Wednesday, 2 November 2016

छत्तीसगढ़ शासन विरूध्द महेशराव बाघमारे व अन्‍य curruption case mahesh rao bagmare

न्यायालय:-विशेष न्यायाधीश(भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम)
एवं प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, रायपुर (छ0ग0)
 (पीठासीन न्यायाधीश - जितेन्द्र कुमार जैन)

विशेष दाण्डिक प्रकरण क0-04/1997
सीआइएस नंबर 55/97
संस्थित दिनांक-01.04.1997
छत्तीसगढ़ शासन,
द्वारा-आरक्षी केन्द्र, एंटी करप्‍शन ब्यूरो, 
रायपुर (छ0ग0)                                                                         -- अभियोजन।
 // वि रू ध्द //
1/महेशराव बाघमारे, उम्र 39 वर्ष, 
पिता गोपीचंद,
तत्का0 कार्यपालन अधिकारी 
अंत्यावसायी समिति,
कार्यपालन अधिकारी 
जिला अंत्यावसायी कार्यालय, 
बिलासपुर, (छ0ग0)
2/सलीम बख्श शेख, उम्र 41 वर्ष, 
पिता शब्बीर बख्श शेख,
तत्का0 लिपिक 
जिला अंत्यावसायी समिति रायपुर,
वर्तमान-लेखापाल 
जिला अंत्यावसायी कार्यालय, 
बिलासपुर, (छ0ग0)
3/गणेश ठाकरे, उम्र 55 वर्ष, 
पिता स्व0उत्तमराव ठाकरे,
भृत्य जिला अंत्यावसायी समिति रायपुर, 
जिला अंत्यावसायी कार्यालय, 
निवासी कालीबाडी चौक,रायपुर, (छ0ग0)
4/मनोज कुमार जसवानी, उम्र 55 वर्ष, 
पिता स्व0ओटनदास जसवानी, निवासी
डी-26, सेक्टर-4, देवेन्द्र नगर, रायपुर, (छ0ग0)
5/अरूण बरेठवार, उम्र 63 वर्ष,
पिता स्व0गनपत राव, 
निवासी 10ए, चाणक्य काम्पलेक्स,
देवेन्द्र नगर, थाना गंज, रायपुर, (छ0ग0)                                           -- आरोपीगण।
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अभियोजन व्दारा श्री योगेन्द्र ताम्रकार विशेष लोक अभियोजक।
आरोपी मनोज व्दारा श्री एस0के0शर्मा अधिवक्ता ।
आरोपी सलीम, महेश एवं गणेश व्दारा श्री मनीष सिन्हा अधिवक्ता ।
आरोपी अरूण द्वारा श्री शरद राठौर अधिवक्ता ।
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// निर्णय //
( आज दिनांक: 07.07.2016 को घोशित )
1. आरोपीगण के विरूध्द भारतीय दण्ड विधान की धारा 120-बी, 409, विशेष दाण्डिक प्रकरण क्रमांक- 03/1997 420, 467, 468, 471, 477 तथा भ्रश्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा- 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के अंतर्गत यह आरोप है कि आरोपीगण ने वर्ष 1995 में या उसके लगभग परस्पर सहमति द्वारा एकराय होकर अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति मर्यादित (जिसे आगे समिति कहा गया है) के हितग्राहियों के नाम से फर्जी सदस्य बनाकर, उनके फर्जी प्रकरण तैयार कर उन्हें बेैंक में भेजे बिना भेजना बताकर बैंक द्वारा अनुदान की और मार्जिन की राशि की मांग किये बिना ही अनुदान राशि और मार्जिन राशि का चेक भेजा तथा अनुदान राशि भेजकर उस राशि को पे-आर्डर के द्वारा अन्य किसी व्यक्ति के खाते में जमा कर मार्जिन राशि की एफ0डी0आर0 बनवाकर उसे समय-सीमा से पूर्व ही तुड़वाकर रूपये प्राप्त कर अन्य बैंक में जमा किया फिर उस अन्य बैंक से उस जमा राशि के बदले रूपये प्राप्त कर इंडियन बैंक में जमा कर शेष रूपये प्राप्त करने के कार्य अवैध साधनों से कारित किये, लोक सेवक के नाते हितग्राहियों की मार्जिन मनी 39750/-रूपये और अनुदान राशि 39750/-रूपये से न्यस्त रहते हुए बेईमानी से दुर्विनियोग कर उसे अपने उपयोग में सम्परिवर्तित किया, उक्त समय, दिनांक एवं स्थान पर इंडियन बैंक के नाम के पत्र की जो कि इंडियन बैंक द्वारा तैयार नहीं किया गया और नहीं भेजा गया था, की कूटरचना चेक और मार्जिन मनी भेजने के संबंध में की तथा कार्यालय की डाक बुक में उक्त बैंक के पत्र के आधार पर चेक भेजने बाबत इंद्राज कर कूटरचित दस्तावेज की रचना की, छल के प्रयोजन से बैंक के कथित पत्र, कार्यालयीन डाक बुक की कूटरचना की तथा हितग्राहियों की सूची बनाने एवं उन्हें सदस्य बनाये जाने बाबत रसीदों की कूटरचना की और कूटरचित दस्तावेजों का उपयोग असली के रूप में प्रयोग में लाया, जबकि उसका कूटरचित होना आरोपीगण जानते थे।
2. आरोपीगण पर यह भी आरोप है कि उन्होंने उक्त दिनांक एवं समय पर या उसके लगभग मूल्यवान दस्तावेज, कार्यालय की डाक बुक को छिपाने की नीयत से नष्ट किया और इस प्रकार रिष्टि की, आरोपीगण ने उक्त दिनांक एवं समय पर या उसके लगभग छल किया और ऐसा करके इंडियन बैंक के अधिकारियों को प्रवंचित किया या बेईमानी से उत्प्रेरित किया कि वे अनुदान राशि के चेक को मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में पे आर्डर के द्वारा जमा करें या मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में जमा करने के लिए कोई आर्डर जारी करें जिसके अनुक्रम में इंडियन बैंक के अधिकारियों के द्वारा मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में जमा करने हेतु अनुदान राशि का पे आर्डर जारी किया गया, इसके अलावा आरोपीगण ने लोक सेवक रहते हुए अपने पद का दुरूपयोग अपने स्वयं के एवं साथियों के लिए अवैध लाभ पाने के लिए और पहुंचाने के लिए किया ।
3. प्रकरण में यह तथ्य अविवादित है कि घटना के समय मृत आरोपी बालक दास कार्यपालन अधिकारी, आरोपी सलीम बक्श लिपिक एवं आरोपी गणेश ठाकरे भृत्य के पद पर जिला अंत्यावसायी सहकारी समिति रायपुर में पदस्थ थे।
4. अभियोजन का मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि शासन की ओर से अल्प आय वर्ग के हरिजन आदिवासियों को विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत लाभ पहुंचाकर उनके जीवन स्तर को उंचा उठाने हेतु मध्यप्रदेश के प्रत्येक जिले में अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति मर्यादित की स्थापना की गयी थी, जिसके तहत निम्न आय वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए स्वरोजगार हेतु बैंकों के माध्यम से ऋण दिया जाना था, जिसमें हरिजन और आदिवासी हितग्राहियों को उक्त समिति के विधिवत सदस्य बनने के बाद ऋण देने की अनुशंसा कार्यपालन अधिकारी द्वारा किये जाने पर समस्त औपचारिकताओं की पूर्ति उपरान्त बैंक द्वारा ऋण दिया जाना था । 
5. वर्ष 1985 में रायपुर शहर में उक्त समिति में पदस्थ आरोपीगण ने एक राय होकर आपराधिक षडयंत्र कर समिति के माध्यम से अवैध धन प्राप्त करने की योजना बनायी और दिनांक 01.05.1985 को 16 हितग्राहियों को समिति का सदस्य होना जाहिर करने के लिए प्रत्येक के नाम की रसीद काटकर फर्जी प्रकरण तैयार किये और उन प्रकरणों को इंडियन बैंक भेजना दर्ज किया लेकिन प्रकरण नही भेजे गये और डाक बुक गायब कर दी गयी, फर्जी चेकों के बैंक पहुंचने पर अंत्यावसायी शाखा रायपुर से फर्जी पत्र भेजकर इंडियन बैंक रायपुर के शाखा प्रबंधक को 39750/-रूपये का पे-आर्डर मनोज क्लाथ स्टोर्स के नाम बनाने का आदेश दिया गया और बैंक कर्मचारियों की मिली-भगत से मनोज क्लाथ स्टोर के खाते से राशि आरोपी मनोज जसवानी के माध्यम से आपराधिक षडयंत्रपूर्वक निकाल ली गयी, प्रकरण की विवेचना के दौरान विभिन्न दस्तावेज अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति के कार्यालय एवं बैंक से जब्त किये गये ।
6. अन्वेषण के दौरान पाया गया कि 16 अस्तित्वहीन व्यक्तियों के नाम से फर्जी सदस्यता शुल्क जमा कर सदस्य बनाना दर्शित कर फर्जी प्रकरण तैयार कर ऋण प्राप्त कर लिया गया, बेैंक के आरोपी अधिकारियों के द्वारा भी बिना ऋण के औचित्य एवं हितग्राहियों की जांच किये बिना और उनके खाते खोले बिना ही उनके नाम से प्राप्त अनुदान राशि को पे-आर्डर के जरिये मनोज क्लाथ स्टोर के खाते में जमा कराने एवं मार्जिन मनी का एफ.डी.आर. बना दिया, फर्जी ऋण आवेदनों में विभिन्न व्यवसायों के लिए ऋण का जिक्र है, परंतु उनकी अनुदान राशि कपडा विक्रेता मनोज जसवानी के माध्यम से आहरित कर ली गयी, इस प्रकार सभी आरोपीगण द्वारा आपराधिक षडयंत्र कर एक राय होकर फर्जी दस्तावेज तैयार करते हुए धोखाधडी की गयी और फर्जी ऋण प्रकरण तैयार कर, उन्हें बैंक भेजना बताकर अन्य व्यवसाय वाले व्यक्ति के नाम पे-आर्डर बनवाकर उसके नाम राशि जमा कर दी गयी ।
7. अन्वेषण के दौरान देहाती नालिसी दर्ज की गयी, जिसे ले जाकर पुलिस थाना आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो भोपाल में दिये जाने पर उक्त के आधार पर आरोपीगण के विरूध्द प्रथम सूचना पत्र दर्ज किया गया, पटवारी से घटनास्थल का नजरी-नक्शा तैयार करवाया गया, आरोपीगण के माध्यम से दस्तावेज जप्त किये गये तथा अन्य कार्यवाहियां की गयी, विवेचना के दौरान साक्षियों के कथन लेखबद्ध किये गये, आरोपीगण को गिरफ्तार किया गया, शासकीय सेवक आरोपीगण के विरूध्द विधिवत् अभियोजन स्वीकृति प्राप्त की गयी, तदोपरांत संपूर्ण विवेचना पश्चात अभियोग-पत्र इस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
8. आरोपी बालक दास, महेश राव, सलीम बक्श, गणेश ठाकरे को धारा 120-बी, 409, 420, 467, 468, 471, 477 तथा भ्रश्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा- 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) एवं आरोपी मनोज व अरूण के विरूद्ध धारा 120-बी, 409, 420, 467, 468, 471, 477 के तहत आरोप विरचित कर पढकर सुनाये, समझाये जाने पर आरोपीगण ने अपराध करना अस्वीकार किया, विचारण के दौरान आरोपी बालक दास की मृत्यु होने के कारण उसके विरूद्ध प्रकरण उपशमित किया गया था तथा विचारण का दावा किया, अभियोजन की ओर से कुल तेईस साक्षियों का कथन करवाया गया है, विचारण उपरांत धारा-313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत अभिलिखित किये गये अभियुक्त कथन में आरोपीगण ने स्वयं को निर्दोश होना तथा झूठा फंसाया जाना बताया है।
9. इस प्रकरण में अवधारणीय प्रश्‍न निम्नानुसार है:-
(1) क्या आरोपीगण ने दिनंाक वर्ष 1995 में या उसके लगभग परस्पर सहमति द्वारा एकराय होकर अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति मर्यादित (जिसे आगे समिति कहा गया है) के हितग्राहियों के नाम से फर्जी सदस्य बनाकर, उनके फर्जी प्रकरण तैयार कर, फर्जी रसीद काटकर उन्हें बेैंक में भेजे बिना भेजना बताकर बैंक के द्वारा अनुदान की और मार्जिन की राशि की मांग किये बिना ही अनुदान राशि और मार्जिन राशि का चेक भेजा?
(2) क्या आरोपीगण ने अनुदान राशि भेजकर उस राशि को पे-आर्डर बनवाकर अन्य किसी व्यक्ति के खाते में जमा कर मार्जिन राशि की एफ0डी0आर0 बनवाकर प्राप्त करने के कार्य अवैध साधनों से कारित किये?
(3) क्या आरोपीगण ने लोक सेवक के नाते हितग्राहियों की मार्जिन मनी 39750/-रूपये और अनुदान राशि 39750/-रूपये से न्यस्त रहते हुए बेईमानी से दुर्विनियोग कर उसे अपने उपयोग में सम्परिवर्तित किया?
(4) क्या आरोपीगण ने उक्त समय, दिनांक एवं स्थान पर इंडियन बैंक के नाम के पत्र की जो कि इंडियन बैंक द्वारा तैयार नहीं किया गया और न हीं भेजा गया था, की कूटरचना चेक और मार्जिन मनी भेजने के संबंध में की तथा कार्यालय की डाक बुक में उक्त बैंक के पत्र के आधार पर चेक भेजने बाबत इंद्राज कर कूटरचित दस्तावेज की रचना की,
(5) क्या आरोपीगण ने उक्त दिनांक समय एवं स्थान पर छल के प्रयोजन से बैंक के कथित पत्र, कार्यालयीन डाक बुक की कूटरचना की तथा हितग्राहियों की सूची बनाने एवं उन्हें सदस्य बनाये जाने बाबत रसीदों की कूटरचना की और कूटरचित दस्तावेजों का उपयोग असली के रूप में प्रयोग में लाया?
(6) क्या आरोपीगण ने उक्त दिनांक एवं समय पर या उसके लगभग मूल्यवान दस्तावेज, कार्यालय की डाक बुक को छिपाने की नीयत से नष्ट किया?
(7) क्या आरोपीगण ने उक्त दिनांक एवं समय पर इंडियन बैंक के अधिकारियों को प्रवंचित किया या बेईमानी से उत्प्रेरित किया कि वे अनुदान राशि के चेक को मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में पे आर्डर के द्वारा जमा करें या मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में जमा करने के लिए कोई आर्डर जारी करें जिसके अनुक्रम में इंडियन बैंक के अधिकारियों के द्वारा मनोज क्लाथ स्टोर्स के खाते में जमा करने हेतु अनुदान राशि का पे आर्डर जारी कर छल किया गया?
(8) क्या आरोपी महेश, सलीम बक्श, एवं गणेश ने जिला अंत्यावसायी समिति में क्रमशः सहायक कार्यपालन अधिकारी, लिपिक एवं भृत्य के पद पर पदस्थ होते हुए अपने लोक सेवक के पद का दुरूपयोग कर अपने स्वयं के एवं साथियों के लिए अवैध लाभ पाने के लिए और पहुंचाने के लिए किया? 
// अवधारणीय प्रश्न पर निष्‍कर्ष एवं निष्कर्ष के कारण//
10. अवधारणीय प्रश्न क्रमांक-(1) से (8) पर निष्कर्ष एवं निष्कर्ष के कारण:-- सभी अवधारणीय प्रश्न एक दूसरे से संबंधित होने के कारण उन पर एक साथ विचार किया जा रहा है । डिप्टी कलेक्टर शंकरलाल डगला अ0सा015 का कथन है कि दिनांक 08.08.89 को वह उप जिलाधीश एवं प्रभारी जिला अंत्यावसायी समिति रायपुर के पद पर था, नगर निगम से गरीबों की सूची आती थी, जिसमें लोन फार्म तैयार कर बैंक भेजा जाता था, जांच पश्चात बैंक लोन देने संबंधी कार्यवाही करता था, उनके कार्यालय से आवेदन भेजने पर राशि लेनदेन की कार्यवाही बैंक एवं संबंधित पक्षकार के मध्य होती थी, बैंक द्वारा लोन देने की सूचना ही अंत में कार्यालय को भेजी जाती थी, अनुदान राशि के रूप में लोन दिये जाने वाले व्यक्ति को पचास प्रतिशत राशि कार्यालय द्वारा दी जाती थी, यू0डी0पाटनी अ0सा08 का कथन है कि बैंक अधिकारी से पूछने पर यह जानकारी मिली कि अंत्यावसायी समिति से मिले आदेशानुसार वहां राशि ट्रांसफर की गयी थी, अंत्यावसायी समिति के द्वारा भेजी गयी मार्जिन मनी बैंक में ही थी, हितग्राहियों के नाम से अंत्यावसायी समिति द्वारा ऋण के एवज में अनुदान राशि एवं मार्जिन मनी भेजी जाती थी, मार्जिन मनी की राशि का कुल ब्याज हितग्राहियों के नाम से उनके खाते में संयोजित होता था, योजना के संबंध में उक्त साक्षियों के कथन अखंडित रहे हैं ।  
11. लक्ष्मीनारायण मालवीय असा012 का कथन है कि वर्तमान प्रकरण में तत्कालीन प्रबंध संचालक नन्हंे सिंह द्वारा अंत्यावसायी योजना का स्वरूप निर्धारण किया था । समिति के माध्यम से बैंक से ऋण प्रदान करने की योजना बनायी गयी चूंकि योजना शासन द्वारा जारी की गयी है इसलिए इस संबंध में शासन द्वारा विभिन्न परिपत्र, निर्देश पत्र जारी किये गये, जिसके अनुसार योजना का स्वरूप, कार्यक्षेत्र निर्धारण पत्र दिनांक 31.03.84 प्र0सी-1, निर्देश दिनांक 07.04.84 प्र0सी-2, योजना बाबत अर्ध शासकीय पत्र दिनांक 24.04.84 प्र0सी-3, समितियों में कार्यरत विकास अधिकारी, कार्यपालन अधिकारी, सहायक कार्यपालन अधिकारी, वरिष्ठ निरीक्षक का कार्य विभाजन आदेश दिनांक 18.01.82 प्र0पी04 भृत्य, निम्न श्रेणी लिपिक, उच्च श्रेणी लिपिक का कार्य विभाजन आदेश प्र0पी05 है ।
12. उक्त साक्षियों के कथनों एवं दस्तावेजों से यह प्रमाणित होता है कि शासन द्वारा 4500/-रूपये वार्षिक से अधिक आय न होने वाले अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति के सदस्यों को उनके उत्थान हेतु ऋण दिये जाने की योजना बनायी गयी, जिसमें अनुदान राशि एवं मार्जिन मनी भी दिये जाने की व्यवस्था थी, उक्त योजना के अनुसार उसके सदस्य/हितग्राही बनने वाले व्यक्तियों को ही रूपये 12,000/-तक ऋण विभिन्न कायों के लिए दिये जाने का प्रावधान था, जिसके अनुसार व्यवसाय/व्यापार के लिए विशेष दुर्बल समूह को अनुदान राशि 33 1/3 प्रतिशत मार्जिन मनी 20ः एवं अन्य को अनुदान राशि 25ः दिये जाने का प्रावधान था।
13. समिति द्वारा योजना के अनुसार सदस्य बनाकर प्रकरण दो प्रतियों में तैयार कर एक प्रति बैंक को भेजने, बैंक द्वारा जांच कर अनुदान राशि एवं मार्जिन मनी की मांग समिति से करने पर समिति द्वारा अनुदान राशि एवं मार्जिन मनी का चैक बैंक को भेजे जाने, बैंक द्वारा उक्त अनुदान राशि के प्राप्त होने पर उसे ऋणी के खाते में जमा करने तथा मार्जिन मनी का तीन वर्ष के लिए सावधि जमा बनाकर समिति को वापस भेजने का प्रावधान किया गया था तथा उक्त मार्जिन मनी की राशि की प्रत्येक 12 माह में गणना करने और तीन वर्ष पश्चात मार्जिन मनी की जमा राशि को 4 प्रतिशत के साथ शासन को वापस करने तथा शेष ब्याज की राशि प्रतिशत सदस्य/हितग्राही के खाते में जमा किये जाने का प्रावधान किया गया था, हितग्राही को 36 किश्तों में ऋण राशि अदा करना था, उक्त योजना में निर्धारित शर्तो के अनुसार अधिकारियों एवं कर्मचारियों के उक्त अधिकार एवं दायित्व के साथ मध्यप्रदेश राज्य में लागू की गयी।
14. जिला निर्वाचन शाखा रायपुर के स्टोर कीपर जीएस यदु अ0सा01 का कथन है कि आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो वाले कुछ वोटर लिस्ट जब्ती पत्र प्र0पी01 के माध्यम से जब्त किये थे, बाबूभाई अ0सा07 का कथन है कि वह पांच वर्ष से स्टेशनरोड रायपुर का पार्षद है वहां के सभी लोगों को जानता है, वार्ड में परसराम वल्द आशाराम, मानसिंह वल्य जयनारायण, चिंतामणी वल्द रघुवीर नामक व्यक्ति रहते हैं या नहीं याद नहीं है, सूर्यकांत अ0सा010 का कथन है कि वह जन्म से पुरानी बस्ती रायपुर में निवास करता है, 6-7 साल पहले डीएसपी साहब ने कुछ व्यक्तियों के बारे में उससे नाम लेकर पूछा था, कुछ लोगों ने शिकायत की थी कि फर्जी नाम से बैंक लोन दिया जा रहा है, खुशाल अ0सा019 का कथन है कि वह जोरापारा में चालीस वर्ष से रहा है, वहां लक्ष्मीकांत पिता हेमराज, अमर पिता परसुराम, धनीराम पिता पूनाराम, रामजी पिता बलीराम, बसीमा पिता मनीराम गोंड, बलदाउ पिता राजेन्द्र नामक व्यक्ति को नहीं जानता न ही उस नाम का कोई व्यक्ति 1985 या उसके बाद निवास किया । बाबूभाई ने अपने प्रतिपरीक्षण में इस कथन से इंकार किया है कि झूठी गवाही दे रहा है, खुशाल ने प्रतिपरीक्षण में बताया है कि किरायेदार लोग आते जाते रहेते हैं सूर्य कांत ने प्रतिपरीक्षण में इंकार किया है कि वह थाने में बैठता है और वहां जाकर गवाहीं देता है, बाबूभाई, सूर्यकांत एवं खुशाल के कथन अखंडित रहे हैं ।
15. निरीक्षक जेपी द्विवेदी ने प्रतिपरीक्षण में बताया है कि उसने हितग्राहियों के बारे में उनके बताये पते पर जाकर तलाश किया परंतु कोई हितग्राही उस पते पर नहीं मिला पते में जिन हितग्राहियों का पता लिखा था उन मोहल्लों में भी जा जाकर उसने पता किया, परंतु इस कथन से इंकार किया है कि उसने हितग्राहियों का पता नहीं किया । जी0एस0यदु के कथनों से उसके द्वारा वोटर लिस्ट ए0सी0बी0 वालों को देना बताया है, उक्त साक्षियों के कथनों एवं वोटर लिस्ट से यह प्रमाणित हुआ है कि जदमी बाई, रामेश्वर, रतन, लक्ष्मी, संतोष, बलदाउ, पीतांबर, मानसिंह, भैयालाल, चिंतामणी, घसनिन बाई, छबिलाल, सुखराम, आनंद राम, यशवंतराव, परसराम नामक व्यक्ति प्रकरण में दिये गये पते पर घटना के समय निवास नहीं करते थे।
16. अपर कलेक्टर नवल सिंह अ0सा09 का कथन है कि वह 1989 में डिप्टी कलेक्टर एवं कार्यपालन अधिकारी जिला अंत्यावसायी समिति में पदस्थ था, उनके कार्यालय से खाता क्रमांक 5575 दिनांक 1.10.84 से 15.01.86 तक के इंद्राज का स्टेशनरी स्टाक रजिस्टर 14.10.82 से 22.2.84, स्टेशनरी रजिस्टर 1985-86, उक्त रजिस्टरों में सील का उल्लेख है, काउंटर चेक नंबर 032750, केशबुक दिनांक 1.7.84 से 30.6.85 एवं 1.7.85 से 30.6.86 तक जब्त कर, जब्ती पत्र प्रपी-2 बनाये थे, उक्त जब्ती का समर्थन नामदेव अ0सा02 द्वारा भी किया गया है, निरीक्षक आर0डी0सिंह अ0सा0 13 द्वारा नवल सिंह से जब्ती पत्र प्रपी-2 के माध्यम से उक्त दस्तावेज जब्त होना बताया है जिसके संबंध में उक्त साक्षियों के कथन अखंडित रहे हैं, जिससे यह प्रमाणित पाया जाता है कि नवल सिंह से गवाहों के समक्ष निरीक्षक रामद्वार सिंह ने काउंटर चेक, दो स्टेशनरी स्टाक रजिस्टर, खाते की प्रति, दो केशबुक जब्त किया था।
17. अपर कलेक्टर नवल सिंह अ0सा09 का यह भी कथन है कि दिनांक 17.7.89 को पुलिस वाले उसके पेश करने पर जब्ती पत्र प्रपी010 के माध्यम से 16 हितग्राहियों का आवेदन, जिला सहकारी केंद्रीय बेंक की जमा पर्ची दिनांक 11.9.84 से 30.01.85, सदस्यता रसीद बुक क्रमांक 19 एवं 20, बैंक की जमा पर्ची, चेक काउंटर, जब्त किये थे, निरीक्षक आरडी सिंह ने उक्त दस्तावेज जब्ती पत्र प्रपी010 के माध्यम से नवल सिंह से जब्त करना बताया है, नवल सिंह ने प्रतिपरीक्षण में बताया है कि उसने जब्ती पत्र देखकर दस्तावेजों के संबंध में बताया है, जब्ती पत्र वर्ष 1989 में बनाया है, साक्षी का कथन 2001 में हुआ है परंतु जब्ती के संबंध में साक्षियों के कथन अखंडित रहे हैं जिससे यह प्रमाणित पाया जाता है कि एनएस मडावी से निरीक्षक ने 16 आवेदन पत्र, जमा पर्ची, दो सदस्यता रसीद बुक, काउंटर चेक, जब्त किया था ।
18. जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक मर्यादित रायपुर के नगर शाखा प्रबंधक शिव कुमार शर्मा अ0सा06 का कथन है कि जिला अंत्यावसायी को-आपरेटिव सोसाइटी का खाता क्रमांक 5575 उनके बैंक में है, जिसका लेजर प्र0पी06ए है, चेक क्रमांक 052897 प्र0पी07 एवं चेक क्रमांक 062160 पी08 क्रमशः रूपये 42,763/- एवं रूपये 39750/- जिला अंत्यावसायी को-आपरेटिव सोसाइटी द्वारा इंडियन बैंक रायपुर के नाम से जारी किया गया था, उक्त साक्षी का कथन प्रतिपरीक्षण में अखंडित रहा है, चेक क्रमांक 052897 रूपये 42,763/-मार्जिन मनी से संबंधित है तथा चेक क्रमांक 062160 रूपये 39750/-अनुदान राशि से संबंधित है, जिसका उल्लेख उक्त चेकों में किया गया है, निरीक्षक जेपी द्विवेदी का कथन है कि उसने धारा 91 दप्रस का नोटिस शाखा प्रबंधक केंद्रीय सहकारी बैंक को देकर दस्तावेज मांगा था, इस तरह शिवकुमार शर्मा के कथन से यह प्रमाणित पाया जाता है कि जिला अंत्यावसायी को-आपरेटिव सोसाइटी द्वारा उक्त दोनों चेक जारी किये गये थे जो इंडियन बैंक के माध्यम से कोआपरेटिव सोसाइटी में क्लीयरिंग हेतु आये थे और क्लीयरिंग के माध्यम से रूपये 42,763/- एवं रूपये 39750/- को-आपरेटिव सोसाइटी के जिला को आपरेटिव सोसाइटी के खाता क्रमांक 5575 से इंडियन बैंक को भेजे गये थे।
19. निरीक्षक जेपी द्विवेदी असा016 का कथन है कि उसने धारा 91 दप्रस का नोटिस प्र0पी024 शाखा प्रबंधक इंडियन बैंक रायपुर को दिया था, हरिशंकर अ0सा05 का कथन है कि पुलिस वाले उसके सामने इंडियन बैक के अधिकारी से कुछ दस्तावेज एवं कागजात जब्ती पत्र प्रपी05 के माध्यम से जब्त किये थे, निरीक्षक रामद्वार सिंह अ0सा013 का कथन है कि जब्ती पत्र प्रपी05 के माध्यम से उसने एच.नारायण के पेश करने पर शत्रुघन एवं हरिशंकर के समक्ष पुनर्निवेश जमा योजना राशि का पत्र दिनांक 23.2.85, कलेक्टर अंत्यावसायी का मूल पत्र क्रमांक 555 दिनांक 8.2.85 को जब्त किया था उक्त जब्ती के संबंधमें उक्त साक्षियों के कथन अखंडित रहे हैं, उक्त पत्र क्रमांक 555 आर्टिकल आई के द्वारा चेक क्रमांक 062160 रूपये 39750/- का बेंक पे आर्डर मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से बनाने का निर्देश कार्यालय कलेक्टर अंत्यावसायी द्वारा शाखा प्रबंधक इंडियन बैंक रायपुर को दिये जाने का उल्लेख है जिससे यह प्रमाणित होता है कि समिति द्वारा दिये गये निर्देश के आधार पर इंडियन बैंक द्वारा मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से 39750/- का बेंक पे आर्डर बनाया गया एवं अन्य राशि का एफ डी बनाया गया ।
20. शत्रुघन अ0सा03 का कथन है कि जब्ती पत्र प्रपी03 के माध्यम से पुलिस वाले दस्तावेज जब्त किये थे, चंद्रकुमार बंजारे का कथन है कि पुलिस वाले अनूप टोप्पों से उसके सामने जब्ती पत्र प्रपी03 के माध्यम से दस्तावेज जब्त किये थे उक्त जब्ती के संबंध में उक्त साक्षियों के कथन अखंडित रहें है जिससे प्रमाणित पाया जाता है कि निरीक्षक पीएन शुक्ला ने अनूप से गवाह शत्रुघन एवं पी0बंजारे के समक्ष इंडियन बैंक का करंेट लेजर जिसके पृष्ठ क्र0197, 483 एवं 486 में मनोज क्लाथ स्टोर के नाम क्लीरिंग पश्चात क्रमशः रूपये 39750/-, 57000/- एवं 27250/- जमा किये जाने का लेख है । एच0नारायणयन अ0सा020 सीनि0मैनेजर इंडियन बैंक का कथन है कि एस0रामास्वामी एवं भट्टाचार्य को जानता है पत्र प्र0पी018 में उनके हस्ताक्षर हैं, विजय कुमार नायर अ0सा021 का कथन है कि वह इंडियन बैंक रायपुर में वर्ष 1989 से 1993 तक शाखा प्रबंधक था, दिनांक 9.9.91 को राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो द्वारा उससे उनके बैंक का एक इंटर्नल क्रेडिट वाउचर दिनांक 9.2. 85 रूपये 39750/- प्र0पी026, मनोज क्लाथ स्टोर के नाम का पे आर्डर रूपये 39750/- प्र0पी014 को जब्ती पत्र प्र0पी027 के माध्यम से जब्त किया था, उक्त संबंध में उक्त साक्षियों के कथन अखंडित रहे हैं, प्रकरण में आये उक्त साक्ष्य से यह प्रमाणित पाया जाता है कि जिला अंत्यावसायी समिति द्वारा इंडियन बैंक को चेक क्रमांक 062160 रूपये 39750/- का भेजा और उसे पत्र आर्टिकल आई के माध्यम से मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से पे आर्डर बनाने का निर्देश दिया जिसके आधार पर जिला सहकारी बैंक में उक्त चेक को भेजकर उसके आहरित होने के बाद वह राशि इंडियन बैंक में प्राप्त हुई और इंडियन बैंक द्वारा उक्त राशि का पे आर्डर प्र0पी014 मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से बनाया गया और मनोज क्लाथ स्टोर के खाते में उक्त राशि जमा की गयी ।
21. शंकर लाल डगला अ0सा015 का यह भी कथन है कि प्रस्तुत प्रकरण में उसने पाया था कि प्रस्तुत प्रकरण में उसके कार्यकाल में हितग्राहियों के पैसे की हेराफेरी हुई थी, बैंक वालों ने जानकारी दी थी कि गलत व्यक्ति को लोन दिया गया है, उसके पास के दस्तावेजों एवं जानकारी के आधार पर शिकायत प्र0पी018 एवं प्रथम सूचना पत्र प्र0पी019 आर्थिक  अपराध अन्वेषण वालों को किया था, पुलिस ने उससे प्र0पी04 के माध्यम से आर्टिकल ए से जे तक के दस्तावेज जब्त किये थे, जिसमें इंडियन बैंक को चेक नंबर उल्लेख कर भेजा गया पत्र, चेक 39750/-, 16 हित ग्राहियों की सूची, कार्यपालन अधिकारी द्वारा इंडियन बैंक को अनुदान राशि बाबत लिखा गया पत्र है, हितग्राहियों का जो पता दिया गया था वहां कोई हितग्राही नहीं मिले थे अनुदान राशि का भुगतान किया जाता है, मार्जिन मनी बैंक में रह जाती है ।
22. शंकरलाल का यह भी कथन है कि घटना के समय आरोपी बालक दास कार्यपालन अधिकारी, एमके बाघमारे सहायक कार्यपालन अधिकारी, एसबी शेख लिपिक, अरूण कुमार ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी में टाइपिस्ट के पद पर थे, बैंक वालों ने हितग्राहियों को राशि का भुगतान नहीं किया जिससे उस राशि का गबन होना वह समझता है, बालक दास ने बैंक को पत्र लिखकर शासकीय राशि का मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से चेक बनाने का निर्देश दिया, एसबी शेख द्वारा गलत प्रकरण बैंक भेजे एवं आरोपी गणेश ठाकेरे द्वारा गलत प्रकरणों को बैंक भेजने की रसीद प्राप्त की, आरोपी बालकदास कार्यपालन अधिकारी थे, इसलिए बैंक से केश निकालना, पैसा भेजना उनका कर्तव्य था, आरोपी शेख लिपिक होने के कारण प्रकरणों को प्राप्त करना बैंकों को भेजना आदि उसका कर्तव्य था एवं चपरासी ठाकरे का कार्य जितने प्रकरण प्राप्त होते हैं उन्हें बेंक में जमा करने का था, साक्षी चंद्रकुमार बंजारे एवं निरीक्षक आरडी सिंह ने कथन किया है कि एसएल डगला से निरीक्षण सिंह द्वारा जब्ती पत्र प्रपी04 के माध्यम से इंडियन बैंक का पत्र, हितग्राहयों के नाम लिखे आवेदन, अनुदान स्वीकृति आदेश जब्त किया गया था ।
23. शंकरलाल डगला ने अपने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि वह यह भी नहीं बता सकता कि मनोज क्लाथ स्टोर का स्वामी आरोपी मनोज है, प्रथम सूचना पत्र में ठाकरे का नाम नहीं है तथा उसने दस्तावेज की जांच नहीं की परंतु इस कथन से इंकार किया है कि उसने झूठी कार्यवाही की है, संबंधित बैंक द्वारा जिन हितग्राहियों को ऋण दिया जाता है उसकी मार्जिन मनी एवं अनुदान राशि की मांग करती है, हरिशंकर ने अपने प्रतिपरीक्षण में दस्तावेजों को नहीं देखना व पढना बताया परंतु डगला से दस्तावेज जब्त होना बताया है, उक्त साक्षियों के कथनों से दस्तावेजों की जब्ती संदेह से परे प्रमाणित हुई है जिसमें चेकों का विवरण, सदस्य/हितग्राहियों के नाम,ऋण राशि एवं ऋण के कारण का विस्तृत उल्लेख है, जिस सदस्य/हितग्राही को जिस कार्य के लिए जितनी राशि का ऋण स्वीकृत किया गया था, उसको प्रमाणित करता है।
24. यू0डी0 पाटनी का यह भी कथन है कि सन 1987 से 1990 तक आदिम जाति कल्याण विभाग में जिला संयोजक के पद पर था, कलेक्टर साहब ने उसे स्टेप अप के प्रकरणों में गडबड़ी की जांच के लिए आदेशित किया था जिसकी जांच डगला साहब कर रहे थे, आदेश मिलने पर उसने बैंक जाकर जांच कर, पाया था कि बैंक को हितग्राहियों के ऋण के विरूद्ध अनुदान राशि अंत्यावसायी निगम द्वारा भेजी गयी थी, जिसे हितग्राहियों के खाते में जमा न कर मनोज क्लाथ स्टोर रायपुर के नाम से टांसफर किया गया था, उसने जांच कर सभी प्रकरण जिलाध्यक्ष को भेजा था, उक्त साक्षी ने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि डगला साहब ने उसे जांच रिपोर्ट नहीं दी थी और उसने उसे पुलिस को नहीं दिया, शेष के संबंध में किये गये इस साक्षी के कथन अखंडित रहे हैं ।
25. निरीक्षक सुधीर केलकर अ0सा022 का कथन है कि समिति के प्रभारी अधिकारी का पत्र प्राप्त होने पर उसने प्रथम सूचना पत्र क्रमांक 03/89 प्र0पी028 दर्ज किया था, निरीक्षक जे0पी0द्विवेदी अ0सा016 का कथन है कि उसने प्रकरण में एस0डगला का पूरा कथन लिया है, गवाह सूर्यकांत, भैयालाल, खुशाल, के0सुब्रमणियम, शिव कुमार शर्मा, बी0बी0गांधी, जी0एस0यदु, आर0के0गुप्ता, यू0डी0पाटनी का कथन लिया था । रमेश गुप्ता ब0सा017 के द्वारा अभियोजन प्रकरण का समर्थन नहीं किया गया है, डी0एस0पी0 के.के.अग्रवाल अ0सा014 का कथन है कि उसके द्वारा आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था एवं अभियोग पत्र प्रस्तुत किया था ।
26. लक्ष्मीनारायण मालवीय अ0सा012 का कथन है कि वह म0प्र0राज्य सहकारी अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम भोपाल में सहायक ग्रेड-1 के पद पर है, आरोपी महेश राव, आरोपी सलीम बख्श एवं गणेश ठाकरे के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृति हेतु तत्कालीन प्रबंध संचालक को प्राप्त हुआ था, तब तत्का0प्रबंध संचालक रामसजीवन द्वारा अभियोजन स्वीकृति आदेश प्र0पी017 दिया गया था, इस साक्षी ने अपने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि वह नहीं बता सकता कि किन-किन दस्तावेजों को देखकर अभियोजन स्वीकृति दी गयी थी, अभियोजन स्वीकृति आदेश प्र0पी017 के अवलोकन से दर्शित होता है कि उसमें रामसजीवन द्वारा विस्तृत रूप से प्रकरण के संबंध मे विचार करते हुए अभियोजन स्वीकृति दी है, उक्त आदेश में अभियोग पत्र एवं उससे संबंधित दस्तावेजों का विस्तृत रूप से उल्लेख किया गया है, इसलिए उनके साक्ष्य से यह प्रमाणित पाया जाता है कि अभियोजन स्वीकृति आदेश प्र0पी017 विधि अनुसार जारी करते हुए आरोपी महेश राव, आरोपी सलीम बख्श एवं गणेश ठाकरे के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृति प्रदान किये थे ।
27. अरूण कुमार मिश्रा अ0सा023 का कथन है कि वह विधि एवं विधायी कार्य विभाग मंत्रालय भोपाल में सहायक ग्रेड-1 के पद पर है, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो द्वारा अपराध क्रमांक 03/89 में आरोपी बालक दास के विरूद्ध अभियोजन स्वीकृति चाही गयी थी, जिसके आधार पर तत्कालीन अतिरिक्त सचिव द्वारा अभियोजन स्वीकृति आदेश प्र0पी029 दिया गया था, प्रकरण में आरोपी बालक दास की मृत्यु हो गयी है, परंतु अभियोजन स्वीकृति आदेश प्र0पी029 के अवलोकन से दर्शित होता है कि उसमें विस्तृत रूप से प्रकरण का उल्लेख करते हुए अभियोजन स्वीकृति दी गयी है, जो विधि अनुसार होना दर्शित होती है ।
28. डिप्टी कलेक्टर नवल सिंह अ0सा09 के कथनों से यह प्रमाणित हुआ है कि उससे जब्ती पत्र प्र0पी010 के माध्यम से 16 हितग्राहियों के आवेदन, काउंटर चेक, जमा पर्ची, सदस्यता शुल्क की कार्बन रसीद जब्त की गयी थी, उक्त जब्ती पत्र के माध्यम से जब्त 16 हितग्राहियों के आवेदन क्रमांक 1881 दिनांक 17.01.85, 1886 से 1892 एवं 1894 दिनांक 21.01.85, क्रमंाक 1950 से 1956 दिनांक 05.02.85 के अवलोकन से दर्शित होता है कि उसमें प्रत्येक हितग्राही के लिए आवेदन पत्र, मय फोटो आवेदन पत्र, अनुबंध पत्र संलग्न है, परंतु किसी आवेदन में सदस्य/हितग्राही का फोटो नहीं है तथा सारे आवेदन, अनुबंध पत्र आधे अधूरे भरे हुए हैं और तीनों दस्तावेज अपूर्ण हैं।
29. सदस्यता शुल्क की जो कार्बन रसीद जब्त की गयी है, जो वर्तमान प्रकरण से संबंधित रसीद क्रमांक 1881 दिनांक 17.01.85, 1886 से 1892 एवं 1894 दिनांक 21.01.85, क्रमंाक 1950 से 1956 दिनांक 05.02.85 तक है, जिनके क्रमांकों का उल्लेख आवेदन पत्रों एवं अनुबंध पत्र में दर्ज है, उक्त रसीद में 10/-रूपये सदस्यता शुल्क एवं 50 पैसा प्रवेश शुल्क के रूप में काटा गया है, उक्त आवेदन पत्र के संबंध में ही उक्त 10 रूपये पचास पैसे की रसीद काटी गयी है, प्रकरण में जब्ती पत्र प्र0पी05ए के माध्यम से निरीक्षक जेपी द्विवेदी ने आरोपी सलीम से समिति की उपस्थिति पंजी मार्च 83 से दिसंबर 85 तक की जब्त की है जिसमें आरोपी महेशराव एवं आरोपी सलीम के वैसे ही हस्ताक्षर हैं, जैसे कि रसीदों में हस्ताक्षर हैं इसलिए धारा 73 साक्ष्य अधिनियम में दिये गये प्रावधान अनुसार उक्त दोनों हस्ताक्षरों का मिलान करने पर वे एक समान होना पाये जाते हैं, इसलिए रसीद क्रमांक 1881, 1886 से 1892, 1894, 1950 से 1956 में आरोपी महेशराव एवं आरोपी सलीम के हस्ताक्षर होना पाया जाता है।
30. कलेक्टर अंत्यावसायी शाखा रायपुर के पत्र क्रमांक 555 दिनांक 08.02. 1985 द्वारा शाखा प्रबंधक इंडियन बैंक रायपुर को भेजना बताया है परंतु जावक रजिस्टर में पत्र क्रमांक 555 दिनांक 14.02.85 को शा0प्रबंधक स्टेट बेंक को भेजे जाने का उल्लेख है, जबकि भृत्य गणेश की जिम्मेदारी उक्त पत्र को बैंक में ले जाने की थी, परंतु आरोपी गणेश की अन्य आरोपियों के साथ अपराध में सहभागिता को प्रमाणित करती है ।
31. आवेदन पत्रों, अनंुबंध पत्र एवं शंकर लाल डगला से जब्त दस्तावेज आर्टिकल ए से सी के अवलोकन से दर्शित होता है कि फर्जी व्यक्ति जदमी बाई, रामेश्वर, रतन, लक्ष्मी, संतोष, बलदाउ, पीतांबर, मानसिंह, भैयालाल, चिंतामणी, घसनिन बाई, छबिलाल, सुखराम, आनंद राम, यशवंतराव, परसराम का आधा अधूरे दस्तावेज तैयार किये और उनको जीवित व्यक्ति बताते हुए, बिना ऋण स्वीकृत किये, पृथक-पृथक रूपये 39750/-के ऋण स्वीकृत किये गये और 39750/-रूपये अनुदान राशि, मार्जिन मनी की राशि नियत की गयी, जिसका चैक प्र0पी08 एवं पी015 के द्वारा इंडियन बैंक भेजा गया तथा बैंक द्वारा मार्जिन मनी 39750/-रूपये का पुनर्निवेश योजना का प्रमाण पत्र प्र0पी013 बनाया गया तथा उसकी राशि प्राप्त कर चेक प्र0पी07 रूपये 42763/-का इंडियन बैंक भेजकर पुनर्निवेश योजना रसीद प्र0पी026 तैयार करवायी गयी ।
32. आर्टिकल ए से जे से यह भी दर्शित होता है कि उसमें क्रमांक 10 एवं 16 में वर्णित चिंताराम एवं परसराम का ही रेडिमेड एवं कपडे के व्यवसाय का उल्लेख है, शेष व्यक्ति का अलग-अलग कार्य किये जाने का उल्लेख है परंतु समिति के कार्यपालन अधिकारी द्वारा अनुदान की राशि 39750/-रूपये का पे आर्डर मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से बनवाने के संबंध में पत्र लिखा गया और उक्त आधार पर कपडों के संबंध में उक्त पे आर्डर बनवा दिया गया, जबकि अनुदान की राशि का पे आर्डर नहीं बनाया जा सकता क्योंकि वह राशि हितग्राही के खाते में जमा होती है, हितग्राही उनके दिये गये पते पर थे ही नहीं तथा फर्जी व्यक्तियों के नाम से आवेदन पत्र, रसीद काटी गयी और उसमे ंआरोपी महेश राव एवं सलीम बक्श द्वारा हस्ताक्षर किये गये, आर्टिकल बी, ई, एच में आरोपी महेशराव के हस्ताक्षर हैं तथा पत्र आर्टिकल ए, सी, एफ में टाइपिंग से शेख लिखा है, आरोपी सलीम बक्श शेख घटना के समय समिति में लिपिक था और टाइप करने वाले का नाम पत्र में लिखा जाता है, उक्त आर्टिकल में शेख लिखा जाना यही प्रमाणित करता है कि आरोपी सलीम शेख द्वारा उक्त पत्रों को तैयार किया गया, इस तरह उक्त आर्टिकल ए से एफ तक के फर्जी दस्तावेजों को तैयार कर उपरोक्तानुसार उसमें आरोपी महेशराव एवं सलीम द्वारा अवैध कार्य किया गया। बैंक को ऋण प्रकरण भेजे बिना, जांच उपरान्त अनुदान एवं मार्जिन राशि समिति से बैंक द्वारा मांगे बिना भी उसे भेजा जाना प्रमाणित हुआ है, उक्त पे आर्डर की राशि मनोज क्लाथ स्टोर के इलाहाबाद बैंक के खाते में जमा की गयी और राशि आहरित कर लिया गया, तथा डाक बुक के माध्यम से भृत्य गणेश ठाकरे द्वारा पत्र बैंक में ऋण प्रकरण न देकर फर्जी तौर पर तैयार किये गये प्रकरण के आधार पर अनुदान एवं मार्जिन मनी की राशि के चैक बैंक में ले जाकर दिया गया ।
33. भ्रश्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा- 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) का प्रावधान निम्नानुसार है:- धारा 13, लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार-(1) लोक सेवक आपराधिक अवचार का अपराध करने वाला कहा जाता है -(डी) यदि वह- (एक) भ्रष्ट या अवैध साधनों से अपने लिये या किसी व्यक्ति के लिये कोई मूल्यवान वस्तु या धन संबंधी लाभ अभिप्राप्त करता है या (दो) लोक सेवक के रूप में अपनी स्थिति का दुरूपयोग करके अपने लिये या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई मूल्यवान चीज या धन संबंधी लाभ अभिप्राप्त करता है। प्रकरण में आये साक्ष्य से यह प्रमाणित हुआ है कि आरोपी महेश राव, सलीम बक्श एवं गणेश ठाकरे लोक सेवक होते हुए भ्रष्ट, अवैध साधन एवं अपनी स्थिति का दुरूपयोग कर अपने लिये एवं मनोज क्लाथ स्टोर के लिए धन संबंधी लाभ अभिप्राप्त किया 34. प्रकरण में आये दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य से यह प्रमाणित हुआ है
कि समिति में लोक सेवक के पद पर सहायक कार्यपालन अधिकारी महेशराव, लिपिक शेख सलीम बक्श एवं भृत्य गणेश ठाकरे पदस्थ होते हुए अन्य के साथ मिलकर अपराधिक षडयंत्र कर अवैध रूप से योजना का पालन किये बिना फर्जी तौर पर हितग्राहियों के रूप में, ऐसे व्यक्तियों को हितग्राही बनाया गया, जो अस्त्वि में नहीं थे और उनके आधे अधूरे आवेदन पत्र, अनुबंध पत्र तैयार किये, रसीद काटी, उसमें फर्जी तौर पर हितग्राहियों के हस्ताक्षर और अंगूठे किये गये और उनका उपयोग असली के रूप में करते हुए इंडियन बैंक में हितग्राहियों का प्रकरण भेजे बिना चेक भेजकर अनुदान की राशि के चेक को मनोज क्लाथ स्टोर का पे आर्डर बनाने का अवैध पत्र इंडियन बैंक का सील लगा हुआ, डाक बुक में फर्जी इंद्राज कर इंडियन बैंक को लिखा गया और ऐसे दस्तावेजों की कूटरचना की, डाक बुक मूल्यवान दस्तावेज को नष्ट किया, अनुदान राशि हितग्राहियों के खाते में जमा न कर उक्त राशि समिति के खाते से निकलवाकर मनोज क्लाथ स्टोर के नाम का पे आर्डर बनवाकर आहरण करवा लिया और आहरण करवाकर गबन किया तथा समिति को रूपये 39750/-की क्षति पहुंचायी एवं लोकसेवक रहते हुए पद का दुरूपयोग कर स्वयं या अन्य को अवैध लाभ पहुंचाया ।
35. प्रकरण में रूपये 39750/- का पे आर्डर मनोज क्लाथ स्टोर रायपुर के नाम से बनाया गया है, परंतु मनोज क्लाथ स्टोर का स्वामी प्रकरण का आरोपी मनोज हो और उसके द्वारा राशि प्राप्त की गयी हो इस संबंध में कोई दस्तावेज प्रमाणित नहीं किया गया है, इसलिए अभियोजन आरोपी मनोज की वर्तमान प्रकरण में संलिप्तता प्रमाणित करने में असफल रहा है। प्रकरण में आरोपी अरूण के विरूद्ध कोई साक्ष्य नहीं है, इसलिए अभियोजन उसके विरूद्ध अपराध प्रमाणित करने में असफल रहा है। 
36. उक्त कारणों से अभियोजन यह संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल रहा है कि आरोपी महेशराव सहायक कार्यपालन अधिकारी, सलीम बक्श लिपिक एवं गणेश ठाकरे भृत्य के पद पर जिला अंत्यावसायी समिति में लोक सेवक के रूप में पदस्थ रहते हुए अन्य के साथ परस्पर सहमति से 1995 में या उसके लगभग अंत्यावसायी सहकारी समिति के हितग्राहियों के नाम से फर्जी सदस्य बनाये, फर्जी ऋण प्रकरण तैयार किये, उन्हें बैंक में भेजे बिना भेजना बताकर बैंक द्वारा अनुदान की और मार्जिन मनी की राशि की मांग किये बिना ही अनुदान राशि और मार्जिन मनी का चेक भेजना, अनुदान राशि भेजकर उस राशि को पे आर्डर द्वारा अन्य व्यक्ति के खाते में जमा कर मार्जिन मनी का एफ0डी0बनवाकर पे आर्डर को उसे अन्य बैंक में जमा कर राशि प्राप्त करने का अवैध कार्य अवैध साधनों से किया, आरोपीगण लोक सेवक होते हुए लोक सेवक के नाते हितग्राहियों की अनुदान राशि रूपये 39750/-से न्यस्त रहते हुए बेईमानी से उसका दुर्विनियोग किया, इंडियन बैंक के नाम के पत्र जो इंडियन बैंक द्वारा तैयार नहीं किया गया और भेजा ही नहीं गया उसकी कूटरचना चेक और मार्जिन मनी  भेजने के संबंध में की, कार्यालय की डाक बुक में बैंक के उक्त पत्र के आधार पर चेक भेजने बाबत इंद्राज कर कूटरचित दस्तावेज की रचना की, छल के प्रयोजन से बैंक के कथित पत्र डाक बुक हितग्राहियों की सूची बनाने, आवेदन पत्र अनुबंध पत्र एवं रसीदों की कूटरचना की, कूटरचित दस्तावेजों को उनका कूटरचित होना जानते हुए उसका असली के रूप में प्रयोग किया, मूल्यवान दस्तावेजों को छिपाने की नीयत से नष्ट किया, इंडियन बैंक के अधिकारियों को प्रवंचित कर बेईमानी से उत्प्रेरित कर अनुदान राशि के चेक की राशि का मनोज क्लाथ स्टोर के नाम से पे आर्डर बनवाकर उसके खाते में जमा कर छल किया तथा लोक सेवक के पद पर रहते हुए पद का दुरूपयोग कर अपने स्वयं के एवं अन्य के लिए अवैध लाभ पाने एवं पहुंचाने के लिए किया, इसलिए आरोपी महेश राव, सलीम बख्श, गणेश ठाकरे को धारा 409, 420, 467, 468, 471, 477,120-बी भा0द0वि0 तथा धारा- 13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रश्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अपराध में दोषी पाकर दोषसिद्ध ठहराया जाता है ।
37. अभियोजन आरोपी मनोज एवं अरूण के विरूद्ध अपराध को प्रमाणित करने में असफल रहा है, इसलिए आरोपी मनोज एवं अरूण को धारा 409, 420, 467, 468, 471, 477, 120-बी भा0द0वि0 के अपराध से दोषमुक्त किया जाता है।
38. प्रकरण की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपीगण को परिवीक्षा का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता, दंड के प्रश्न पर सुनने के लिए निर्णय थोडे समय के लिए स्थगित किया गया ।
 (जितेन्द्र कुमार जैन)
 विशेष न्यायाधीश(भ्रष्टा0निवा0अधि0)
 एवं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीष,
 रायपुर, छ0ग0
पुनश्च:-
39. दंड के प्रश्न पर आरोपीगण एवं उनके अधिवक्ताओं के तर्क सुने गये, उन्होंने निवेदन किया कि आरोपीगण बीस वर्षों से प्रकरण में उपस्थित होते रहे हैं, वे शासकीय नौकरी में हैं इसलिए उन्हें कम से कम दंड से दंडित किया जाये।
40. दंड के प्रश्न पर विचार किया गया, आरोपीगण द्वारा बिना हितग्राहियों को ऋण दिये ऋण से संबंधित शासकीय राशि का गबन किया जाना प्रमाणित हुआ है इसलिए आरोपी महेश राव, सलीम बक्श शेख एवं गणेश ठाकरे को निम्नलिखित दंडादेश दिया जाता है:-

आरोपीगण को दी गयी कारावास की सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी ।
41. प्रकरण में आरोपी सलीम बक्श दिनांक 02.04.97 एवं 03.04.97 को अभिरक्षा में रहा है, उसे दी गयी सजी में उक्त अवधि धारा 428 द0प्र0सं0 के तहत समायोजित की जावे।
42. प्रकरण में अन्य आरोपी के विरूद्ध पूरक चालान प्रस्तुत किये जाने का उल्लेख अभियोग पत्र में है इसलिए संपत्ति का निराकरण नहीं किया जा रहा है ।
43. आरोपीगण जमानत-मुचलके पर हैं, उनके जमानत मुचलके धारा 437-ए द0प्र0सं0 के अंतर्गत छह माह के लिए विस्तारित किये जाते हैं जो उक्त अवधि उपरान्त स्वयमेव समाप्त माने जाएंगे।
निर्णय मेरे निर्देश में टंकित निर्णय खुले न्यायालय में पारित  किया गया। किया गया।
 सही/- 
 (जितेन्द्र कुमार जैन)
 विशेष न्यायाधीश(भ्रष्टा0निवा0अधि0)
 एवं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश,
 रायपुर, छ0ग0

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