल श्रमिकों को काम पर न रखने की शर्त को शामिल करवा सकता है।
4. अपने कार्यस्थल पर प्रबंधकों को बाल श्रम मुद्दे पर संवेदनशील बनाने की कोशिश कर सकता है।
रास्ते में चलते हुए उन छोटे बच्चों को होटलों में कप प्लेट धोते और बड़ी बड़ी बाल्टियों में पानी भरकर पहुंचाते हुए देखा करते हैं किन्तु हमें इसका ध्यान नहीं रहता कि यदि ये बालक जीवन में अशिक्षित रह जायेंगे तो पशुओं की भांति निरर्थक श्रम ही करते रहेंगे और अपने नागरिक दायित्वों और अधिकारों से वंचित रह जायेंगे।
‘‘आइये इन्हे काम से हटाकर स्कूल भिजवाने में मदद करें’’

ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम 1970

ठेके पर काम करने वाले मजदूरों का शोषण न हो तथा उनके हित सुरक्षित रहें, इसलिए यह कानून बनाया गया है।
यह कानून कहता है:-
1. यदि मालिक ठेकेदार के जरिए मजदूरों को काम पर रखता है, तो मालिक को पंजीकृत होना चाहिए।
2. यदि कोई ठेकेदार 20 या इससे अधिक मजदूर किसी मालिक को देता है तो उसे सरकार से लाइसेंस लेना पड़ेगा।
सुविधायें जो ठेकेदार द्वारा दी जानी चाहिए:-
1. काम करने वाले (मजदूरों) के छः साल से छोटे बच्चों के लिए ठेकेदार को कम से कम दो कमरे अवश्य देने चाहिए। एक कमरा खेलने के लिए और दूसरा सोने के लिए।
2. मजदूरों के लिए पीने का पानी, पर्याप्त संख्या में शौचालय और मूत्रालय, धोने के लिए सुविधाएं और प्राथमिक चिकित्सा सुविधाएं।
3. तीन माह तक चलने वाले काम में आराम की सुविधाएं।
4. स्त्रियों के लिए अलग कमरे का प्रबंध।
5. ऐसा काम जो छः माह तक चल सकता है और सौ से ज्यादा मजदूर काम करते हों, तो भोजनालय का प्रबंध।
मजदूरी:-
1. मजदूरी देने की जिम्मेदारी भी ठेकेदार की है,
2. महीने में कम से कम एक बार मजदूरी मिलनी चाहिए,
3. मजदूरी नगद और बिना कटौती के मिलना चाहिए,
4. मजदूरी मालिक के प्रतिनिधि के सामने दी जानी चाहिए,
5. मजदूरी की दर न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं हो सकती है,
6. ठेकेदार को कमीशन देना मालिक की जिम्मेदारी है, उसे मजदूरी से वसूल नहीं किया जा सकता है।
7. मालिक ठेके के मजदूरों से केवल उतने घंटे काम करा सकता है, जितने घंटे उसके कर्मचारी उसी तरह का काम करते हैं।
8. शिकायत होने पर श्रम अधिकारी को शिकायत दर्ज करने पर 6 माह से एक साल सजा और पांच हजार से दस हजार जुर्माना किया जायेगा।

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149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी