Saturday, 1 October 2016

बाल विवाह निवारण अधिनियम, 1929

बाल विवाह कानूनी अपराध है:-
बाल विवाह अधिनियम 1929 के अंतर्गत:

  • 18 साल से कम उम्र की लड़की एवं
  • 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी करवाना कानूनी अपराध है।

बाल विवाह में सहयोग करने वाले लोगों को सजा हो सकती है ऐसी शादी करवाने वाले या योगदान देने वाले सभी व्यक्तियों जैसे -
  • वर एवं वधु पक्ष के माता-पिता, रिश्तेदार, बाराती एवं विवाह करवाने वाले पंडित को बाल निवारण अधिनियम, 1929 की धारा 5, 6 के अंतर्गत तीन महीने की कैद अथवा जुर्माना, दोनों हो सकता है।

21 साल से कम उम्र के पुरूष द्वारा बाल विवाह कानूनी अपराध है:-
यदि कोई पुरूष जो कि 21 साल से कम तथा 18 साल से अधिक उम्र का है, बच्चे के साथ विवाह करता है, ऐसे व्यक्ति को बाल विवाह निवारण अधिनियम, 1929 की धारा 3 के अंतर्गत 15 दिन का सामान्य कारावास या 1000/रूपये जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।
21 साल से अधिक उम्र के पुरूष द्वारा बाल विवाह कानूनी अपराध है:-
  • यदि कोई पुरूष जो कि 21 साल से अधिक उम्र का है, बच्चे के साथ विवाह करता है, ऐसे व्यक्ति को बाल विवाह निवारण अधिनियम, 1929 की धारा 3 के अंतर्गत 3 महीने का सामान्य कारावास तथा जुर्माना भी हो सकता है।

न्यायालय द्वारा बाल विवाह अपराध की सुनवाई:-
न्यायालय बाल विवाह होने के पहले 1 साल के अंदर ही सुनवाई कर सकता है (धारा 9 के अंतर्गत)
बाल विवाह अपराध से संबंधित शिकायत जो न्यायालय के सामने आती है, वह न्यायालय स्वयं उसकी जॉंच कर सकता है या उसकी प्राथमिक जॉंच करवाने के लिये बाल विवाह अधिनियम, 1929 की धारा 10 के अंतर्गत किसी भी मजिस्टेªट को निर्देशित कर सकता है।
बाल विवाह अपराध की सूचना किसको दें:-
  • अगर किसी व्यक्ति को जानकारी मिलती है कि कहीं पर बाल विवाह करवाया जा रहा है तो वह इसकी सूचना संबंधित मजिस्टेªट अथवा पुलिस अधिकारी को दे सकता है।
  • वह अधिकारी बाल विवाह रोकने के लिये संबंधित पक्षकारों को आधिकारिक आदेश की जानकारी देगा।
  • यदि उसके बाद भी कोई व्यक्ति इस आदेश का उल्लंघन करेगा तो ऐसे व्यक्ति को बाल विवाह निवारण अधिनियम, 1929 की धारा 12 के अंतर्गत 3 माह का कारावास या 1000 रूपये जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।
  • बाल विवाह रोकने के लिये कोई भी व्यक्ति मेट्रोपोलिटिन मजिस्टेªट (प्रथम श्रेणी) के न्यायालय के समक्ष भी आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकता है।

महिलाओ का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम, 2013

पीड़ित महिला से आशय है कि -
1. किसी कार्य स्थल के संबंध में किसी भी आयु की ऐसी महिला चाहे नियोजित हो या नहीं, जो प्रत्यर्थी द्वारा लैंगिक उत्पीड़न के किसी कार्य के अध्यधीन रहने का अभिकथन करती है।
2. किसी निवास-गृह या गृह के संबंध में, किसी भी आयु की ऐसी महिला, जो ऐसे किसी निवास-गृह या गृह में नियोजित है:
 लैंगिक उत्पीड़न के अंतर्गत कोई एक या अधिक निंदनीय कार्य या व्यवहार सम्मिलित है -
1. शारीरिक स्पर्श और फायदा उठाना।
2. लैंगिक पक्षपात की मांग या प्रार्थना करना।
3. लैंगिक टीका-टिप्पणी करना।
4. अश्लील साहित्य दिखाना/सामग्री का प्रदर्शन।
5. लैंगिक प्रकृति का कोई अन्य निंदनीय शारीरिक या गैर शाब्दिक आचरण करना।
कार्यस्थल से आशय है कि - कोई विभाग, संगठन, उद्यम, संस्था, कार्यालय, शाखा, जो समुचित सरकार या स्थानीय अधिकरण किसी सरकारी कम्पनी या सहकारी सोसायटी द्वारा स्थापित उसके स्वामित्व एवं नियंत्रण में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध करायी गई निधियों द्वारा वित्तपोषित की जाती है। कोई प्राइवेट सेक्टर, गैर सरकारी संगठन, वाणिज्यिक वृत्तिक, मनोरंजक, औद्योगिक स्वास्थ्य सेवाएं जिसके अंतर्गत उत्पादन, विक्रय वितरण किया जाता है, अस्पताल या परिचर्या ग्रह, प्रशिक्षण, खेलकूद, स्टेडियम, कोई निवास गृह या गृह सम्मिलित है।
आंतरिक परिवाद समिति - किसी कार्य स्थल का हर नियोजक लिखित आदेश द्वारा आंतरिक परिवाद समिति का गठन करेगा, जिसमें एक पीठासीन अधिकारी होगा, जो कर्मचारियों में से कार्यस्थल पर वरिष्ठ स्तर की महिला होगी एवं कर्मचारियों में से दो ऐसे सदस्य होंगे जो महिलाओं की समस्याओं के प्रति प्रतिबद्ध हैं या जिनके पास समाज सुधार के कार्य का अनुभव है विधि का ज्ञान है एवं गैर सरकारी संगठन में से एक सदस्य जो
महिलाओं की समस्या के प्रति आबद्ध है या ऐसा व्यक्ति जो लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित विषयों से परीचित हैं।
स्थानीय परिवाद समिति - प्रत्येक जिला अधिकारी जिले में जहां आंतरिक परिवाद समिति गठन नहीं किया गया है, वहां लैंगिक उत्पीड़न का परिवाद ग्रहण करने के लिए स्थानीय परिवाद समिति का गठन करेगा।
स्थानीय परिवाद समिति का अध्यक्ष सामाजिक कार्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाला होगा और महिलाओं की समस्याओं के प्रति आबद्ध महिलाओं में से किया जाएगा, एक अन्य सदस्य भी महिला होगी जो जिले में ब्लाक, तालुक या नगर पालिका में कार्यरत महिलाओं में से होगी एवं दो सदस्य जिनमें से एक सदस्य महिला होगी जो महिलाओं की समस्याओं के प्रति प्रतिबद्ध गैर सरकारी संगठन में से होगी या ऐसा व्यक्ति जो लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित समस्याओं से परीचित होगा।
लैंगिक उत्पीड़न से पीड़ित महिला परिवाद कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न की घटना की तारीख से तीन माह की अवधि के भीतर लिखित में परिवाद आंतरिक समिति को या स्थानीय समिति को कर सकेगी।
सुलह - आंतरिक समिति या स्थानीय समिति जांच प्रारंभ करने से पूर्व पीड़ित महिला के अनुरोध पर सुलह के माध्यम से उसके और प्रत्यर्थी के बीच मामले का समाधान करने का उपाय कर सकेगी, परंतु कोई धन संबंधी समाधान सुलह के आधार के रूप में नहीं किया जाएगा।
यदि पीड़ित महिला एवं प्रत्यर्थी के बीच कोई समाधान हो गया है, वहां आंतरिक समिति या स्थानीय समिति समाधान को उल्लेखित करते हुए नियोजक या जिला अधिकारी को कार्यवाही के लिए भेजेगी। समाधान की कापी पीड़ित महिला और प्रत्यर्थी को दी जाएगी। यदि पीड़ित महिला और प्रत्यर्थी के बीच कोई समाधान हो जाता है, वहां आंतरिक समिति एवं स्थानीय समिति के द्वारा कोई जांच नहीं की जाएगी।
जांच लम्बित रहने के दौरान कार्यवाही - पीड़ित महिला द्वारा अनुरोध किए जाने पर आंतरिक समिति या स्थानीय समिति नियोजक को सिफारिश कर सकेगी कि पीड़ित महिला या प्रत्यर्थी का किसी अन्य कार्य स्थल पर स्थानांतरण किया जाए एवं पीड़ित महिला की तीन माह की अवधि तक छुट्टी मंजूर की जाये या पीड़ित महिला को अन्य राहत प्रदान की जाये।
जांच रिपोर्ट - यदि आंतरिक समिति या स्थानीय समिति, इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि प्रत्यर्थी के विरूद्ध किया गया कथन साबित हो गया है, वहां वे प्रत्यर्थी को लागू सेवा नियमों के उपबंधों के अनुसार कदाचार के रूप में कार्यवाही करने एवं जहां सेवा नियम नहीं बनाया गया है, वहां उस रीति में लैंगिक उत्पीड़न के लिए कार्यवाही करने, प्रत्यर्थी के वेतन या मजदूरी से पीड़ित महिला को या उसके विधिक वारिस को दी जाने वाली ऐसी राशि
जिसका निर्धारण किया गया है, कटौती करने की कार्यवाही करें।
पीड़ित महिला को दी जाने वाली प्रतिकर की राशि का निर्धारण करते समय आंतरिक समिति एवं स्थानीय समिति इस बात को ध्यान में रखेगी कि पीड़ित महिला को पहुंचाए गए मानसिक आघात, पीड़ा, यातना और भावनात्मक कष्ट, लैंगिक उत्पीड़न की घटना के कारण वृत्ति के अवसर की हानि पीड़ित द्वारा शारीरिक या मानसिक चिकित्सीय उपचार के लिए उपगत चिकित्सा व्यय को ध्यान में रखेगी एवं प्रत्यर्थी की आय और उसकी वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखेगी एवं राशि एकमुश्त या किश्तों में प्रदान किया जाए, इस बात का भी निर्धारण करेंगे।

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