Thursday, 27 October 2016

रैगिंग-एक गुनाह

छ.ग. शैक्षणिक संस्थाओं में प्रताड़ना(रैगिंग) का प्रतिषेध अधिनियम 2001:- यह अधिनियम छ.ग. राज्य शैक्षणिक संस्थाओं में रैगिंग द्वारा छात्राओं के मानवीय एवं संवैधानिक मूल्यों का हनन होने से रोकने तथा संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से निर्मित किया गया है।
रैगिंग का अर्थ:- इस अधिनियम के अनुसार रैगिंग से अभिप्राय है कि किसी छात्र-छात्रा को मजाक पूर्ण व्यवहार से या अन्य प्रकार से ऐसा कार्य करने के लिये उत्प्रेरित बाध्य या मजबूर करना जिससे उसके मानवीय मूल्यों का हनन या उसके व्यक्तित्व का अपमान या उपहास होना दर्शित हो या उसे अभित्रास सदोष-परिरोध या क्षति या उस पर आपराधिक बल के प्रयोग या सदोष अवरोध सदोष परिरोध क्षति या आपराधिक बल का प्रयोग कर अभित्रास देते हुए किसी विधिपूर्ण कार्य करने से रोकता है।
शैक्षणिक संस्थाओं से अभिप्राय:- इस अधिनियम के अनुसार राज्य की कोई भी शासकीय स्वशासी एवं अशासकीय शैक्षणिक संस्थाएं शामिल है।
अधिनियम के विस्तार एवं प्रारम्भः- इस अधिनियम के प्रावधान सम्पूर्ण छ.ग. में लागू किए गए हैं तथा राज्य में राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना दिनांक 17.01.2012 से प्रवृत्त है।
रैगिंग का प्रतिषेधः- किसी भी शैक्षणिक संस्था का छात्र प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः न तो रैगिंग करेगा और न ही उसमें भाग लेगा।
अपराध की प्रकृतिः- इस अधिनियम के तहत संज्ञान किए जाने योग्य प्रत्येक अपराध संज्ञेय व गैर जमानतीय है।
दण्ड:- यदि किसी व्यक्ति के द्वारा अधिनियम की धारा 3 के उपबंधों का उल्लंघन किया जाता है वह साधारण या सश्रम कारावास (दोनो में से किसी भी भांति के कारावास) से जिसकी अवधि पॉंच वर्ष तक हो सकेगी या जुर्माना से जो कि पॉंच हजार रू. तक हो सकेगा, या दोनो से ही दण्डित किया जा सकेगा।
अपराध का बिचारण:- 
1. अधिनियम के तहत् दण्डनीय प्रत्येक अपराध का विचारण प्रथम वर्ग न्यायिक दण्डाधिकारी द्वारा किया जावेगा।
2. अधिनियम के उपबंधो के अधीन अपराधों के अन्वेषण, जॉंच तथा विचारण के अपराध प्रक्रिया संहिता 1973
(क्रमांक 2 सन् 1974) कि उपबंध लागू होंगे।
छात्र के निष्कासन के लिए निर्योग्यता:- 
1. यदि किसी छात्र के विरूद्ध इस अधिनियम के तहत कोई अन्वेषण लम्बित है तो उस शिक्षण संस्था का प्रमुख/अभियुक्त छात्र को शैक्षणिक संस्था से निलंबित तथा शैक्षणिक संस्था परिसर व छात्रावासों में प्रवेश वर्जित कर सकेगा।
2. किसी शैक्षणिक संस्था के किसी छात्र का जो इस अधिनियम के तहत सिद्धदोष पाया गया हो वह शैक्षणिक
संस्था के निष्कासन का भागी होगा।
3. ऐसे निष्कासित छात्र-छात्रा को या अन्य कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन सिद्धदोष पाया गया हो।

प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफ.आई.आर.)

प्रथम सूचना रिपोर्ट क्या है
प्रथम सूचना रिपोर्ट का उद्देश्य फौजदारी कानून को हरकत में लाने से है। जिससे पुलिस छानबीन का कार्य शुरू कर सके। प्रथम सूचना रिपोर्ट ही किसी मुकदमे का आधार होती है। यह रिपोर्ट एक शिकायत या अभियोग के तौर पर होती है, जिससे किसी अपराध के घटित होने या संभवतः घटित होने की सूचना पुलिस को दी जाती है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट किसके विरूद्ध और कौन व्यक्ति दर्ज करवा सकता है -
1. आमतौर पर कानून तोड़ने वाले व्यक्ति के विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाई जाती है।
2. कोई भी व्यक्ति जिसके साथ कोई भी आपराधिक घटना घटित हुई हो, वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है।
3. किसी घटना से संबंधित दोनों पक्षकार भी अपनी-अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं।
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाते समय पीड़ित पक्षकार अपने साथ अपने मित्र रिश्तेदार अथवा अपने वकील को भी साथ थाने में ले जा सकते हैं।
प्रथम सूचना रिपोर्ट अपराधों की गंभीरता के अनुसार दर्ज की जाती है, जैसे किसी व्यक्ति ने गंभीर प्रकृति का गैर जमानतीय अपराध किया है तो उसके विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दी जाएगी।
परंतु यदि किसी व्यक्ति ने साधारण प्रकृति का जमानतीय अपराध किया है तो उसके विरूद्ध एफ.आई.आर. न दर्ज करके पुलिस का हस्तक्षेप न करने वाली रिपोर्ट दर्ज की जाएगी।
अपराध की श्रेणी
  • जमानतीय अपराध (एन.सी.आर.)
  • गैर जमानतीय अपराध (एफ.आई.आर)

यदि दो जमानतीय अपराध के साथ एक गैर जमानतीय अपराध किसी व्यक्ति द्वारा कारित किया जाता है तो उसके विरूद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाएगी।
पुलिस का हस्तक्षेप न करने वाली रिपोर्ट (एन.सी.आर.) दर्ज होने पर वादी के कर्तव्य
यदि किसी व्यक्ति की जुबानी सूचना पर थाने द्वारा एन.सी.आर. दर्ज कर ली जाती है, तो ऐसी स्थिति में वह पीड़ित व्यक्ति अपने प्रतिवादी के विरूद्ध कार्यवाही करने के लिए संबंधित न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 155 की उपधारा (2) के अंतर्गत विवेचना (मामले की छानबीन) करने का निवेदन कर सकता है।
यदि संबंधित न्यायालय द्वारा विवेचना (छानबीन) का आदेश पारित कर दिया जाता है तो, प्रतिवादी/अभियुक्तगण के विरूद्ध मामले की छानबीन संबंधित थाने के थानेदार द्वारा की जा सकती है और अभियुक्तों के जरिए सम्मन न्यायालय के समक्ष तलब किया जा सकता है।
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करने पर कहां-कहां शिकायत करें:-
  • अगर पीड़ित पक्ष्कार की प्रथम सूचना रिपोर्ट संबंधित थाने द्वारा किसी कारणवश नहीं दर्ज की जाती है तो ऐसी स्थिति में सर्वप्रथम जिले के पुलिस अधीक्षक को एक शिकायती प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • यदि थाने द्वारा इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं की जाती है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 (3) के अनुपालन में शिकायती प्रार्थना पत्र रजिस्टर्ड डाक से पुलिस अधीक्षक को भेजा जा सकता है।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी लिखित शिकायती प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • यदि रजिस्टर्ड डाक द्वारा भेजे गए शिकायती प्रार्थना पत्र पर भी कोई कार्यवाही न हो, तो न्यायालय पर मजिस्ट्रेट के समक्ष दं.प्र.सं. की धारा 156 की उपधारा (3) के अंतर्गत प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने का निवेदन किया जा सकता है।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाते समय किन बातों का ध्यान रखें:-
1-घटना का सही समय लिखवाना चाहिए।
2-घटना का सही स्थान।
3-घटना का सही दिनांक।
4-प्रथम सूचना रिपोर्ट में कभी भी घटना के सही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर नहीं लिखाना चाहिए।
5-अपराध घटित होने के बाद जितनी जल्दी हो सके प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहिए, क्योंकि विलम्ब से सूचना देने पर अभियुक्तगण की तरफ से प्रायः तर्क दिया जाता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट सोच-विचार कर तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर मनगढं़त तथ्यों के आधार पर लिखायी गई है, जिससे अभियुक्तों को संदेह का लाभ मिल सकता है।
6-प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखवाने के पश्चात् अंत में रिपोर्ट लिखाने वाले का नाम, पिता का नाम, पता और हस्ताक्षर भी होने चाहिए। रिपोर्ट दर्ज करने वाले अधिकारी को रिपोर्ट वादी को पढ़कर सुनाना चाहिए।
7- रिपोर्ट लिखवाने के पश्चात् रिपोर्ट की प्रतिलिपि संबंधित थाने से वादी को मुफ्त में उपलब्ध करायी जाती है।
8- प्रथम सूचना रिपोर्ट में अभियुक्त का नाम और उसका विस्तृत विवरण जैसे उसका रंग, ऊंचाई, उम्र, पहनावा और चेहरे पर कोई निशान आदि जरूर लिखवाना चाहिए।
9- अपराध कैसे घटित हुआ (अपराध घटित करते समय अपराधियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हथियार/औजार का नाम) अवश्य दर्शाना चाहिए।
10- अभियुक्त द्वारा चुरायी गयी या ली गयी वस्तुओं की सूची।
11- अपराध के समय गवाहों के नाम और उनका पता।
प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के समय को लेकर नियम कानून:-
किसी संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्ति और उस सूचना के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट के अभिलिखत करने के बीच में बहुत ज्यादा समय नहीं होना चाहिए। इसे तुरंत लिखवाना चाहिए। ऐसा न करने से प्रथम सूचना रिपोर्ट की महत्ता घट जाती है, अगर उसे अपराध के तुरंत बाद न लिखवायी जाए।
इसी संदर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अप्रेम जोसफ के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि अपराध की सूचना पुलिस को देने के लिए कोई युक्तियुक्त समय अलग से तय नहीं किया जा सकता। युक्तियुक्त समय का प्रश्न एक ऐसा विषय है, जो हर मामले में न्यायालय ही फैसला करेगा।
सार्वजनिक व्यक्ति के अलावा थाने का भारसाधक अधिकारी भी अपनी जानकारी के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है:-
  • थाने का भारसाधक अधिकारी अपनी जानकारी और स्वतः की प्रेरणा से प्रेरित होकर अपने नाम से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। यदि उसकी नजर में एक संज्ञेय अपराध (गैर जमानतीय) घटित हुआ है।
  • टेलीफोन के जरिए प्राप्त सूचना को प्रथम सूचना रिपोर्ट के तौर पर लिखा जा सकता है। टेलीफोन पर सूचना किसी परीचित व्यक्ति द्वारा दी गई हो, जो अपना परिचय प्रस्तुत करें, तथा सूचना में ऐसे अपेक्षाकृत तथ्य हों, जिससे संज्ञेय अपराध का घटित होना मालूम होता हो तथा जो थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा लिखित रूप में भी दर्ज कर लिया गया हो। ऐसी सूचना को प्रथम सूचना रिपोर्ट माना जा सकता है।

चैकों का अनादरण

चैकों का अनादरण क्या है ?
आज के युग में प्रायः लेने-देन का कार्य बैंकों के माध्यम से किया जाना अधिक सुविधापूर्ण हो चुका है। बैंक एक वैश्वासिक संस्थान है, जो आपके मध्य हुए अनुबंध शर्तों के अध्यधीन आपके के खाते में जमा राशि को आपके आदेशानुसार ही आहरित कर आपको अथवा आपके द्वारा आदेशित व्यक्ति को भुगतान करता है। जमा धन का आहरण बैंक निकासी फार्म, बैंक चैक या एटीएम के माध्यम से किया जा सकता है। इन सबमें चैकों का महत्वपूर्ण एवं अहम भूमिका होता है, जिसके माध्यम से आप स्वयं ही नहीं वरन् अन्य किसी व्यक्ति को भी ’’किसी लिए गए ऋण या अन्य दायित्व के पूर्णतः या अंशतः उन्मोचन के लिए किसी बैंक में अपने खाते में जमा राशि में से जो उक्त बैंक के साथ अनुबंधित ठहराव के लिए पर्याप्त हो, छोड़कर बचत राशि में से भुगतान हेतु ऐसे व्यक्ति के पक्ष में चैक जारी कर सकते हैं। यदि आपके द्वारा लिखा गया चैक, बैंक द्वारा बिना भुगतान किए गए इस कारण वापस लौटा दिया जाता है कि आपके खाते में भुगतान हेतु पर्याप्त धन राशि नहीं है या उस रकम से अधिक है, जिसका बैंक के साथ किए गए करार के द्वारा उस खाते में से संदाय करने का ठहराव किया गया है, तो आपका यही कृत्य चैक के प्रति अनादरण अर्थात् उपेक्षापूर्ण आचरण होगा। जो धारा 138 चैकों का अनादरण अधिनियम अर्थात् परक्राम्य लिखत अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।
पीड़ित व्यक्ति के लिए ध्यान देने योग्य बातें:-
पीड़ित व्यक्ति अर्थात् जिसके पक्ष में जारी चैक की अनादरित होने की सूचना सहित उक्त चैक बिना भुगतान किए बैंक द्वारा वापस लौटा दी जाती है, तो ऐसे व्यक्ति को चैक जारीकर्ता के विरूद्ध न्यायालय में परिवाद संस्थित करने के पूर्व चैक अनादरण के संबंध में निम्नलिखित आवश्यक तत्व को ध्यान में रखा जाना चाहिएः-
चैक अनादरण के आवश्यक तत्व -
अधिनियम के तहत अपराध के गठन हेतु आवश्यक है 
1. चैक ऋण के संपूर्ण अथवा  आंशिक उन्मोचन अथवा अन्य किसी दायित्व के उन्मोचन के संबंध में राशि भुगतान हेतु होना चाहिए।
2. चैक बिना भुगतान किए बैंक द्वारा वापस आया हो।
3. चैक के भुगतान होने के कारण धन की अपर्याप्तता अथवा खाते में से भुगतान की व्यवस्था की गई राशि से अधिक हो।
अधिनियम में दिए गए परन्तुक यह भी अपेक्षा करते हैं कि -
(क) बैंक में चैक को उस दिनांक से छह माह के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिस पर कि इसको लिखा गया था अथवा इसकी विधिमान्यता की अवधि के भीतर जो भी पहले हो, इसे प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
(ख) भुगतान पाने वाले अथवा सम्यक् अनुक्रम में बैंक के धारक को चैक के अधीन होने वाली राशि की मांग बैंक से चैक के अनादरण के संबंध में जानकारी प्राप्त होने के 15 दिवस के भीतर लेखीवाल अर्थात् चैक जारीकर्ता से करना चाहिए।
(ग) चैक का लेखीवाल कथित सूचना के 15 दिवस के भीतर राशि का भुगतान करने में विफल रहा हो।
अपराधों का संज्ञान:-
अधिनियम की धारा 142 के उपबंध के अनुसार दं.प्र.सं. 1973 (1974 का 2) के किसी बात के होते हुए भी:-
(क) कोई भी न्यायालय धारा 138 के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान, चैक के पाने वाले या धारक द्वारा सम्यक् अनुक्रम में किए गए लिखित परिवाद पर ही करेगा अन्यथा नहीं।
(ख) ऐसा परिवाद उस तारीख के एक माह के भीतर किया जाता है, जिसको धारा 138 के परन्तुक के खण्ड (ग) के अधीन वाद हेतु उद्भूत होता है। परन्तु यह कि विहित अवधि के उपरांत न्यायालय के द्वारा परिवाद पर संज्ञान लिया जा सकेगा, यदि परिवादी न्यायालय को यह संतुष्ट कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर परिवाद न करने का उसके पास समुचित कारण था ।
(ग) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से और कोई न्यायालय धारा 138 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा।
न्यायालय की क्षेत्रीय अधिकारिता - मामला संस्थित करने की क्षेत्रीय अधिकारिता के संबंध में न्यायदृष्टांत ’’मुरलीधरन बनाम परीद (1992 भाग-1 केरल लॉ टाइम्स-50) के मामले में यह प्रकट किया गया है कि परिवाद पेश करने हेतु निम्न स्थानों पर वाद कारण उत्पन्न होता है:-
(1) जहां से चैक जारी किया गया था, अथवा (2) जहां चैक परिदान किया गया था, अथवा (3) वह स्थान जहां पर की व्यक्त रूप से अथवा विवक्षित रूप से राशि भुगतान योग्य हो।
उपरोक्तानुसार न्यायालय जिसकी अधिकारिता के अधीन उपरोक्त वर्णित स्थानों में से कोई स्थान आता है, को अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत अपराध का विचारण करने की अधिकारिता होगी।

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के सदस्यों का उत्पीड़न रोकने संबंधी कानून

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (उत्पीड़न एवं छुआ-छूत निवारण) अधिनियम 1989
भारत की सामाजिक व्यवस्था में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों द्वारा अक्सर ज्यादतियां की जाती थी। उनके साथ छुआछूत एवं अन्य घिनौने कृत्य के कई उदाहरण देखे जाते थे। अतः भारत के संविधान में इन कृत्यों को अपराध की श्रेणी में लेकर उनके निवारण की व्यवस्था की गई है। इसके लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (उत्पीड़न एवं छुआछूत निवारण) अधिनियम 1989 का सृजन किया गया है।
इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:-
उत्पीड़न के अपराध क्या हैं ?
धारा-3 के अंतर्गत यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, वह निम्नलिखित में से कोई कृत्य करता है तो वह उत्पीड़न के अपराध के लिए दंड का अधिकार है।
1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य को किसी अखाद्य अथवा हानिकारक पदार्थ पीने या खाने के लिए बाध्य करता है।
2. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को क्षति पहुंचाने, अपमान करने, परेशान करने के आशय से उसके परिसर अथवा पड़ोस में मैला, कूड़ा, पशुओं की लाशें अथवा अन्य कोई हानिकारक पदार्थ एकत्रित करने का कार्य करता है।
3. अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के शरीर से बलपूर्वक कपड़े उतारता है या उसे नंगा घुमाता है या चेहरे व शरीर पर रंग लगाकर घुमाता है अथवा इसी प्रकार का अन्य कोई कार्य करता है जो प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है।
4. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के सदस्य के स्वामित्व की या आबंटित भूमि को अथवा सक्षम अधिकारी द्वारा अधिसूचित भूमि को दोषपूर्ण ढंग से कब्जा कर लेता है या जोत लेता है या उसे आबंटित भूमि का दोषपूर्ण ढंग से हस्तांतरण करता है।
5. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को अथवा परिसर से दोषपूर्ण तरीके से बेदखल करता है अथवा किसी भूमि परिसर अथवा पानी के अधिकारों के उपभोग में हस्तक्षेप करता है।
6. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को बेगारी करने के लिए या बंधुआ श्रम करने के लिए बाध्य करता है या फुसलाता है।
7. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरूद्ध झूठी, विद्वेशपूर्ण, उत्पीड़न बाद अथवा फौजदारी की अथवा अन्य कोई विधिक कार्यवाही करता है।
8. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के लोगों को मत देने या नहीं देने से रोकता है।
9. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के किसी लोक सेवक को झूठी सूचना देता है और उसके द्वारा ऐसे लोक सेवक को विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य को क्षति अथवा परेशानी होती हे।
10. अजा एवं अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को लोक दृष्टि के अंतर्गत अपमानित करता है या अपमानित करने के आशय से डराता है।
11. किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिला पर शीलभंग करने या उसका निरादर करने के लिए बल प्रयोग करता है।
12. किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिला का शोषण करता है।
13. किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाने वाले जल स्रोतों को दूषित करता है।
14. किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य को लोक भ्रमण के रास्ते या स्थान का प्रयोग करने से रोकता है।
15. किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य को अपना घर, गांव या निवास स्थान छोड़ने के लिए बाध्य करता है।
उत्पीड़न अपराध के लिए दण्ड की व्यवस्था
किसी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों का उत्पीड़न करने वाले व्यक्ति को 6 महीने से 5 वर्ष तक की कारावास की सजा एवं जुर्माना हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के विरूद्ध जान-बूझकर कोई झूठा साक्ष्य देता है तो इस कृत्य के लिए भी कड़ी सजा का प्रावधान है। यदि कोई लोक सेवक इस अधिनियम के तहत अपेक्षित कर्तव्यों की जान-बूझकर उपेक्षा करता है तो उसे एक वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति आग या विस्फोटक पदार्थों से उक्त जाति के सदस्यों की संपत्ति की क्षति पहुंचाता है तो ऐसे अपराधियों के लिए कड़े दण्ड की व्यवस्था है।
आरोपी व्यक्तियों की संपत्ति की जप्ती -
यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के तहत दंडित होता है तो उस व्यक्ति की चल या अचल संपत्ति जो इस अपराध में प्रयोग की गई है, सरकार द्वारा उसे जप्त कर ली जाएगी।
निष्कासन:- 16.यदि किसी व्यक्ति के विरूद्ध संविधान के अनुच्छेद 244 के अंतर्गत घोशित अनुसूचित क्षेत्रों में अपराध को अंजाम देने के अपराध की संभावना विशेश न्यायालय में साबित होती है, तो न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति को निश्कासित करने का आदेश दिया जा सकता है।
विषेश न्यायालय का गठन - अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के उत्पीड़न के अपराधों की सुनवाई हेतु सरकार द्वारा विशेष सत्र न्यायालय का गठन किया गया है, ऐसे अपराध की शिकायत थाने में या सीधे न्यायालय में की जा सकती है।
उत्पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता:- अजा/अजजा के उत्पीड़ित परिवारों को पुनर्वास एवं मुआवजे के रूप मे राज्य शासन द्वारा आर्थिक सहायता दी जाती है। 

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी