Wednesday, 26 October 2016

खाद्य पदार्थों में मिलावट (रोकथाम और निवारण) अधिनियम, 1954

मिलावटी खाद्य पदार्थ क्या है

  • विक्रेता द्वारा बेचा गया कोई पदार्थ जो कि खरीददार की आशा से कम प्रकृति, गुण या महत्व का हो।
  • अगर पदार्थ में कोई मिलावट हो जो कि उसके गुण, महत्व को प्रभावित करे या जिससे कोई हानि होती हो।
  • अगर कोई सस्ता पदार्थ उस खाद्य पदार्थ में मिलाया गया हो, जिससे उसके गुण और महत्व में कमी हो तथा वह हानिकारक हो।
  • अगर कोई पदार्थ अस्वच्छ अवस्था में तैयार, पैक या रखा गया है, जिसमें वह गंदा या रोगयुक्त हो।
  • अगर पदार्थ में किसी प्रकार का विष या कोई हानिकारक वस्तु मिली हो, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो।
  • जिस डिब्बे में पदार्थ रखा गया हो, अगर वह डिब्बा किसी ऐसी चीज से बना है, जिससे वह पदार्थ जहरीला या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाए।
  • अगर पदार्थ में प्रतिबंधित रंग या अनुमति से अधिक मात्रा में रंग मिलाया गया हो।
  • अगर पदार्थ का गुण, महत्व या उसकी शुद्धता तय किए गए मानक से कम है।
  • दूध में पानी मिलावट खाद्य पदार्थ में मिलावट के अंतर्गत आती है।

निम्नलिखित परिस्थितियों में खाद्य पदार्थों को गलत नाम देना माना जाएगा:-

  • अगर उसका नाम किसी दूसरे पदार्थ से ऐसे मेल खाता हो कि ग्राहक को धोखा हो जाए।
  • अगर वह झूठ बोलकर उस पदार्थ को विदेशी बताया हो।
  • अगर वह किसी और पदार्थ के नाम से बेचा जाए।
  • अगर उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव करके उसको ज्यादा मूल्य का दिखाया जाए।
  • अगर उसके लेबल पर पैकेट के अंदर की वस्तुओं का विवरण न दिया गया हो या गलत विवरण दिया गया हो।
  • अगर उसका लेबल किसी झूठे व्यक्ति या कम्पनी द्वारा बनाए जाने के बारे में बताता हो।
  • अगर वह पोषक आहार के रूप में बनाया गया हो और उसका लेबल उसमें प्रयोग की गई सामग्रियों के बारे में न बताता हो।
  • अगर उसमें कोई भी बनावटी रंग, खुशबू या स्वाद का प्रयोग हुआ हो, जिसके बारे में लेबल पर न लिखा गया हो।
  • अगर उसका लेबल इस अधिनियम के अंदर बनाए गए नियमों के अनुसार न हो।

खरीददार (उपभोक्ता) के अधिकार:- इस अधिनियम के अंदर खरीददार या खरीददारों का संघ किसी भी खाद्य पदार्थ को सरकारी प्रयोगशाला में जांच करवा सकता है। जिसके लिए उसको निर्धारित फीस देनी पड़ेगी। जांच में अगर पदार्थ खाद्य पदार्थ में किसी भी प्रकार की मिलावट पायी गई, तो खरीददार या खरीददार संघ जांच के लिए दी गई फीस वापस पाने का हकदार है।
अपराध और सजा:- किसी भी मिलावटी पदार्थ जो कि स्वास्थ्य और शुद्धता के लिए हानिकारक हो, उसके आयात करने, बनाने, रखने, बेचने या बांटने से प्रतिकूल असर हो। यदि खाद्य निरीक्षक को उस खाद्य पदार्थ के नमूने लेने और उसके विरूद्ध विभागीय कार्यवाही करने से रोका जाए। किसी भी खाद्य पदार्थ के लिए झूठी वारण्टी देना। उपभोक्ता अपराध के लिए कम से कम 6 माह और अधिकतम 3 वर्ष तक का कारावास और कम से कम 1000 रूपये का जुर्माना भी हो सकता है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986

भारतीय संविधान के अंतर्गत उपभोक्ताओं को शोषण, मिलावटी वस्तुओं और सेवाओं की कमी से संरक्षण देने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बनाया गया है। इस अधिनियम का उद्देश्य है कि प्रत्येक उपभोक्ता को शीघ्र व सरल तरीकों से कम धन खर्च करके न्याय मिल सके।
उपभोक्ता फोरम वस्तु की कीमत और कार्यवाही का वाद कारण पैदा होने के स्थान के आधार पर तीन प्रकार के होते हैं:-
1. जिला उपभोक्ता फोरम:- प्रत्येक जिले में उपभोक्ता विवाद विचारण फोरम का गठन किया गया है। उपभोक्ता द्वारा 20 लाख तक की कीमत क्षतिपूर्ति का दावा जिला उपभोक्ता फोरम में शिकायत करके किया जा सकता है।
जिला उपभोक्ता फोरम का एक अध्यक्ष होता है एवं दो सदस्य होते हैं, जिनमें से एक महिला सदस्य एवं एक पुरूष का होना अनिवार्य है।
2. राज्य उपभोक्ता कमीशन:- राज्य उपभोक्ता विवाद कमीशन प्रत्येक राज्य में होता है। जब वस्तु की कीमत, सेवा अथवा प्रतिकर (मुआवजा) 20 लाख से 1 करोड़ रूपये तक हो तो, राज्य उपभोक्ता कमीशन में शिकायत कर सकते हैं।
3. राष्ट्रीय उपभोक्ता कमीशन:- राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण कमीशन का क्षेत्राधिकार 1 करोड़ रूपये से अधिक मूल्य की वस्तु सेवा या प्रतिकर (मुआवजा) के लिए होता है।
शिकायत कहां दर्ज कराई जा सकती है:-
1. जहां पर वाद का कारण पैदा हुआ हो। 2. जहां दूसरा पक्ष रहता हो।
3. जहां दूसरा पक्ष अपना व्यवसाय करता हो।
शिकायत कौन व्यक्ति कर सकता है:- कोई भी उपभोक्ता जब कोई सामान खरीदता है, और उसमें खराबी या कमी होने के कारण उसका नुकसान होता है, या कोई सेवा उपलब्ध कराने के लिए उसे फीस देता है और उस सेवा में कमी होती है, तो उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करवा सकता है या दावा दायर कर सकता है।
यद्यपि अधिनियम में डाक्टर, वकील आदि का उल्लेख नहीं है, परंतु जब ऐसे व्यवसायिक व्यक्तियों को पैसा देकर सेवा प्राप्त की जाती है और उसमें कमी होने के कारण नुकसान होता है, तो उसके विरूद्ध भी उपभोक्ता फोरम में शिकायत की जा सकती है।
शिकायत के लिए आवेदन पत्र कौन दे सकता है:-
1. कोई भी उपभोक्ता 2. कोई भी उपभोक्ता संघ जो कि भारतीय कम्पनीज अधिनियम 1956 के अंतर्गत रजिस्टर्ड हो। 3. राष्ट्रीय अथवा राज्य सरकार 4. कई उपभोक्ताओं के समान हित के लिए कोई एक या अधिक उपभोक्ता।
शिकायत में निम्नलिखित सूचनाएं होनी चाहिएः-
1. शिकायतकर्ता का नाम और पता 2. दूसरे पक्ष का नाम और पता आरोपों के समर्थन में निम्नलिखित दस्तावेजों का होना आवश्यक है।
1. कोई भी सामान या वस्तु खरीदने की पक्की रसीद पूर्ण विवरण सहित।
2. वारण्टी कार्ड की छायाप्रति।
3. शिकायतकर्ता द्वारा मांगा गया प्रतिकर (मुआवजा)
4. शिकायतकर्ता या उसके एजेंट द्वारा शिकायती प्रार्थना पत्र पर नाम, पता और हस्ताक्षर।
 इस अधिनियम के अंतर्गत शिकायत करने का तरीका अत्यंत सरल है । कोई भी उपभोक्ता शिकायतकर्ता के रूप में स्वयं या अपने प्रतिनिधि द्वारा शिकायत कर सकता है।
शिकायत डाक द्वारा भी भेजी जा सकती है। शिकायत करने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होता है और न ही किसी वकील की आवश्यकता होती है। शिकायतकर्ता स्वयं अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है।
उपभोक्ता का अधिकार:- जब वस्तु के दोष या सेवा में कमी सिद्ध हो जाती है, तब उपभोक्ता को निम्नलिखित अधिकार होते हैं:-
1. दोष वाली वस्तु के बदले दोष रहित नई वस्तु लेना या, 2. वस्तु सेवा के लिए दिया गया पैसा वापस लेना, या 3. नुकसान या क्षति के लिए प्रतिकर (मुआवजा) लेना, या 4. उपभोक्ता द्वारा खरीदे गए सामान या वस्तु के कारण हुई मानसिक क्षति का भी दावा कर सकता है।
शिकायत करने की समय सीमा:- उपभोक्ता द्वारा वस्तु में दोष पाए जाने या सेवा से नुकसान होने के दो साल के भीतर शिकायत की जा सकती है, परंतु फोरम इसके बाद शिकायत करने की अनुमति दे सकता है, अगर देरी का कारण उचित हो।
अपील:- जिला उपभोक्ता फोरम के विरूद्ध अपील राज्य उपभोक्ता कमीशन में, राज्य उपभोक्ता कमीशन के विरूद्ध अपील राष्ट्रीय उपभोक्ता कमीशन में की जाती है और राष्ट्रीय उपभोक्ता कमीशन के विरूद्ध उच्चतम न्यायालय में की जाती है। अपील, आदेश के तीस दिन के भीतर की जा सकती है। अपील के साथ आदेश की प्रमाणित छायाप्रति भी लगाना जरूरी है।

मोटर दुर्घटना के प्रभावित व्यक्तियों को मुआवजा

1. बस, ट्रक, सड़क कूटने वाले रोलर, कार, टैªक्टर, मोटर सायकल, मोपेड इत्यादि वाहनों द्वारा किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा किसी प्रकार के वाहन से सीधे या अन्य प्रकार से दुर्घटना हो जाती है तो उसे मोटर दुर्घटना कहा जाता है।
2. दुर्घटना में हुई क्षति के लिये प्रतिकर के भुगतान का प्राथमिक दायित्व दुर्घटना कारित वाहन के स्वामी तथा चालक का होता है।
3. मोटर यान अधिनियम की धारा 146 के अंतर्गत परपक्ष (तृतीय पक्ष) बीमा पालिसी प्राप्त करना अनिवार्य है और ऐसी स्थिति में प्रतिकर के भुगतान का दायित्व बीमा पॉलिसी की शर्तों के अनुसार वाहन स्वामी के बजाय संबंधित बीमा कम्पनी का हो जाता है।
4. यदि दुर्घटना करने वाले वाहन का विवरण मालूम नहीं हो तो ऐसी दुर्घटना के लिये भारत सरकार द्वारा तोषण निधि योजना 1989 बनाई गई है। इस योजना के अंतर्गत दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की मृत्यु होने की दशा में मृतक के विधिक प्रतिनिधि को 25000/- रूपये गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को 12500/-रूपये प्रतिकर के रूप में दिलाये जाने की व्यवस्था है। इस योजना के अंतर्गत संबंधित पीड़ित पक्ष के आश्रितों द्वारा दुर्घटना के 06 माह के भीतर निर्धारित प्रारूप पर प्रार्थना पत्र अधिकृत अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के समक्ष प्रस्तुत किये जाने पर आवश्यक जांच होती है और जांच उपरांत अधिकृत अधिकारी द्वारा अपनी संस्तुती कलेक्टर को प्रेषित की जाती है। जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर विचार करके कलेक्टर द्वारा नियमानुसार प्रतिकर धनराशि दिलाये जाने के लिये आवश्यक आदेश दिये जाते हैं। इस धनराशि के भुगतान का दायित्व संबंधित उस बीमा कम्पनी पर होता है, जिसे उस राज्य के लिये भारत सरकार द्वारा दायित्व सौंपा गया हो।
5. यदि दुर्घटना करने वाले वाहनों का विवरण ज्ञात हो, तो ऐसी स्थिति में मोटर यान अधिनियम के अंतर्गत गठित मोटर दुर्घटना क्लैम्स ट्रिब्यूनल अर्थात जिला न्यायाधीश अथवा अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के समक्ष मोटर वाहन के स्वामी, वाहन चालक और संबंधित बीमा कम्पनी के विरूद्ध प्रतिकर दावा प्रस्तुत किया जा सकता है। ऐसे दावा केवल 40/-रूपये कोर्ट फीस लगाकर निर्धारित प्रारूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
6. मोटर यान अधिनियम 1994 में हुये संशोधन के अनुसार प्रतिकर वाद को पेश किये जाने के संबंध में कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
7. प्रतिकर वाद प्रस्तुत करने वाले याचिका में निम्नांकित विवरण व दस्तावेज आवश्यक रूप से पेश करना चाहिए:-
1. प्रार्थीगण का नाम, पिता का नाम, पूरा पता, उम्र और व्यवसाय ।
2. दुर्घटनाकारित करने वाले वाहन स्वामी व चालक का नाम-पता ।
3. दुर्घटनाकारित करने वाला वाहन जिस बीमा कम्पनी से बीमाकृत हो उसका  नाम-पता तथा पॉलिसी की प्रतिलिपि।
4. दुर्घटनाकारित करने वाले वाहन चालक के ड्राईविंग लाइसेंस की फोटो प्रतिलिपि।
5. दुर्घटनाकारित करने वाले वाहन का रजिस्टेªशन प्रमाण पत्र की फोटो प्रतिलिपि।
6. दुर्घटना की तारीख, समय व स्थान।
7. प्रत्येक प्रार्थीगण का मृतक से संबंध (यदि दुर्घटना में मृत्यु हुई हो)।
8. मृतक की आयु, आय तथा आश्रितों के नाम-पते एवं मृतक से संबंध।
9. दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की चोटों की प्रकृति,ं इंजूरी रिपोर्ट एवं मृत्यु की दशा में पोस्ट मार्टम रिपोर्ट की फोटो प्रतिलिपि।
10. मांगी गई प्रतिकर की धनराशि और उसके लिये उपयुक्त आधार एवं अन्य आवश्यक दस्तावेज।
8. धारा 140 मोटर यान अधिनियम के उपबंधों के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मृत्यु या स्थायी निःशक्तता मोटर दुर्घटना के परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुई हो तो उस स्थिति में व्यक्ति की मृत्यु के संबंध में 50000/रूपये तथा स्थायी निःशक्तता वाले व्यक्ति का 25000/रूपये प्रतिकर के रूप में भुगतान करने का दायित्व वाहन स्वामी या वाहन के संयुक्त स्वामी द्वारा देय होता है।
9. मोटर यान अधिनियम 1988 की धारा 158 (6) के अंतर्गत पुलिस पर यह कानूनी दायित्व है कि जिस पुलिस थाने में दुर्घटना की सूचना दर्ज कराई गई है, उस थाने की पुलिस वाहन से संबंधित अपेक्षित अभिलेख एवं विवरण वाहन चालक और स्वामी से प्राप्त कर तथा निर्धारित शुल्क जमा करने पर वाहन से संबंधित अपेक्षित अभिलेख एवं विवरण आहत पक्ष को उपलब्ध करायेगा।

माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007

1. कोई वरिष्ठ नागरिक, जिसकी आयु 60 वर्ष अथवा उससे ज्यादा है इसके अंतर्गत माता पिता भी आते है, जो स्वयं आय अर्जित करने में असमर्थ है अथवा उनके स्वामित्वाधीन संपत्ति में से स्वयं का भरण पोषण करने में असमर्थ है, ऐसे ब्यक्ति उक्त अधिनियम के अंतर्गत भरणपोषण हेतु आवेदन करने हेतु हकदार है।
2. भ्रणपोषण का आवेदन वरिष्ठ नागरिक, माता-पिता अपने क्षेत्र के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के समक्ष पेश कर सकते है। न्यायालय का विधिक दायित्व है कि वे आवेदन की सुनवाई कर उसका निराकरण करें।
3. वरिष्ठ नागरिक, माता पिता को भरणपोषण खर्च पाने का पात्रता आय अर्जित करने वाले वयस्क पुत्र, पुत्री, पौत्री से प्राप्त करने का अधिकार है।
4. अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय द्वारा अधिकतम 10000/- दस हजार रूपये तक प्रतिमास का भरण पोषण खर्च वरिष्ठ नागरिक , माता पिता को दिलाया जा सकता है।
5. संबंधित न्यायालय द्वारा आदेश की एक प्रति निःशुल्क आवेदनकर्ता को प्रदत्त किये जाने का भी प्रावधान है।
6. वरिष्ठ नागरिक या माता पिता उक्त अधिनियम के अंतर्गत भरणपोषण का आवेदन पेश कर सकते है, अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के प्रावधान के अंतर्गत न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायालय में भी आवेदन पेश करने हेतु सक्षम है।
7. अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) न्यायालय द्वारा पारित किये गये आदेश के विरूद्व अपील उस जिले के जिला मजिस्ट्रेट अथवा कलेक्टर को होगी।
8. उक्त अधिकनियम के अन्तर्गत इस बात का भी प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकार प्रत्येक जिले में कम से कम एक वृद्वाश्रम स्थापित करेगी और उसका अनुरक्षण भी करेंगी।
9. इस बात का भी प्रावधान किया गया है। कि राज्य सरकार वरिष्ठ नागरिकों को चिकित्सा सहायता हेतु यथा संभव प्रयास करेगी और उन्हें निःशुल्क चिकित्सा की सुविधा प्रदत्त करवायी जायेगी।
10. इस बात का भी प्रावधान किया गया है कि वरिष्ठ नागरिक के जीवन और संपत्ति की रक्षा को सुनिश्चित करने के सभी उपाय राज्य सरकार द्वारा किये जायेंगें।

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Shayara Bano Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी