Friday, 30 September 2016

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956

वेश्यावृत्ति का अर्थ -
किसी भी व्यक्ति का आर्थिक लाभ के लिए लैंगिक शोषण करने को वेश्यावृत्ति कहते हैं।
वेश्यागृह का अर्थ -
किसी मकान, कमरे, वाहन या स्थान से या उसके किसी भाग से है, जिसमें किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए किसी का लैंगिक शोषण का दुरूपयोग किया जाए या दो या दो से अधिक महिलाओं के द्वारा अपने आपसी लाभ के लिए वेश्यावृत्ति की जाती है।
अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य अपराध हैं -
1. कोई व्यक्ति जो वेश्यागृह को चलाता है, उसका प्रबंध करता है या उसके रखने में और प्रबंध में मदद करता है तो उसको कम से कम व अधिक से अधिक तीन साल का कठोर कारावास, और 2000/- रूपये का जुर्माना होगा। यदि वह व्यक्ति दोबारा इस अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसको कम से कम दो साल व अधिक से अधिक पांच साल का कठोर कारावास और दो हजार रूपये का जुर्माना होगा।
2. कोई व्यक्ति जो किसी मकान, या स्थान का मालिक, किराएदार, भारसाधक, एजेंट है, उसे वेश्यागृह के लिए प्रयोग करता है या उसे यह जानकारी है कि ऐसे किसी स्थान या उसके भाग को वेश्यागृह के लिए प्रयोग में लाया जाएगा,या वह अपनी इच्छा से ऐसे किसी स्थान या उसके किसी भाग को वेश्यागृह के रूप में प्रयोग करने में भागीदारी देता है। तो ऐसे व्यक्ति को दो साल तक की जेल और दो हजार रूपये का जुर्माना हो सकता है। यदि वह दोबारा इस अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसको पांच साल के कठोर कारावास व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
वेश्यावृत्ति की कमाई पर रहना -
कोई भी 16 साल की उम्र से अधिक व्यक्ति अगर किसी वेश्या की कमाई पर रह रहा है, तो ऐसे व्यक्ति को दो साल की जेल या एक हजार रूपये का जुर्माना हो सकता है या दोनों।
अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे या नाबालिग द्वारा की गई वेश्यावृत्ति की कमाई पर रहता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 7 साल व अधिक से अधिक 10 साल की जेल हो सकती है।
कोई भी व्यक्ति जो 16 साल से अधिक उम्र का है -
1. वेश्या के साथ उसकी संगत में रहता है, या 2. वेश्या की गतिविधियों पर अपना अधिकार, निर्देश या प्रभाव इस प्रकार डालता है, जिससे यह मालूम होता है कि वह वेश्यावृत्ति में सहायता, प्रोत्साहन या मजबूर करता है या
3. जो व्यक्ति दलाल का काम करता है।
 तो माना जाएगा कि (जब तक इसके विपरीत सिद्ध न हो जाए) कि ऐसे व्यक्ति वेश्यावृत्ति की कमाई पर रह रहे हैं।
वेश्यावृत्ति के लिए किसी व्यक्ति को लाना, फुसलाना या बहलाने की चेष्टा करनाः-
यदि कोई व्यक्ति -
1. किसी व्यक्ति को उसकी सहमति या सहमति के बिना वेश्यावृत्ति के लिए लाता है, लाने की कोशिश करता है, या
2. किसी व्यक्ति को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए फुसलाता है, ताकि वह उससे वेश्यावृत्ति करवा सके तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 3 साल व अधिक से अधिक 7 साल के कठोर कारावास और 2000/- रूपये के जुर्माने से दंडित किया जाता है और अगर यह अपराध किसी व्यक्ति की सहमति के विरूद्ध किया जाता है तो दोषी व्यक्ति को सात साल की जेल जो अधिकतम 14 साल तक की हो सकती है, दंडित किया जा सकता है और अगर यह अपराध किसी बच्चे के विरूद्ध किया जाता है तो दोषी को कम से कम 7 साल की जेल, व उम्र कैद भी हो सकती है।
वेश्यागृह में किसी व्यक्ति को रोकना -
अगर कोई व्यक्ति किसी को उसकी सहमति या सहमति के बिना -
1. वेश्यागृह में रोकता है ।
2. किसी स्थान पर किसी व्यक्ति को किसी के साथ जो कि उसका पति या पत्नी नहीं है, संभोग करने के लिए रोकता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम सात साल की जेल जो कि दस साल या उम्र कैद तक हो सकती है और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे के साथ वेश्यागृह में पाया जाता है, तो वह दोषी तब माना जाएगा, जब तक इसके लिए विपरीत सिद्ध नहीं हो जाता है।
अगर बच्चे या 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति वेश्यागृह में पाया जाता है, और उसकी चिकित्सीय जांच के बाद यह सिद्ध होता है कि उसके साथ लैंगिक शोषण हुआ है, तो यह माना जाएगा कि ऐसे व्यक्ति को वेश्यावृत्ति करवाने के लिए रखा गया है या उसका लैंगिक शोषण आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा है।

अगर कोई व्यक्ति किसी महिला या लड़की का -
1. सामान जैसे गहने, कपड़े, पैसे या अन्य संपत्ति आदि अपने पास रखता है या 2. उसको डराता है कि वह उसके विरूद्ध कोई कानूनी कार्यवाही शुरू करेगा, अगर वह अपने साथ वह गहने, कपड़े, पैसे या अन्य संपत्ति जो कि ऐसे व्यक्ति द्वारा महिला या लड़की को उधार या आपूर्ति के रूप में या फिर ऐसे व्यक्ति के निर्देश में दी गई हो, ले जाएगी। तो यह माना जाएगा कि ऐसे व्यक्ति ने महिला या लड़की को वेश्यागृह में या ऐसी जगह रोका है, जहां वह महिला या लड़की कारे संभोग के लिए मजबूर कर सके।
सार्वजनिक स्थानों या उसके आस-पास वेश्यावृत्ति करना -
यदि कोई व्यक्ति जो वेश्यावृत्ति करता है या करवाता है, ऐसे स्थानों पर -
1. जो राज्य सरकार ने चिन्हित किए हों या
2. जो कि 200 मीटर के अंदर किसी सार्वजनिक पूजा स्थल, शिक्षण संस्थान, छात्रावास, अस्पताल, परिचर्या गृह ऐसा कोई भी सार्वजनिक स्थान जिसको पुलिस आयुक्त या मजिस्ट्रेट द्वारा अधिसूचित किया गया हो।
तो ऐसे व्यक्ति को 3 महीने तक का कारावास हो सकता है।
कोई व्यक्ति यदि किसी बच्चे से ऐसा अपराध करवाता है तो उसको कम से कम सात साल व अधिक से अधिक उम्र कैद या 10 साल तक की जेल हो सकती है तथा जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।
अगर कोई व्यक्ति जो -
1. ऐसे सार्वजनिक स्थानों का प्रबंधक है, वेश्याओं को व्यापार करने व वहां रूकने देता है।
2. कोई किराएदार, दखलदार या देखभाल करने वाला व्यक्ति वेश्यावृत्ति के लिए ऐसे स्थानों के प्रयोग की अनुमति देता है।
3. किसी स्थान का मालिक, एजेंट ऐसे स्थानों को वेश्यावृत्ति के लिए किराए पर देता है।  तो वह तीन महीने के कारावास और 200/- रू. के जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
यदि वह व्यक्ति फिर ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है तो वह छः महीने की जेल और दो सौ रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
अगर ऐसा अपराध किसी होटल में किया जाता है तो उस होटल का लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा।
वेश्यावृत्ति के लिए किसी को फुसलाना या याचना करना -
अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों पर किसी व्यक्ति को किस घर या मकान से इशारे, आवाज, अपने आपको दिखाकर किसी खिड़की या बालकनी से वेश्यावृत्ति के लिए आकर्षित, फुसलाता या विनती करता है या छेड़छाड़, आवारागर्दी या इस प्रकार का कार्य करता है, जिससे यहां पर रहने वाले या आने-जाने वालों को बाधा या परेशानी होती है, तो उसको 6 महीने की जेल और पांच सौ रूपये के जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
अगर वह फिर से यह अपराध करता है तो उसको एक साल की जेल और पांच हजार रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
अगर यह अपराध कोई पुरूष करता है तो वह कम से कम सात सात दिन तथा अधिक से अधिक तीन महीने की जेल से दंडित किया जा सकता है।
अपने संरक्षण में रहने वाले व्यक्ति को फुसलाना -
यदि कोई व्यक्ति अपने संरक्षण, देखभाल में रहने वाले किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए फुसलाता है, उकसाता है या सहायता करता है, तो वह कम से कम सात साल की जेल जो कि उम्र कैद या दस साल तक सजा हो सकती है, जेल व जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
सुधार संस्था में भेजने का आदेश -
सार्वजनिक स्थानों या उनके आस-पास वेश्यावृत्ति करना, वेश्यावृत्ति के लिए किसी फुसलाना या याचना करने के संबंध में दोषी महिला को उसकी शारीरिक या मानसिक स्थिति के आधार पर न्यायालय उसको सुधार संस्था में भी भेजने का आदेश दे सकता है। सुधार संस्था में कम से कम दो साल व अधिक से अधिक पांच साल के लिए भेजा जा सकता है।
विशेष पुलिस अधिकारी एवं सलाहकार बॉडी -
राज्य सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों के संबंध में विशेष पुलिस अधिकारियों को नियुक्त करेगी।
सरकार कुछ महिला सहायक पुलिस अधिकारियों की भी नियुक्ति कर सकती है।
इस अधिनियक के अंदर दिए गए सभी अपराध संज्ञेय हैं -
इस अधिनियम के अंदर दिए गए अपराध के दोषी व्यक्ति को विशेष पुलिस अधिकारी या उसके निर्देश के बिना, वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता है।
तलाशी लेना -
विशेष पुलिस अधिकारी या दुर्व्यापार पुलिस अधिकारी बिना वारंट के किसी स्थान की तलाशी तब ले सकते हैं, जब उनके साथ उस स्थान के दो या दो से अधिक सम्मानित व्यक्तियों, जिनमें कम से कम एक महिला भी साथ हो।
वहां पर मिलने वाले व्यक्तियों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों की आयु, लैंगिक शोषण, व यौन संबंधी बीमारियों की जानकारी के लिए चिकित्सीय जांच करायी जाएगी।
ऐसे स्थानों पर मिलने वाली महिलाएं या लड़कियों से, महिला पुलिस अधिकारी ही पूछताछ कर सकती है।
वेश्यागृह से छुड़ाना -अगर मजिस्ट्रेट को किसी पुलिस अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति से सूचना मिलती है कि कोई व्यक्ति वेश्यावृत्ति कर रहा है या करता रहा है तो पुलिस अधिकारी (जो इंस्पेक्टर की श्रेणी से उच्च का होगा) उस स्थान की तलाशी लेने और वहां मिलने वाले लोगों को उसके सामने पेश करने को कह सकता है।
वेश्यागृह को बंद करना -
मजिस्ट्रेट को पुलिस से या किसी अन्य व्यक्ति से सूचना मिलती है कि कोई घर मकान, स्थान आदि सार्वजनिक स्थान के 200 मीटर के भीतर वेश्यावृत्ति के लिए प्रयोग किया जा रहा है तो वह उस जगह के मालिक किराएदार, एजेंट या जो उस स्थान की देखभाल कर रहा है, उसे नोटिस देगा कि वह सात दिन के अंदर जवाब दें कि क्यों न उस स्थान को अनैतिक काम के लिए प्रयोग किए जाने वाला घोषित किया जावे।
संबंधित पक्ष को सुनने के बाद यदि यह लगता है कि वहां पर वेश्यावृत्ति हो रही है तो मजिस्ट्रेट सात दिन के अंदर उसको खाली करने व उसकी अनुमति के बिना किराये पर न देने के आदेश दे सकता है।
संरक्षण गृह में रखने के लिए आवेदन -
कोई व्यक्ति जो वेश्यावृत्ति करता है या जिससे वेश्यावृत्ति करायी जाती है, वह मजिस्ट्रेट से संरक्षण गृह में रखने व न्यायालय से सुरक्षा के लिए आवेदन कर सकता है।
वेश्याओं को किसी स्थान से हटाना -मजिस्ट्रेट को सूचना मिलने पर यदि यह लगता है कि उसके क्षेत्राधिकार में कोई वेश्या रह रही है, तो वह उसको वहां से हटने व फिर उस स्थान पर न आने का आदेश दे सकता है।
विशेष न्यायालयों की स्थापना -
इस अधिनियम के अंतर्गत किए गए अपराधों के लिए राज्य सरकार व केंद्र विशेष न्यायालय की स्थापना भी कर सकती है। भारतीय दंड संहिता के अंतर्ग भी महिलाओं व बच्चों को बेचने व खरीदने पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रावधान बनाए गए हैं।
18 साल से कम उम्र की लड़की को गैर कानूनी संभोग के लिए फुसलाना (धारा-366-क)
यदि कोई व्यक्ति किसी 16 साल से कम उम्र की लड़की को फुसलाता है, किसी स्थल से जाने को या कोई कार्य करने को यह जानते हुए कि उसके साथ अन्य व्यक्ति द्वारा गैर कानूनी संभोग किया जाएगा या उसके लिए मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
विदेश से लड़की का आयात करना (धारा 366-ख)
अगर कोई व्यक्ति किसी 21 साल से कम उम्र की लड़की को विदेश से या जम्मू कश्मीर से लाता है, यह जानते हुए कि उसके साथ गैर कानूनी संभोग किया जाएगा या उसके लिए मजबूर किया जाएगा तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
वेश्यावृत्ति आदि के बच्चों को बेचना (धारा-372)
अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए गए जाने के लिए उसको बेचता है या भाड़े पर देता, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल तक की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र की लड़की को किसी वेश्या या किसी व्यक्ति को, जो वेश्यागृह चलाता हो या उसका प्रबंध करता हो, बेचता है, भाड़े पर देता है तो यह माना जाएगा कि उस व्यक्ति ने लड़की को वेश्यावृत्ति के लिए बेचा है, जब तक कि इसके विपरीत साबित न हो जाए।
वेश्यावृत्ति आदि के लिए बच्चों को खरीदना (धारा 373) -
अगर कोई व्यक्ति किसी 18 साल से कम उम्र के बच्चे को वेश्यावृत्ति, या गैर कानूनी संभोग, या किसी कानून के विरूद्ध, और दुराचारिक काम में लाए जाने या उपयोग किए जाने के लिए उसको खरीदता है या भाड़े पर देता है, तो ऐसे व्यक्ति को 10 साल की जेल और जुर्माने से भी दंडित किया जा सकता है।
न्यायालयों के देह व्यापार से संबंधित निर्णय:-
1. उ्रच्चतम न्यायालय ने गौर जैन बनाम भारत संघ में कहा है कि वेश्यावृत्ति एक अपराध है, लेकिन जो महिलाएं देह व्यापार करती है, उनको दोषी कम और पीड़ित ज्यादा माना जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा है कि ऐसी परिस्थितियों में रहने वाली महिलाओं और उनके बच्चों को पढ़ाई के अवसर और आर्थिक सहायता भी दी जानी चाहिए तथा उनको समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए उनकी शादियां भी करवानी चाहिए , जिससे बाल देह व्यापार में कमी हो सके।
2. उच्च न्यायालय ने प.न. कृष्णलाल बनाम केरल राज्य में कहा कि राज्य के पास यह शक्ति है कि वह कोई व्यापार या व्यवसाय जो गैर कानूनी, अनैतिक या समाज के लिए हानिकाकर है, उस पर रोक लगा सकती है

बलात्कारः एक अपराध

बलात्कार क्या है?
कानून की नजर में बलात्कार एक जघन्य अपराध है। आए दिन महिलाएं इसका शिकार हो रही है। महिलाएं सामाजिक रूढ़िवादियों से बचने के लिये इस बात को दबा देती है। इसकी खास वजह पुलिस एवं कोर्ट कचहरी है। कुछ लोग तो पुलिस थानों में सूचना भी नहीं देते हैं।
कानून की नजर में ‘‘किसी महिला के इच्छा के विरूद्ध यदि कोई व्यक्ति उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है, उसे बलात्कार कहते हैं।‘‘
भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत बलात्कार कब माना जाता है:-
  • 15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ किया गया शारीरिक संबंध बलात्कार कहलाता है।
  • अगर कोई पुरूष महिला की सहमति के बिना उसके साथ शारीरिक संबंध करता है। सहमति किसी तरह से डरा-धमका कर ली गई हो, जैसे उसको मारने, घायल करने या उसके करीबी लोगों को मारने या घायल करने की धमकी देकर ली गई हो।
  • अगर सहमति झूठे प्रलोभन, झूठे वादे तथा धोखेबाजी (जैसे शादी का वादा, जमीन
  • जायदाद या वादा आदि) से ली जाती तो ऐसी सहमति को सहमति नही माना जाएगा।
  •  नकली पति बनकर उसकी सहमति ली गई हो।
  • उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह दिमागी रूप से कमजोर या पागल हो।
  • नशीले पदार्थ के सेवन के कारण वह होश में न हो तब उसकी सहमति ली गई हो।
  • 16 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ किया गया शारीरिक संबंध बलात्कार की श्रेणी में आता हो चाहे लड़की की सहमति हो तब भी।

बलात्कार के लिये सजाः
  • सात साल या कारावास जो बढ़कर 10 साल का भी हो सकता है। कुछ मामलों में इसे उम्र कैद में भी बदला जा सकता है। इसके अलावा जुर्माना भी हो सकता है।
  • जिस महिला के साथ बलात्कार किया गया हो, वह उसकी पत्नी हो या 12 साल से कम उम्र की न हो तब उसकी व्यक्ति को 2 साल का कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
  • अगर न्यायालय 7 साल से कम की सजा देता है तो उसे लिखित रूप में उसका उचित कारण देना होगा।

विशेष परिस्थितियॉंः
निम्न व्यक्तियों द्वारा किये गये बलात्कार की सजा कम से कम 10 साल का सश्रम कारावास जिसे उम्र कैद तक बढ़ाया जा सकता हैः-
अगर कोई पुलिस अधिकारी निम्न अवस्थाओं में बलात्कार करता हैः-
  • उस थाने के अंदर जिसका वह क्षेत्र अधिकारी हो।
  • उस थानों के अंदर जो उसके अधिकार में न हो।
  • वह महिला जो उसकी हिरासत में या उसके अधीनस्थ अधिकारी की हिरासत में हो।
  • लोक सेवक जो अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके उसकी हिरासत में हो या उसके अधीनस्थ की हिरासत में होने वाली महिला के साथ बलात्कार करता है।
  • अस्पताल के प्रबंधक और कर्मचारियों द्वारा अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते हुये उनकी देखरेख के अधीन जो महिलाएॅं हों उनके साथ बलात्कार करता हो।
  • गर्भवती महिला के साथ बलात्कार करता हो।
  • जो सामूहिक बलात्कार करता है।

निम्नलिखित परिस्थतियों में शारीरिक संबंध स्थापित करना अपराध माना जाता
हैः-
  • जो व्यक्ति कानूनी तौर पर अलग रहा हो परंतु पत्नी की सहमति के बिना शारीरिक संबंध स्थापित करता हो, उसके 2 साल का करावास और जुर्माना भी हो सकता है।
  • लोक सेवक द्वारा अपने अधिकारों का दुरूपयोग करके, नारी निकेतनों, बाल संरक्षरण गृहों एवं कारावास, अस्पताल या प्रबंधक और कर्मचारियों द्वारा उनके संरक्षण में जो महिलाएॅं हो उनके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता हो, ऐसे सभी अपराधों में 5 साल तक की सजा और जुर्माना दोनो भी हो सकते हैं।

बलात्कार में शोषित महिला कौन-कौन सी सावधनी बरतेंः-
1. अपने सगे सम्बन्धियों या दोस्तों को खबर करें।
2. तक तक स्नान न करें तब तक डॉक्टरी जॉंच व प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज न हो जाए।
3. कपड़े न धोयें क्योंकि वह कपड़े जॉंच का आधार है।
4. प्रथम सूचना रिपोर्ट कराएॅं।
प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाते समय ध्यान देने योग्य बातेंः-
1. घटना की तारीख
2. घटना का समय
3. घटना का स्थान अवश्य लिखाएॅं
रिपोर्ट लिखाने के बाद उसका एक कॉंपी अवश्य लें जो थाने द्वारा मुफ्त में दी जाती है।
पुलिस का कर्तव्य है कि वह पीड़ित महिला की डाक्टरी जॉंच पंजीकृत डांक्टर से या नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र में करवाकर डॉंक्टरी जॉंच की कॉंपी अवश्य लें।
बलात्कार के समय जो कपड़े पीड़ित महिला ने पहने हैं, डॉंक्टरी जॉंच के बाद पुलिस आपके सामने उन कपड़ों को सीलबंद करेगी, जिसकी रसीद अवश्य ले ले।
बलात्कार के मामले की सुनवाई की प्रक्रियाः-
बलात्कार के मामले की सुनवाई एक बंद कमरे में होती है। इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति को वहॉं उपस्थित रहने की अनुमति नही होती है। अगर पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखने से मना कर दे तो आप निम्न जगहों पर शिकायत कर सकते हैं।
1. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या
2. मजिस्ट्रेट
घटना की शिकायत विवरण निम्नलिखित जगहों पर लिखकर भेज सकते हैंः-
1.कलेक्टर
2. स्थानीय या राष्ट्रीय समाचार पत्रों में
3. अध्यक्ष राज्य महिला आयोग, एच.आई.जी.-10 कविता नगर अनमोल फ्लैट्स के पास अवंती बिहार रायपुर (छ.ग.) फोनः- 0771-4023996, 4013196
4.राष्ट्रीय महिला आयोग-4, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली-110001

भरण-पोषण महिलाओं के भरण-पोषण संबंधी पति से अधिकार

  • महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-125 के तहत अपने पति से भरण-पोशण प्राप्त करने की हकदार है।
  • भरण-पोषण के लिए महिला सक्षम न्यायालय में साधारण आवेदन देकर अपनी पति के विरूद्ध भरण-पोशण की मांग कर सकती है।
  • न्यायालय की यह जिम्मेदारी है कि वह भरण-पोषण संबंधी आवेदन को जल्द से जल्द तय करे। भरण-पोषण से संबंधित आवेदन को तय करते समय न्यायालय साधारण जांच करेगी न कि कानूनी दांव-पेंच में पड़ेगी। इस प्रकार के आवेदन का फैसला जल्द से जल्द किया जाएगा। न्यायालय जो भी उचित समझे, उतना भरण-पोषण देने का आदेश पारित कर सकता है।
  • न्यायालय भरण-पोषण के आवेदन के तय होने के बीच में अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश पारित कर सकता है।
  • भरण-पोषण को तय करते समय पति के वेतन, आर्थिक स्थिति तथा पत्नी के रहन-सहन के खर्चों को नजर में रखकर दिया जाएगा।

निम्नलिखित दशाओं में महिलाओं को भरण-पोषण नहीं दिया जाएगा -
1- जो जारता (महिला का किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहना) की दशा में रह रही हो।
2- जो अपनी मर्जी से, बिना किसी उचित कारण के पति से अलग रह रही हो।
3- जिसने दोबारा शादी कर ली हो।
4- पारस्परिक सहमति से अगर दोनों अलग-अलग रह रहें हो।
  • यह अधिकार दण्ड न्यायालय या फिर सिविल विधि के अंतर्गत सिविल न्यायालय से लागू कराया जा सकता है।
  • हिन्दू महिलाएं, धारा-24 हिंदू विवाह अधिनियम में भरण-पोषण प्राप्त कर सकती हैं या तलाक में मुकदमें के दौरान महिला इस अधिनियम के तहत भरण-पोषण प्राप्त कर सकती है।
  • धारा-25 हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत तलाक होने पर कोई भी महिला स्थायी भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए न्यायालय में आवेदन पत्र प्रस्तुत कर सकती है।
  • मुस्लिम विवाहित महिला के भरण-पोषण की अवधि इद्दत तक सीमित रखी गई है। इद्दत का अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी गर्भवती तो नहीं है, अगर वह गर्भवती है तो भरण-पोषण बच्चे के पैदा होने तक मिलता है।
  • मुस्लिम तलाकशुदा महिला भरण-पोषण के लिए अपने मां-बाप, बच्चे या फिर रिश्तेदार जो उसके जायदाद के वारिस होंगे, वक्फ बोर्ड से भरण-पोषण की मांग कर सकती है।
  • मुस्लिम महिला, धारा-125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण-पोषण का लाभ तभी उठा सकती है, जब वह अपने निकाहनामें में यह लिखे कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-125 के अंतर्गत अर्जी देने से तलाकशुदा औरत अपने शौहर से भरण-पोषण ले सकती है। इससे महिला को भरण-पोषण अन्य महिलाओं की तरह असीमित अवधि तक अपने पति से मिल  सकता है।

भरण-पोषण प्राप्त करने हेतु आवेदन पत्र कहां प्रस्तुत करें ?
  • भरण-पोषण प्राप्त करने हेतु कोई भी महिला एक साधारण प्रार्थना पत्र जिले के सक्षम मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर अपने पति से भरण-पोषण की मांग कर सकती है, जिस जिले में वह निवास करती है।
  • भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए कोई भी विवाहित महिला उस जिले के न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष भी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकती है, जिस जिले में उसका पति निवास करता हो।
  • भरण-पोषण के लिए उस स्थान पर भी प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकता है, जिस स्थान पर दोनों पति-पत्नी अंतिम बार एक साथ रहे हों।

साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 

Wednesday, 28 September 2016

दहेज निवारण कानून

भूमिका -
दहेज प्रथा भारतीय समाज में कोढ़ में खाज का काम कर रही है। दहेज के कारण बेटी का जन्म लेना मां-बाप के लिए अभिशाप बन जाता है। जहां बेटे के जन्म पर खुशियां मनाई जाती है वहीं बेटी के जन्म पर मातम। मां-बाप की लाचारी को देखकर हजारों लड़कियां आत्महत्या कर लेती है। दहेज में अच्छी खासी रकम नहीं मिलने पर वर पक्ष वधुओं को कष्ट देते हैं। दहेज के कारण वधुओं के द्वारा आत्महत्या की खबरें अक्सर समाचार पत्र एवं टी.वी. न्यूजन चैनल पर देखने को मिलती है।
’’यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते। रमन्ते तत्र देवता’’
इस उक्ति में विश्वास करने वाले समाज में नारियों को जलाना केवल अपराध ही नहीं बल्कि महापाप है। दहेज प्रथा का उन्मूलन केवल कानून से संभव नहीं है, इसके लिए सामाजिक चेतना की जरूरत है। इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए 1961 में दहेज प्रतिशेध अधिनियम पारित किया गया, जिसमें दहेज लेना, दहेज देना या दहेज मांगने के लिए अभिप्रेरित करना आदि को अपराध के घेरे में लेकर अपराधियों को सजा दिलाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन इस अधिनियम का कोई कारगर असर नहीं हुआ। समय-समय पर इसमें संशोधन करके इस प्रथा पर कठोर नियंत्रण लाने की चेष्टा की गई। क्रिमिनल लॉ (द्वितीय संशोधन) अधिनियम 1983 जो 25 सितम्बर, 1983 को प्रभावी हुआ, के द्वारा- पति और उसके संबंधियों को सजा देने की
व्यवस्था की गई, जिन्हें स्त्री के साथ क्रूरता के व्यवहार का दोषी पाया गया। वर्ष 1984 में दहेज प्रतिषेध (वर-वधू को दिए गए उपहारों की सूची का रखरखाव) नियम 1984 पारित करके उपहार के नाम पर दहेज लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का प्रयास किया गया। पुनः वर्ष 1986 में दहेज प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 द्वारा दहेज मृत्यु को परिभाषित करके उसके लिए कड़ी सजा की व्यवस्था की गई। दहेज मृत्यु कारित न करने का साक्ष्य अधिभार भी अभियुक्त पर रखे जाने का प्रावधान किया गया।
दहेज क्या है ?
दहेज को परिभाषित करते हुए दहेज प्रतिषेध अधिनियम में कहा गया है कि वह विवाह के लिए विवाह के पहले या बाद में या विवाह के समय एक पक्ष के द्वारा या उसके किसी संबंधी द्वारा दूसरे पक्ष को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुछ मूल्यवान् प्रतिभूति या संपत्ति दी जाती है, वह दहेज कहलाता है। लेकिन मुस्लिम कानून (शरियत) के अंतर्गत ही मेहर दिया जाता है, वह इस परिभाषा में नहीं आता है। ऐसा कोई उपहार जो कि विवाह करने के एवज में नहीं दिया जाता, वह दहेज के अंतर्गत नहीं आता है। मूल्यवान् प्रतिभूति का अर्थ ऐसे दस्तावेज से है, जिसके द्वारा कोई कानूनी अधिकार सृजित, विस्तृत, अंतरित, निर्बन्धित किया जाए या छोड़ा जाए या जिसके द्वारा कोई व्यक्ति यह भी स्वीकार करता हो कि वह कानूनी दायित्व के अंतर्गत है या नहीं।
दहेज अपराध के लिए दण्ड की व्यवस्था -
दहेज लेना या देना या दहेज की मांग करना दंडनीय अपराध है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम में इसे गैर-जमानतीय एवं संज्ञेय आपरध माना गया है, दहेज देने या लेने संबंधी कोई भी करार अवैध माना जाता है। उन व्यक्तियों के लिए भी सजा का प्रावधान किया गया है, जो दहेज जैसे अपराध को अभिप्रेरित करते है। 2 अक्टूबर, 1984 से लागू नियमावली के अनुसार विवाह के अवसर पर वर-वधू को दिए जाने वाले उपहारों की सूची, देने वालों के नाम एवं वर-वधू से उसका संबंधी एवं सूची वर-वधू के हस्ताक्षर व अंगूठे का निशान के साथ रखने की कानूनी अनिवार्यता बतायी गई है।
इस अधिनियम की धारा 8 में दहेज के अपराध को संज्ञेय बताते हुए पुलिस को इसकी जांच करने का पूरा अधिकार है, किंतु पुलिस किसी मजिस्ट्रेट के आदेश या वारंट के बिना इस अपराध में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं कर सकती है। दहेज कानून की धारा-3 के अनुसार दहेज लेने या देने या लेन-देन को अभिप्रेत करने वाले व्यक्ति के लिए कारावास एवं 15,000/- या दहेज की धनराशि जो भी अधिक हो, द्वारा दंडित किया जाता है। दहेज संबंधी अपराध के लिए कम से कम 5 वर्ष के कारावास का प्रावधान है।
यदि कोई व्यक्ति सीधे या परोक्ष रूप से वर या वधू के माता-पिता या संरक्षक या अन्य संबंधियों से दहेज की मांग करता है तो उसे 2 वर्ष तक के कारावास एवं 10,000/- रूपये जुर्माने के साथ दंडित किया जा सकता है। ऐसे अपराध में कम से कम 6 माह के कारावास की सजा का प्रावधान है। दहेज प्रतिषेध (संशोधन) अधिनियम 1986 द्वारा मूल अधिनियम में 4-क जोड़कर किसी समाचार पत्र, पत्रिका या किसी अन्य माध्यम से किसी भी व्यक्ति द्वारा ऐसे विज्ञापन देने पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिसके द्वारा वह अपने पुत्र या पुत्री या किसी अन्य संबंधी के विवाह के बदल में प्रतिबंध है। इसका पालन नहीं करने पर हक कायम करने का प्रस्ताव करता है। इस तरह के विज्ञापन छपवाने तथा प्रकाशित करने या बांटने पर इस अधिनियम की धारा-6 में व्यवस्था है
कि स्त्री (वधू) के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति दहेज लेता है तो वह विवाह की तिथि से 3 माह के अंदर या यदि विवाह के समय वधू नाबालिग हो तो उसके 18 वर्ष की आयु प्राप्त होने के एक वर्ष के अंदर दहेज की राशि उसको ट्रांसफर कर देगा तथा जब तक दहेज उसके पास है, वह वधू के लाभ के लिए ट्रस्टी के रूप में रखेगा।
यदि संपत्ति की अधिकारिणी स्त्री की मृत्यु ट्रांसफर से पहले हो जाती है तो संपत्ति पर उसके कानूनी उत्तराधिकारियों का हक होगा। यदि ऐसी स्त्री की मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर असामान्य परिस्थिति में हो जाए और उसके कोई बच्चे न हो तो उस संपत्ति का मालिक उसके माता-पिता होंगे।
इन प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले को दो वर्ष तक का कारावास एवं 10,000/- रू. जुर्माने की सजा हो सकती है। यह सजा कम से कम 6 माह एवं जुर्माना 50,000/- रू. है।
निर्धारित समय सीमा में वधू या उसके उत्तराधिकारी या उसके माता-पिता की संपत्ति ट्रांसफर नहीं करने वाले व्यक्ति को केवल सजा ही नहीं होती, बल्कि उनसे संपत्ति के समतुल्य धनराशि भी वसूल की जाती है।
न्यायालय द्वारा संज्ञान -
क.- इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराधों की सुनवाई का अधिकार मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट/प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के नीचे के किसी भी अधिकारी के पास नहीं होता है।
ख.- इन अपराधों में न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान स्वयं की जानकारी, पुलिस रिपोर्ट, अपराध से पीड़ित व्यक्ति या उसके माता-पिता या अन्य संबंधितों के परिवार या किसी मान्यता प्राप्त सामाजिक संगठन/संस्था के परिवाद पर लिया जा सकता है।
ग.- सुनवाई करने वाले मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट/प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों में उस सीमा तक दंड देने के लिए शक्ति प्रदान की गई है, जो विभिन्न अपराधों के लिए इस अधिनियम में निर्धारित है, चाहे ये शक्तियां दं.प्रसं0 में प्रदत्त शक्तियों से अधिक क्यों न हो ? इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों के विषय में संज्ञान लेने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है। महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि दहेज संबंधी अपराध से पीड़ित व्यक्ति को उसके द्वारा दिए गए किसी बयान के आधार पर अभियोजित नहीं किया जा सकता है।
साक्ष्य का भार -
प्रायः आपराधिक मामलों में किसी अभियुक्त पर दोष सिद्ध करने का भार अभियोजन पक्ष पर होता है, लेकिन इस अधिनियम की धारा-3 एवं धारा-4 के तहत दहेज संबंधी मामलों में अपराध नहीं किए जाने का सबूत पेश करने का भार अभियुक्त पर होता है।
वधू को प्राप्त उपहार -
वधू को विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के बाद जो उपहार माता-पिता के पक्ष से या ससुराल पक्ष से मिलता है, उसे स्त्री धन कहा जाता है। वधू स्त्री धन की पूरी तरह से मालकिन या स्वामिनी होती है।
दहेज के लिए वधू के साथ दुर्व्यवहार के लिए दंड -
दहेज प्रतिषेध अधिनियम में वधू के साथ क्रूरता या उत्पीड़न के व्यवहार के लिए कठोर दंड की व्यवस्था है।
क्रूरता के लिए पति के साथ उसके संबंधियों को भी दंडित करने का प्रावधान है, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 498-क में जोड़ी गई है। धारा 498-क यदि किसी स्त्री के पास उस/उन्हें पति या पति के रिश्तेदार उसके साथ क्रूरता का व्यवहार करता है तो तीन साल तक कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जाएगा।
क्रूरता की परिभाषा इस प्रकार है -
क.- जान-बूझकर कोई ऐसा व्यवहार करना, जिससे वह स्त्री का आत्महत्या के लिए प्रेरित करना हो या उस स्त्री के जीवन अंग या स्वास्थ्य को गंभीर क्षति या खतरा पैदा हो।
ख.- किसी स्त्री को इस दृष्टि से तंग करना कि उसको या उसके किसी रिश्तेदार को कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति देने के लिए बाध्य किया जाए या किसी स्त्री को इस कारण तंग करना कि उसका कोई रिश्तेदार ऐसी मांग पूरी न कर पाया हो।
भारतीय दंड संहिता में संशोधन करके एक नई धारा 304-ख जोड़ा गया है, जिसमें ’’दहेज मृत्यु’’ को परिभाषित किया गया है।
धारा 304-ख दहेज मृत्यु -
1- यदि किसी स्त्री की मृत्यु किसी दाह या शारीरिक क्षति के कारण होती है या उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर असामान्य परिस्थितियां होती है और यह प्रदर्शित होता है कि उसकी मृत्यु के कुछ समय पहले उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार ने दहेज की मांग के लिए उसके साथ क्रूरता का व्यवहार किया है तो ऐसी मृत्यु को दहेज कारित मृत्यु कहा जाता है।
2- दहेज मृत्यु कारित करने वाले व्यक्ति को सात साल से आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1972 धारा-133-क एवं ख जोड़कर एक शक्ति दी गई है कि विवाह के 7 वर्ष के भीतर किसी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने या दहेज मृत्यु के मामलों में अभियुक्त के विरूद्ध अपराध करने की अवधारणा कर सके जब तक कि अन्यथा सिद्ध न हो।
धारा-113 क-
यदि कोई स्त्री विवाह के 7 वर्ष के भीतर आत्महत्या करती है तो न्यायालय मामले की सभी अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह अवधारणा करता है कि ऐसी आत्महत्या उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार द्वारा दुश्प्रेरित की गई है।
धारा-113 ख-
जब किसी व्यक्ति ने अपनी स्त्री की दहेज मृत्यु कारित की है और दर्शित किया जाता है कि मृत्यु के कुछ पहले ऐसे व्यक्ति दहेज की किसी मांग के लिए या उसके संबंध में उस स्त्री के साथ क्रूरता की थी तो न्यायालय के द्वारा यह अवधारणा की जाती है कि उस व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की है।
इस तरह कानून में संशोधन करके दहेज अपराध के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की गई है। अतः दहेज प्रथा के उन्मूलन के लिए बनाए गए कानून का उपयोग करने की आवश्यकता है।

साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 

छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005 संक्षिप्‍त जानकारी

यह जानकारी सभी को है कि छत्तीसगढ़ राज्य के अन्तर्गत पुराने समय से ही जादू-टोना जैसी कुरीतियॉं एवं अंधविश्वास व्याप्त है। केवल इतना ही नहीं बल्कि महिलाओं को टोनही के नाम से कलंकित एवं प्रताड़ित भी किया रहा है और समाज में ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण मान्यता के कारण ही अत्याचार, कलह एवं हिंसा का वातावरण बना रहता है। जादू-टोना के भय के कारण समाज अविकसित, शोषित और दमित होकर रह गया है। टोनही के नाम पर छत्तीसगढ़ में हत्याएं हो रही है। इसी तारतम्य में माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के द्वारा एक रिट याचिका में सकारात्मक अभिमत प्रकट करते हुए उच्च न्यायालय ने विधायिका को उसके निवारण के लिए कानून बनाने के निर्देश दिये थे जिसके परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ राज्य की विधायिका ने छत्तीसगढ़ टोनही प्रताडना अधिनियम 2005 के नाम से इस अधिनियम का निर्माण किया जिससे समाज में स्वस्थ मानसिकता कायम हो सके और टोनही के नाम से उपेक्षित एवं प्रताड़ित व्यक्तियों को विधिक सुरक्षा प्रदान की जा सके। संक्षेप में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम 2005 की संक्षिप्त जानकारी निम्नानुसार है:-
1. इस अधिनियम के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को टोनही के रूप में पहचान, अपने किसी भी कार्य, शब्दों, भाव भंगिमा या व्यवहार से नहीं कर सकेगा, जिससे ऐसे किसी भी व्यक्ति को कोई क्षति पहुंचने की आशंका हो अथवा उसकी सुरक्षा एवं सम्मान में कोई विपरीत प्रभाव पड़े क्योंकि ऐसा करना अपराध है।
2. छततसीगढ़ राज्य में अब किसी व्यक्ति को टोनही के रूप में पहचान करके किसी प्रकार से शारीरिक अथवा मानसिक रूप से प्रताड़ित नही किया जा सकेगा या नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकेगा। क्योंकि ऐसा करना अपराध है।
3. जो कोई किसी व्यक्ति को टोनही के रूप में पहचान किए गये या टोनही द्वारा प्रभावित किये गये व्यक्ति, पशु या जीवित वस्तु पर ओझा के रूप में झाड़फूॅंक या तंत्र-मंत्र का उपयोग करके उपचार पर नियंत्रण करने का दावा करता हो तो वह भी एक अपराध है।
4. छततीसगढ़ राज्य में कोई व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि वह किसी प्रकार से काला जादू, बुरी नजर या किसी अन्य रीति से किसी व्यक्ति, पशु अथवा जीवित वस्तुओं को क्षति पहुंचाने की शक्ति रखता है। यदि कोई ऐसा करता है तो वह इस अधिनियम के अनुसार अपराध किया है, यह माना जायेगा।
5. कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को टोनही के रूप में पहचान करता है, या टोनही कहकर प्रताड़ित करता है या प्रभावित व्यक्ति को झाड़-फूॅंक कर उपचार करता है या उपचार करने का दावा करता है, या किसी व्यक्ति को टोनही होने का दावा करता है या इनमें से कोई भी कार्य करता है या कार्य करने का प्रयास करता है तो उस व्यक्ति को कारावास की सजा और जुर्माना से दण्डित किया जा सकता है।
6. जिस न्यायालय में इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को कारावास की सजा के साथ-साथ जुर्माना होता है तो न्यायालय जुर्मानो की पूरी राशि या उसका कोई अंश व्यथित (परिवादी) व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के रूप में दिला सकती है।
साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 

Tuesday, 27 September 2016

घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम 2005

यह अधिनियम महिलाओं के संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया है। इस अधिनियम के पारित करने का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाना व उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है।
घरेलू हिंसा क्या है?
इस अधिनियम के अनुसार घरेलू हिंसा सम्बन्ध-प्रतिवादी के किसी कार्य, लोप या आचरण से है जिससे व्यथित व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन या किसी अंग को हानि या नुकसान हो। इसमें शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न, लैगिंक, शोषण, मौखिक और भावनात्मक शोषण व आर्थिक उत्पीड़न शामिल है। व्यथित व्यक्ति और उसके किसी सम्बन्धी को दहेज, या किसी अन्य सम्पत्ति की मॉंग के लिए हानि या नुकसान पहुॅंचाना भी इसके अंतर्गत आता है।
शारीरिक उत्पीड़न - का अर्थ है ऐसा कार्य जिससे व्यथित व्यक्ति को शारीरिक हानि, दर्द हो या उसके जीवन स्वास्थ्य एवं अंग को खतरा हो।
से तात्पर्य है महिला को अपमानित करना, हीन समझना, उसकी गरिमा को ठेस पहुॅंचाना आदि।
मौखिक और भावनात्मक उत्पीड़न - महिला को अपमानित करना, बच्चा न होने, व लड़का पैदा न होने पर ताने मारना आदि और महिला के किसी सम्बन्धी को मारने पीटने की धमकी देना।
आर्थिक उत्पीड़न - का मतलब है महिला को किसी आर्थिक एवं वित्तीय साधन जिसकी वह हकदार है, उससे वंचित करना, स्त्रीधन व कोई भी सम्पत्ति जिसकी वह अकेली अथवा किसी अन्य व्यक्ति के साथ हकदार हो, आदि को महिला को न देना या उस सम्पत्ति को उसकी सहमति के बिना बेच देना आदि आर्थिक उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं।
उपरोक्त सभी कृत्यों को घरेलू हिंसा माना गया है।
इस अधिनियम के अंतर्गत केवल पत्नी ही नही बल्कि बहन, विधवा, मॉं अथवा परिवार के किसी भी सदस्य पर शारीरिक, मानसिक, लैगिंक, भावनात्मक एवं आर्थिक उत्पनीड़न को घरेलू हिंसा माना गया है।
इस अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित परिभाषाएं भी दी गयी है-
पीड़ित व्यक्ति - ऐसी कोई महिला जिसका प्रतिवादी से पारिवारिक सम्बन्ध हो या रह चुका हो और जिसको किसी प्रकार की घरेलू हिंसा से प्रताड़ित किया जाता हो।
घरेलू हिंसा की रिपोर्ट - इसका अर्थ है वह रिपोर्ट जो पीड़ित व्यक्ति द्वारा घरेलू हिंसा की सूचना देने पर एक विहित प्रारूप में तैयार की जाती है।
घरेलू सम्बन्ध - दो व्यक्ति जो साथ रहते हों या कभी गृहस्थी में एक साथ रहे हों या सम्बन्ध सगोत्रता, विवाह या गोद लिए जाने के द्वारा या परिवार के सदस्यों का संयुक्त परिवार में रहने से हो सकता है, उसको घरेलू हिंसा कहते हैं।
गृहस्थी में हिस्सा - इसका अर्थ है जहॉं पर व्यथित व्यक्ति घरेलू सम्बन्ध के द्वारा अकेले या प्रतिवादी के साथ रहता है या रहता था। इसके अंतर्गत वह घर जो कि संयुक्त रूप से व्यथित व्यक्ति या प्रतिवादी का हो या किराए पर हो, या दोनो का या किसी एक पक्ष का उसमें कोई अधिकार, हक, हित, और ऐसा घर जो प्रतिवादी के संयुक्त परिवार का हो, चाहे उसमें प्रतिवादी और व्यथित व्यक्ति का कोई अधिकार, हक, हित हो या न हो।
संरक्षण अधिकारी - इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार हर जिले में एक या जितने वह उचित समझे संरक्षण अधिकारी नियुक्त करेगी, जो इस अधिनियम के अनुसार कर्तव्यों का पालन करेगा। जहॉं तक हो सके वह अधिकारी महिला होनी चाहिए।
सेवा प्रदान करने वाली सस्थाएं (सर्विस प्रोवाइडर) - इस अधिनियम के अंतर्गत स्वैच्छिक संस्थाएं जो सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) अधिनियम, या कम्पनीज अधिनियम अथवा किसी अन्य अधिनियम के अंतर्गत रजिस्टर्ड हों, और जिनका उद्देश्य महिलाओं के अधिकार, उनके हित की रक्षा करना होगा तभी वह इस अधिनियम के अंतर्गत सेवा सुविधा उपलब्ध कराने योग्य समझे जाएंगे।
शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया - घरेलू हिंसा का शिकार हो रही महिला या संरक्षण अधिकारी या जो व्यक्ति इस प्रकार की गतिविधियों को देख रहा है, मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज करा सकता है।
- आवेदन पत्र मिलने के बाद मजिस्ट्रेट द्वारा सुनवाई की तारीख घोषित की जायेगी जो आवेदन पत्र मिलने के तीन दिन के भीतर हो सकती है।
- प्रार्थना पत्र का फैसला मजिस्ट्रेट द्वारा 60 दिन के अंदर कर दिया जायेगा। मजिस्ट्रेट सुनवाई की तारीख संरक्षण अधिकारी को देगा।
- इसके बाद संरक्षण अधिकारी प्रतिवादियों को सुनवाई की तारीख की सूचना दो दिनों के अंदर या मजिस्ट्रेट के आदेशानुसार देगा।
- ऐसे मामलों की सुनवाई इन कैमरा (बन्द न्यायालय) में भी की जायेगी।
अधिनियम के अंतर्गत दिए जाने वाले आदेश-
1. संरक्षण से संबंन्धित आदेश
अगर मजिस्ट्रेट को यह लगता है कि किसी जगह हिंसा की घटना घटित हुई है तो वह प्रतिवादी पर निम्नलिखित प्रतिबन्ध लगा सकता है:-
- किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा की घटना करने से या उसमें मदद करने से।
- उस स्थान में प्रवेश करने से जिसमें व्यथित महिला निवास कर रही हो। और व्यथित व्यक्ति यदि कोई बच्चा है तो उसके स्कूल में प्रवेश करने से।
- व्यथित व्यक्ति से किसी भी प्रकार का सम्पर्क स्थापित करने जैसे बातचीत, पत्र या टेलीफोन आदि।
- प्रतिवादी को अपनी सम्पत्ति या संयुक्त सम्पत्ति को बेचने से और बैंक लॉंकर, खाते आदि जो संयुक्त या निजी हो उसके प्रयोग से भी रोका जा सकता है। महिला पर आश्रित उसके सम्बन्धियों व पीड़ित महिला की सहायता करने वाले व्यक्तियों के विरूद्ध किसी भी प्रकार की हिंसा करने से भी रोंका जा सकता है।
2. निवास स्थान संबंधी आदेश आवेदनपत्र मिलने पर यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि महिला घरेलू हिंसा का शिकार है तो प्रतिवादी के विरूद्ध निम्नलिखित आदेश पारित कर सकता है:-
- जिस घर में महिला निवास कर रही है प्रतिवादी उसे वहॉं से नहीं निकाले।
- प्रतिवादी और उसके किसी रिश्तेदार को महिला के निवास स्थान में घुसने से रोका जा सकता है।
- प्रतिवादी को उस घर को बेचने या किसी को देने से भी रोका जा सकता है।
- प्रतिवादी को पीड़ित महिला के लिए अलग से घर की व्यवस्था करने, उसका किराया देने आदि का भी आदेश दिया जा सकता है।
- पीड़ित व बच्चे की सुरक्षा के लिए मजिस्ट्रेट जो उचित समझे प्रतिवादी को आदेश दे सकता है।
- मजिस्ट्रेट प्रतिवादी को पीड़ित महिला का स्त्रीधन, अन्य सम्पत्ति वापस करने का आदेश भी दे सकता है।
3. अभिरक्षा संबंधी आदेश
मजिस्ट्रेट संरक्षण या अन्य राहत के लिए दिए गए आवेदन की सुनवाई के समय पीड़ित व्यक्ति को अपने बच्चों को अस्थाई रूप से अपने पास रखने का भी आदेश दे सकता है। प्रतिवादी को बच्चों से मिलने से भी रोका जा सकता है, यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि यह बच्चों के हित में नही है।
4. आर्थिक राहत
मजिस्ट्रेट ऐसे मामलों में आर्थिक राहत के आदेश भी दे सकता है जिससे व्यथित व्यक्ति अपना व अपने बच्चे का खर्च पूरा कर सके और ऐसी आर्थक राहत में कई चीजें सम्मिलित हो सकती है। जैसे:- 1- आय का नुकसान। 2- चिकित्सी य खर्च।
3- किसी सम्पत्ति जिस पर व्यथित व्यक्ति का नियंत्रण हो, उसका नुकसान, बर्बादी या उस सम्पत्ति से उसे निकाल देने का हर्जाना और, 4- भरण पोंषण के लिए आदेश।
ऐसी आर्थिक राहत मजिस्ट्रेट एक मुश्त या मासिक किस्त के रूप में देने का आदेश पारित कर सकता है।
5. मुआवजे से संबंधी आदेश-
मजिस्ट्रेट इस अधिनियम में दी गई राहत के अलावा प्रतिवादी को पीड़ित व्यक्ति को हुई मानसिक, भावनात्मक पीड़ा के लिए भी मुआवजे का आदेश दे सकता है।
6. सलाह और विशेषज्ञ की मद्द
मजिस्ट्रेट एक पक्ष के लिए या दोनो पक्षों के लिए सलाह के आदेश दे सकता है। सहायता के लिए किसी विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।
अन्य आदेश:-
  • मजिस्ट्रेट प्रतिवादी को उत्पीड़ित महिला को अर्थिक सहायता देने का आदेश दे सकता है।
  • यदि मजिस्ट्रेट को आवेदन पत्र मिलने पर यह लगता है कि महिला घरेलू हिंसा से पीड़ित है तो वह प्रतिवादी की अनुपस्थित में उसके विरूद्ध आदेश पारित कर सकता है।
  • मजिस्ट्रेट अंतरिम आदेश भी पारित कर सकता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत दिए गये आदेश की निःशुल्क कापी दोनो पक्षों, संबंधित पुलिस अधिकारी, सहायता प्रदान कराने वाले संगठन जो न्यायालय के क्षेत्राधिकार में हो, तथा घरेलू हिंसा के बारे में जानकारी देने वाले संगठन को दी जाएगी।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत मिलने वाली राहत के अलावा या इसके साथ पीड़ित महिला प्रतिवादी के विरूद्ध दीवानी न्यायालय, पारिवारिक या अपराधिक न्यायालय में भी वाद दायर कर सकती है।
  • राज्य सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत आश्रयगृह अधिसूचित करेगी।
  • पीड़ित महिला ऐसे आश्रय गृहों में भी आश्रय ले सकती है। ऐसे आश्रय गृहों के संचालकों का दायित्व है कि वह पीड़ित महिला को आश्रय दे।
  • पीड़ित महिलाओं को चिकित्सीय सुविधा का भी अधिकार है। प्रत्येक चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह उन्हें जरूरी चिकित्सीय सुविधा प्रदान करें।

संरक्षण अधिकारी के कर्तव्यः-
1- इस अधिनियम में दिये गये मजिस्ट्रेट के कार्यों को पूरा करने में उसकी मदद करें।
2- घरेलू हिंसा की शिकायत मिलने पर एक घरेलू घटना रिपोर्ट करे। संरक्षण अधिकारी यह रिपोर्ट मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी को देगा।
3- उत्पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण, 1987 के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सेवा उपलब्ध कराएगा।
4- उन सभी गैर सरकारी संस्थानों की सूची तैयार करेगा जो पीड़ित को निःशुल्क विधिक सेवा, निःशुल्क चिकित्सा सेवा तथा आश्रय गृह उपलब्ध कराते हैं।
5- पीड़ित व्यक्ति को सुरक्षित आश्रय गृह प्राप्त करवाना और जरूरत हो तो ऐसा करने की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन एवं मजिस्ट्रेट जिसके क्षेत्राधिकारी में ऐसा आश्रयगृह है उनको देगा।
6- पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सीय जॉंच करावाएगा और जॉंच रिपोर्ट पुलिस थाने में मजिस्ट्रेट को देगा।
सरकार के कर्तव्य:-
इस अधिनियम के अंतर्गत केन्द्रीय और राज्य सरकार के निम्नलिखित कर्तव्य है:-
1- अधिनियम के बारे में लोगों को जागरूक करना।
2- सम्बन्धित अधिकारियों को प्रशिक्षित करने की व्यवस्था करना।
3- विभिन्न विभागों जैसे विधि मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय व
संबंधित विभागों के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
4- उन सभी गैर सरकारी संस्थानों की सूची तैयार करेगा जो पीड़ित को निःशुल्क विधिक सेवा, निःशुल्क चिकित्सा सेवा तथा आश्रय गृह उपलब्ध कराते हैं।
सेवा प्रदान करने वाली संस्थाओं (सर्विस प्रोवाइडर) के कर्तव्य:-
- पीड़ित व्यक्ति के कहने पर घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट तैयार करना व उस क्षेत्र के संरक्षण अधिकारी व मजिस्ट्रेट को भेजना।
- पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सीय जॉंच करवाना व उसकी रिपोर्ट संरक्षण अधिकारी, व क्षेत्र के पुलिस स्टेशन में देना।
- पीड़ित व्यक्ति के कहने पर उसे आश्रयगृह में आश्रय प्रदान करवाना व ऐसे आश्रय गृहों की रिपोर्ट संम्बधित पुलिस स्टेशन में देना।
इस अधिनियम के अन्तर्गत जारी किये गये आदेशों की पूर्ति न करने पर निम्नलिखित दण्ड का प्रावधान है:-
ऐसे में प्रतिवादी को अधिकतम एक वर्ष की जेल अथवा 20,000 रू. का जुर्माना या दोनो हो सकते हैं।
भारतीय दण्ड संहिता 1860 की धारा 498-ए या दहेज निषेध अधिनियम 1961 के अंतर्गत आरोप लगाया जा सकता है।
संरक्षण अधिकारी द्वारा कर्तव्यों की पूर्ति न करने पर ऐसे संरक्षण अधिकारी को अधिकतम एक वर्ष की जेल या 20000 रूपये जुर्माना या दोनो हो सकते हैं।
शिकायत कहॉं दर्ज करा सकते है:-
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी या मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जिसके क्षेत्राधिकार में-
1- पीड़ित महिला जहॉ स्थायी या अस्थायी रूप से रह रही हो या व्यवसाय अथवा नौकरी करती हो। या
2- प्रतिवादी जहॉं रह रहा हो या व्यवसाय या नौकरी कर रहा हो। या 3- जहॉं पर विवाद का कारण उत्पन्न हुआ हो।
इस अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक मजिस्ट्रेट संरक्षण आदेश तथा अन्य आदेश भी पारित कर सकता है।
साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 
अधिवक्ता संजीव तिवारी संपर्क

Monday, 26 September 2016

महिलाओं के कानूनी अधिकार - 3

गिरफ्तारी:-
  • पुलिस अधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति को अपनी हिरासत में लेना गिरफ्तारी कहलाता हैः-
  • गिरफ्तारी के समय पुलिस को बताना होगा कि आपको क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है।
  • सिर्फ यह कहना आवश्यक नहीं कि आपके खिलाफ शिकायत प्राप्त हुई, पुलिस को आपका जुर्म भी बताना आवश्यक है।
  • गिरफ्तारी के समय जोर जबरदस्ती करना गैर कानूनी है।
  • थाने ले जाने के लिये किसी को हथकड़ी नही लगायी जा सकती।
  • कुछ अपराधों में आपको बिना वारंट भी गिरफ्तार किया जा सकता है।
  • वकील से कानूनी सलाह ले सकते हैं।
  • आपकी सुरक्षा के लिये आपके पहचान वालों या रिश्तेदारों को आपके साथ पुलिस वाले के साथ जाने का हक है।
  • गिरफ्तारी के बाद तुरंत पुलिस को मजिस्ट्रेट को गिरफ्तारी की रिपोर्ट देनी होगी।
  • गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर-अंदर मजिस्ट्रेट की कोर्ट में पेश करना जरूरी है।
  • बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में लेना गैर कानूनी है।

थाने में:-
  • पुलिस हिरासत में सताना, मारपीट करना या किसी अन्य तरह से यातना देना एक गंभीर अपराध है।
  • महिलाओं को केवल महिलाओं के कमरे में ही रखा जावेगा।

जमानत:-
  • पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के बाद:-
  • मामले के सुनवाई होने के दौरान हिरासत में लिये गये व्यक्ति को कुछ बातों के लिये मुचलका लेकर हिरासत से छोड़ा जा सकता है, इसे जमानत कहते हैं।
  • अपराध दो प्रकार के होते हैं- जमानतीय और गैर जमानती। जमानती अपराध में गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने का अधिकार पुलिस को होता है जबकि गैर जमानती में मजिस्ट्रेट को।
  • गिरफ्तार करते समय पुलिस को यह बताना होगा कि अपराध जमानती है या गैर जमानती।
  • जमानत के समय कोई पैसे नहीं दिये जाते। केवल जमानत प्रपत्र पर रकम लिख दी जाती है, जिसे मुचलका जमानतनामा कहा जाता है।
  • जमानती जुर्म में जमानत होने पर पुलिस को आपको तुरंत छोड़ना पड़ेगा।

पूछताछ:-
  • किसी अपराध के किये जाने की सूचना पर या उसकी आशंका होने पर पुलिस को यदि-
  • किसी को पूछताछ के लिये बुलाना हो, तो जॉंच करने वाले पुलिस अफसर को लिखित आदेश देने होंगे। 15 साल से कम उम्र के और किसी महिला को पुलिस पूछताछ के लिये थाने नहीं बुला सकती।

तलाशीः-
  • सिर्फ एक महिला पुलिस अफसर ही महिला के शरीर की तलाशी ले सकती है।
  • पुरूष पुलिस अधिकारी आपके मकान या दुकान की तलाशी ले सकते हैं।
  • तलाशी के लिये हमेशा किसी वारंट की जरूरत नही होती।
  • तलाशी होने से पहले तलाशी लेने वाले की भी तलाशी ली जा सकती है।
  • किसी भी तलाशी या बरामदी के वक्त आसपास रहने वाले किन्हीं दो निष्पक्ष और प्रतिष्ठित व्यक्ति का होना जरूरी है।
  • तलाशी का एक पंचनामा बनाना जरूरी है।

कोर्ट मेंः-
  • आपको वकील की सहायता लेने का अधिकार है।
  • गरीब होने पर आपको मुफ्त कानूनी सलाह मिलने का हक है।
  • अपराधों की रिपोर्टः-
  •  रिपोर्ट का मतलब है कि आप पुलिस को जाकर बतायें कि कोई अपराध किया गया है। इसे प्रथम सूचना रिपोर्ट या एफ.आई.आर. कहते हैं। यह रिपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण होती है।
  • रिपोर्ट कैसे लिखाई जाती है:-
  • रिपोर्ट मुंह जुबानी या लिखित हो सकती है।
  • मुंह जबानी रिपोर्ट लिखने के बाद पुलिस आपको पढ़कर सुनायेगी ताकि आप पुष्टि कर सकें कि रिपोर्ट सही लिखी गई है।
  • रिपोर्ट की एक प्रति पुलिस से आपको अवश्य ले लेना चाहिए।

साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 
 CHHATTISGARH STATE LEGAL SERVICES AUTHORITY 
 'सरल कानूनी शिक्षा ' पुस्तिका के अन्‍य आलेख

Saturday, 24 September 2016

महिलाओं के कानूनी अधिकार . 2

दण्ड प्रक्रिया (जाब्ता फौजदारी) संहिता
इस सहिता की धारा 125 में भरण-पोंषण (खर्चा-पानी) देने बावत् प्रावधान है। यह मुस्लिम महिला को छोड़कर दूसरों को प्राप्त हो सकेगा। मुस्लिम महिला को तलाक के बाद ईद्दत की अवधि तक यह अधिकार होगा। यह पत्नि, बच्चों के अलावा बूढ़े मॉं-बाप को भी प्राप्त हो सकता है, जो अपनी संतान (लड़का-लड़की) में से किसी से भी चाहे वह शादी-शुदा हों, यह प्राप्त कर सकते हैं।
बच्चों की अभिरक्षा:-
माता-पिता के जीवित न रहने पर या माता-पिता का तलाक हो जाने पर बच्चों का लालन व पालन किसके द्वारा होगा यह तय करने के लिये ‘‘गार्जियन एण्ड वार्ड्स एक्ट‘‘ के नाम से एक कानून बनाया गया है।
तलाक के बाद बच्चों का क्या होगा?:-
बच्चा अगर छोटा है तो मॉं का कानूनी अधिकार है कि सात वर्ष का होने तक बच्चा उसी के पास रहेगा। पॉंच साल की उम्र के बाद बच्चा किसके पास रहेगा इस बात का निर्णय अदालत बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुये लेगी।
बच्चे का हित अगर मॉं के पास रहने में हो तो बच्चा मां को दिया जायेगा। ऐसी स्थिति में बच्चा चाहे पिता के साथ न रहता हो तो भी पिता को उसका खर्चा वहन करना पड़ेगा।
न्यायालय नाबालिग बच्चों के शरीर व उसकी संपत्ति की सुरक्षा के लिये संरक्षक नियुक्ति कर सकती है जो न्यायालय के प्रति जबावदेह रहता है।
संपत्ति का अधिकार:-
 हर महिला को अपने लिये, अपने नाम से संपत्ति खरीदने और रखने का अधिकार है। कोई महिला संपत्ति को जो चाहे कर सकती है, चाहे वह संपत्ति उसे मिली हो या उसकी कमाई की हो।
 हर महिला को यह हक है कि अपनी कमाई के पैसे वह खुद ले वह उन पैसों से जो भी करना चाहे कर सकती है।
 महिलाओं को यह भी अधिकार है कि पुरूषों की तरह वे भी संपत्ति खरीदे या बेचे। महिलाओं को अपने माता-पिता या दूसरे रिश्तेदार की संपत्ति का हिस्सा भी मिल सकता है, यह उनके निजी कानून पर निर्भर करता है। निजी कानून का मतलब है, वह कानून जो किसी समुदाय पर लागू होता है। जैसे- हिन्दू कानून, मुस्लिम कानून, ईसाई कानून तथा पारसी कानून आदि।
हिन्दू स्त्रियों के संपत्ति का अधिकार:-
आपका हिस्सा आपका अपना है और आप अपनी ईच्छानुसार निपटारा कर सकती हैं। वर्ष 1956 के पहले के कानून में हिन्दू स्त्रियों को ऐसे संपत्ति का पूरा अधिकार नहीं था, उन्हें सिर्फ अपने परवरिश हेतु संपत्ति का इस्तेमाल करने का हक था। जिसे सीमित अधिकार कहा जाता था। परंतु वर्ष 1956 के बाद से महिलाओं का संपत्ति पर पूरा हक है।
 कोई महिला चाहे तो इसे बेच सकती है, चाहे तो किसी को दान या बख्शीश दे सकती है, या वसीयत में किसी के नाम छोड़ सकती है।
 लड़कियों को भी लड़कों की तरह पिता की संपत्ति के बराबर का अधिकार दिया जा चुका है।
 अगर विधवा दूसरी शादी कर ले, तो भी गुजरे हुये पति से मिली संपत्ति उसकी अपनी होगी।
 वर्ष 2005 के हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के द्वार महिलाओं को उनकी पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार प्रदान किया गया है।
पत्नी के खर्चे का अधिकार:-
पत्नी को पति से खर्चा लेने का अधिकार होता है। यदि पति पत्नि खर्चा न दे तो वह अदालत के जरिये पति से खर्चा ले सकती है। यह अधिकार हिन्दू दत्तक और भरण-पोंषण अधिनियम 1956 के अंतर्गत दिया गया है।
यदि पत्नी किसी ठोस कारण से पति से अलग रहती है तो भी वह पति से खर्चा मॉंग सकती है।
ऐसे निम्न कारण हो सकता हैः-
 पति ने उसे छोड़ दिया हो।
 पति के दुर्व्यवहार से डरकर पत्नी अलग रहने लगी हो।
 पति को कोढ़ हो।
 पति का कोई और जीवित पत्नी हो।
 पति का किसी दूसरी औरत से अनैतिक संबंध हो।
 पति ने धर्म बदल दिया हो।
किंतु अगर पत्नी व्याभिचारिणी हो या वह धर्म बदल ले तो वह खर्चा मांगने की हकदार नहीं रहती।
बच्चों, बूढे या दुर्बल माता-पिता का खर्चा पाने का अधिकार:-
हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोंषण अधिनियम 1956 तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत जायज और नाजायज नाबालिग (18 साल से कम उम्र) बच्चों को माता पिता से खर्च मिलने का हक है। बूढ़े या शारीरिक रूप से दुर्बल मॉं-बाप को अपने बच्चे से (बेटे हो या बेटियॉं) खर्चा मिलने का हक है। यह खर्चा लेने का हक सिर्फ ऐसे लोगों को है जो अपनी कमाई या संपत्ति से अपना खर्च नही चला सकते।
विधवा को खर्च पाने का अधिकार:-
(हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोंषण अधिनियम 1956)
हिन्दू विधवा अपनी कमाई या संपत्ति से खर्च नही चला सकती हो तो उसे इन लोगों से खर्चा मिलने का हक हैः-
 पति की संपत्ति में से या अपने माता-पिता की संपत्ति से।
 अपने बेटे या बेटी से उनकी संपत्ति में से।
 इन लोगों से यदि खर्चा न मिले तो उसके ससुर को उसका खर्चा देना होगा।

साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 

Thursday, 22 September 2016

महिलाओं के कानूनी अधिकार - 1


  • 18 साल की उम्र के बाद लड़की बालिग हो जाती है, बालिग होने के बाद उसे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का हक मिल जाता है, कानूनी तौर पर कोई भी व्यक्ति किसी बालिग को उसकी इच्छा के विरूद्ध कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकता, यहॉं तक कि अभिभावक भी नहीं। बंद रखने, आगे पढ़ने से रोकने या जबरदस्ती शादी करने को मजबूर करने पर इसका विरोध कर सकती है, वह अदालत में इसके विरूद्ध लड़ाई लड़ सकती है। अगर हालत अनुकूल नहीं है तो परिवार से अलग रहने का फैसला ले सकती है।
  • पैत्रिक जायदाद में हिन्दू कानून के तहत लड़की और लड़के को बराबर का हक है।
  • जरूरी नहीं कि शादी के बाद आप अपना नाम या उपनाम बदले यदि आप चाहें तो विवाहपूर्व का नाम, उपनाम, विवाह के बाद भी जारी रख सकती है।
  • अपने वेतन/अपने कमाई पर आपका पूरा हक है, उसे अपनी इच्छानुसार खर्च कर सकती है।
  • आप केवल अपने नाम पर बैंक में खाता खोल सकती है, अनपढ़ महिलाएं भी अंगूठा लगाकर अपना खाता खोल सकती है।
  • आपको अपनी शादी के समय और बाद में माता-पिता से और ससुराल में मुंह दिखाई के तौर पर जो कुछ भी मिला है वह स्त्री धन है और उस पर आपका पूरा अधिकार है।
  •  पति के पास जो भी जायदाद है जैसे-खेती की जमीन या घर वगैरह, व पत्नी के या दोनों संयुक्त नाम पर भी रजिस्टर हो सकती है।
  • राशन कार्ड पत्नी या पति किसी के भी नाम पर बन सकता है, पति के नाम पर राशनकार्ड बनाना जरूरी नही है।
  • स्कूल में बच्चे का दाखिला कराते वक्त मां का नाम भी अभिभावक के रूप में देना आवश्यक है।
  • अगर आपको अनचाहा गर्भ ठहर जाये तो आप किसी भी सरकारी अस्पताल में जाकर गर्भपात करा सकती है, 1971 में बने गर्भपात कानून के तहत् कोई भी गैर शादी-शुदा औरत गर्भपात करवा सकती है, गर्भपात कराना औरत का निजी फैसला है, जिसके लिये उसे किसी की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है।
  • अगर किन्ही कारणों से आपके और आपके पति के बीच कोई मतभेद या विवाद चल रहा है तो भी पति आपको घर से बेदखल नहीं कर सकता। शादी के बाद घर पर आपका भी उतना ही हक है जितना आपके पति का।
  • मॉं-पिता का तलाक हो जाने के बाद भी बच्चे का अपने पिता की जायदाद में हक खत्म नहीं होता।
  • कानूनी तौर पर बच्चों का असली पालक पिता होता है, मां केवल उनकी देखभाल के लिये है, अगर पिता बच्चों को नहीं देख रहा है तो मॉं अदालत में मुकदमा दायर करके अपने बच्चों की मॉंग कर सकती है।
  • कई बार औरत को आदमी छोंड़ देता है, परेशान करता है और खर्चा भी नही देता। जिससे वह और उसके नाबालिक बच्चे एक बेसहारा और मोहताज जिंदगी जीने पर मजबूर हो जाते हैं, ऐसे में कानूनन धारा 125 सी.आर.पी.सी. के तहत आपको अपने पति से गुजारा खर्चा पाने का पूरा हक है।
  • 1976 में बने ‘‘समान वेतन कानून‘‘ के तहत स्त्री-पुरूष दोनो को समान कार्य के लिये समान वेतन देने की व्यवस्था की गई है। यह कानून खेत मजदूरों और दूसरे सभी उद्योगों पर लागू होता है, इस कानून के तहत कुछ उद्योगों जैसे- खदानों, फैक्ट्रियों वगैरह में औरतों को रात पाली (नाइट शिफ्ट) में काम कराना मना है, पर इसके अलावा किसी तरह के काम देने में मालिक औरत होने के नाते भेदभाव नहीं कर सकता।
  • यदि आपका यौन शोषण हुआ है। तो भय-संकोच या शर्म के कारण आपकी खामोशी अराजक तत्वों के हौसलें और बुलंद कर सकती है, इसलिये आपको इस तरह की कोई घटना होने पर तुरंत उसकी एफ.आई.आर. थाने में दर्ज करानी चाहिए।
  • राजस्थान सरकार द्वारा 1987 में सती विरोधी अधिनियम लागू करने के बाद केन्द्रीय सरकार ने भी सती प्रथा की रोकथाम अधिनियम 1987 पास किया है, इस अधिनियम के तहत् सती बनाने वालों को हत्या के अपराध में गिरफ्तार कर कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान है,सती को महिमा मंडित करने के प्रयासों पर सात साल की सजा और 30,000/-रू. तक जुर्माने का प्रावधान है।
  • बलात्कार होने के 24 घंटे के भीतर मेडिकल परीक्षण करवा लेना चाहिए। घटना के समय पहने हुए कपड़े को धोये नहीं। डांक्टरी जॉंच के पहले नहायें नही। इससे सबूत मिट सकते है। यदि बलात्कार स्थल से प्राप्त कोई भी सामान, सिगरेट का टुकड़ा, चश्मा, रूमाल, घड़ी आदि पर अपना हाथ न लगायें उसे कपड़े से उठाकर पुलिस को दे दें।
  • घटनास्थल की स्थिति ज्यों की त्यों रहने दें। जब तक कि पुलिस जॉंच न हो जाये, क्योंकि वहॉं से वीर्य, खून के धब्बे, बलात्कार के बाल आदि पाये जाने की संभावना रहती है। यदि संभव हो तो बलात्कारी का हुलिया लिख लें। वह देखने में कैसा था, आवाज कैसे थी, कैसे कपड़े पहने थे, उसकी कोई खास आदत या वाक्यों आदि।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के प्रावधान के तहत् घरेलू हिंसा के विरूद्ध महिलाएॅं कड़ी कानूनी कार्यवाही करवा सकती है।
  • एफ.आई.आर. की एक प्रति निःशुल्क तौर पर आपको पाने का हक है, इसलिये एक प्रति अवश्य ले लें।

साभार - छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण 

Monday, 12 September 2016

छत्तीसगढ़ राज्य विरूद्ध मोह. कासिम व अनवर (धारा 399, 201/402 भादंसं)

न्यायालय:- द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, दुर्ग (छ0ग0) 
(पीठासीन अधिकारी - ऋ़षि कुमार बर्मन) 
सत्र प्रकरण क्रं0-63/2004 संस्थित दिनॉंक -19/03/2004 
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा - आरक्षी केन्द्र - पुरानी भिलाई, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़) --------अभियोजन 
// विरूद्ध // 
1- मोह. कासिम आत्मज मोह. फाजिल उम्र 46 साल पेशा- कन्सट्रक्शन, निवासी- बैजनाथपारा, अखाड़े के पास, थाना सिटी कोतवाली रायपुर, जिला रायपुर (छ0ग0) 
2- अनवर आत्मज शेख अमीर उम्र 46 साल पेशा- कूलर रिपेयरिंग फिटिंग का कार्य, निवासी- बैजनाथ पारा, रायपुर थाना सिटी कोतवाली जिला रायपुर (छ0ग0)- ---- अभियुक्तगण 
----------------------------------------- 
न्यायालयः- श्री रामकुमार तिवारी, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजि0, दुर्ग, जिला दुर्ग (छ0ग0) के दांडिक प्रकरण क्रं0-1822/2002, अपराध क्रं0-175/1994, धारा 399, 201/402 भा0दं0सं0 छ0ग0 राज्य विरूद्ध मोह. कासिम व अन्य 7 में पारित उपार्पण आदेश दिनॉंक 08/03/2004 से उत्पन्न सत्र प्रकरण। 
----------------------------------------- 
- निर्णय:- 
(आज दिनॉंक 25/09/2014 को घोषित किया गया ) 
1- अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर के विरूद्ध दिनांक 25-8-2004 को करीबन 16.35 बजे मुकाम कुम्हारी बस्ती बीरान झोपड़ा थाना पुरानी भिलाई जिला दुर्ग अन्तर्गत पांच व्यक्तियों के समूह में से अधिक व्यक्तियों का सदस्य होकर मनीष ठाकुर केडिया कम्पनी वाले के यहॉं डकैती करने के लिये योजना तथा तैयारी कर डकैती की पूर्व तैयारी करने एकत्रित हुये तथा डकैती करने की तैयारी करने हेतु धारा 399, 402 भा0द ं0सं0 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध घटित करने का आरोप है। 
2- इस प्रकरण में पूर्व में अभियुक्त शमीम अख्तर, फ्य्याज मोहम्मद, मोह. हामीद उर्फ पप्पू खान एवं राजू उर्फ राजकुमार के विरूद्ध दिनांक 3-2-2007 को निर्णय घोषित हो चुका है। चार अभियुक्तों के विरूद्ध विचारण शेष है, जिसमें दो अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर की उपस्थिति पर उनके विरूद्ध प्रकरण में विचारण पुनः किया गया है। 
3- अभियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि दिनांक 28-5-2004 को शाम करीब 4 बजे चौकी प्रभारी कुम्हारी को मुखबीर जरिये सूचना मिली कि कुम्हारी बस्ती के पास खदान के सामने एक वीरान झोपड़े में कुछ व्यक्ति बैठकर डकैती करने की योजना बना रहे हैं, उस सूचना पर रोजनामचा सान्हा क्रमांक 1036 पर दर्ज कर हमराह स्टाफ सहायक उप निरीक्षक एम.एस. ठाकुर, प्रधान आरक्षक 878, 39 एवं आरक्षक क्रमांक 184, 820, 1371 तथा साक्षी शंकर चौरासिया, इलियास के साथ सूचना प्राप्त घटना स्थल पर रवाना हुआ था और वहॉं पहुंचकर झोपड़े में झांककर वहॉं पर 8 व्यक्ति बैठे हुये थे, जिसमें एक मोटा व्यक्ति जिसने गुलाबी कमीज पहनी थी, उसने कहा कि अनवर तुम राजू, पप्पू खान, शमीम अख्तर, इलाउद्दीन एक साथ रहना तथा फैय्याज तथा सतीश एक साथ रहेंगे, तब अनवर ने मोटा व्यक्ति का नाम लेकर ठीक है, कासिम। सभी आठों व्यक्तियों के हाथ में तलवार तथा अन्य हथियार थे। आपस में वे बातचीत कर रहे थे। अनवर ने कहा मैं तथा फ्य्याज वह जगह देखकर आये हैं, वह आफिस केडिया कम्पनी के निकट में है, जिसकी देख रेख मनीष ठाकुर करता है, वहीं उनका पैसा रखा है, जब दो पार्टी बनाकर मारपीट कर लूट करेंगे तथा जो भी आदमी मिलेगा, उसे खत्म कर देंगे और उन्हें बचाने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं है। अभियुक्तों की बात सुनकर पुलिस के कर्मचारियों तथा साक्षियों ने झोपड़े को घेर लिये और पुलिस की आवाज सुनकर झोपड़े में बैठे हुये अभियुक्तगण भागने का प्रयास किये थे, तब उन्हें दौड़ाकर हथियार सहित पकड़ा गया, वहॉं पर तलाशी में अभियुक्त इलाउद्दीन, शमीम अख्तर, राजू उर्फ राजकुमार, अनवर, फैय्याज, मोह. कासिम के पास से एक-एक तलवार तथा पप्पू खान से एक कटार और सतीश ठाकुर के पास से एक फरसा गवाहों के समक्ष जप्त कर जप्ती पंचनामा बनाया गया और घटना स्थल पर तीन बड़े तलवार, दो छोटी तलवार, एक गुप्ती तथा चार हाकी स्टिक मिले, उनकी भी जप्ती बनाया गया तथा अभियुक्तों को गिरफ्तार कर अपराध की सम्पूर्ण विवेचना पश्चात् न्यायिक मजि. प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में अभियुक्तों के विरूद्ध अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया था। 
4- तात्कालीन न्यायिक मजि. प्रथम श्रेणी, दुर्ग के द्वारा प्रकरण माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दुर्ग के न्यायालय में उपार्पित किया गया था और वह सत्र प्रकरण क्रमांक 63/2004 पंजीबद्ध हुआ था, और वह प्रकरण माननीय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, दुर्ग के आदेशानुसार अंतरण पर प्राप्त हुआ है। 
5- अभियुक्तों के विरूद्ध न्यायालय ने धारा 399, 402 भा0द ं0सं0 का आरोप विरचित कर उन्हें पढकर सुनाये व समझाये जाने पर उन्होंने आरोप से इंकार कर विचारण चाहा था। 
 6- अभियुक्तों ने धारा 313 द.प्र.सं. के अन्तर्गत अपने परीक्षण में स्वयं को निर्दोष होना और झूठा फंसाये जाना व्यक्त किये हैं और उनकी ओर से प्रतिरक्षा में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। 
7- प्रकरण के निराकरण हेतु निम्न विचारणीय प्रश्न हैंः- 1- क्या घटना दिनांक 28-5-1994 को करीबन 16.35 बजे मुकाम कुम्हारी बस्ती के आगे विरान झोपड़ा में थाना पुरानी भिलाई अन्तर्गत 5 या अधिक व्यक्तियों की संख्या में अभियुक्तगण समूह बनाकर केडिया कम्पनी में डकैती डालने की योजना बनाकर तैयारी कर रहे थे ? 2- क्या अभियुक्तगण उक्त घटना दिनांक को डकैती डालने की योजना एवं तैयारी में भाग लिये थे ? 
विचारणीय प्रश्न क्रमांक 1 एवं 2 पर निष्कर्ष/आधार 
8- विचारणीय प्रश्न क्रमांक 1 एवं 2 के तथ्य एक दूसरे से जुड़े हुये है, साक्ष्य की पुनरावृत्ति न हो, इसलिये सुविधा की दृष्टि से एक साथ निराकरण किया जा रहा है। 
9- अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर के विरूद्ध अभियोजन की ओर से प्रकरण में अभियोजन घटना में घटना स्थल में अभियुक्तों से सम्पत्ति जप्ती व अभियुक्तों को गिरफ्तार करने से संबंधित दो साक्षियों इलियास तथा शंकर चौरसिया में से इलियास का प्रस्तुत किया गया है । इलियास (असा. 1) को पूर्व में भी दिनांक 8-12-2004 को हुये बयान में अभियुक्तों को जानने व पहचानने से इंकार करते हुये अभियुक्तों से किसी वस्तु की जप्ती से भी इंकार करते हुये पक्षद्रोही हो गया था और पक्षद्रोही होने के पश्चात् यह अभियोजन की ओर से प्रस्तुत सुसंगत तथा महत्वपूर्ण सुझावो ं को अस्वीकार किया था और दिनांक 8-9-2014 को पुनः अभियुक्त मोहकासिम एवं अनवर के विरूद्ध हुये बयान में भी उसने अभियुक्तों को नहीं जानता, पहचानना का कहते हुये उनसे किसी वस्तु की जप्ती नहीं की गई थी, कहते हुये अभियुक्तों से अभियोजन घटना अनुसार तलवार, हाकी स्टिक, कटार की जप्ती का समर्थन नहीं किया है, उसे जप्ती पत्रक प्रपी. 6, गिरफ्तारी पत्रक प्रपी. 11 पर अपने हस्ताक्षर को प्रमाणित किया है, लेकिन उन दस्तावेजों को कोरे अवस्था में हस्ताक्षर करना बताया है और इस साक्षी को अभियोजन द्वारा पक्षद्रोही घोषित कर सूचक प्रश्न पूछे जाने पर अभियोजन की घटना को सुसंगत व महत्वपूर्ण सुझावो को उसने स्वीकार नहीं किया है तथा अभियोजन घटना का कोई समर्थन उसकी साक्ष्य से नहीं हुआ हैॅ पूर्व में दूसरे  स्वतंत्र जप्ती तथा गिरफ्तारी साक्षी शंकर चौरसिया का दिनांक 17-12-2005 को हुये अपने बयान में अभियुक्तों को नही पहचानने, घटना की कोई जानकारी नहीं है, कहा था। सभवतः इसीलिये अभियोजन की ओर से अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवार के विरूद्ध इस साक्षी को आहुत नहीं किया गया है। 
10- स्वतंत्र साक्षी पुनीतराम पटेल ने भी दिनांक 24-2-2005 को हुये बयान में अभियुक्तों ने नहीं जानता, पहचानता कहते हुये पुलिस को बयान देने से भी इंकार किया है और अभियोजन घटना का समर्थन नहीं किया है। संभवतः इसीलिये अभियोजन की ओर से अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर के विरूद्ध आहुत नहीं किया गया है। 
11- प्रकरण में घटना के विवेचक तात्कालीन उप निरीक्षक एस.एनअख्तर (असा. 4) जिसका बयान दिनांक 22-9-2005 को हुआ था, उसने अपने साक्ष्य की कंडिका 2 में उसने तथा गवाहों ने झोपड़े को घेर कर झोपडे के अंदर बैठे अभियुक्तों से तलवार, लोहे का कटार सहित पकड़कर उनसे तलवार की जप्ती करना बताया है और उसने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 6 में स्वीकार किया है कि अभियुक्तगण जिस व्यक्ति का नाम ले रहे थे, उसी आधार पर उनका नाम लिखे गये हैं। आगे यह भी बताया है कि वह रिकार्ड देखकर ही बता सकता है। बिना रिकार्ड देखे अभियुक्तों का नाम भी नहीं बता सकता। अर्थात् यह साक्षी अभियुक्तों को चेहरे से नहीं पहचानता, केवल अभियुक्तों के विरूद्ध मामला बनाया है, उसे रिकार्ड देखकर ही अभियुक्तों का नाम बता सकता है। प्रकरण में उसने स्वतंत्र साक्षी इलियास और शंकर चौरसिया के समक्ष अभियुक्तों से तलवार, लोहे की कटार और घटना स्थल से तलवार और हाकी स्टिक वगैरह जप्त किया था, लेकिन उसका समर्थन दोनों ही स्वत ंत्र साक्षियों ने नहीं किये हैं। तात्कालीन प्रधान आरक्षक पोखन सिंह राजपूत इस प्रकरण में अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर के विरूद्ध साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है, लेकिन उसने अपने साक्ष्य में बताया है कि मुखबीर से जो सूचना मिली थी, उसे रोजनामचा सान्हा दिनांक 28-5-1994 में दर्ज किया था, मुख्य परीक्षण में ही बताया है कि चालन के साथ रोजनामचा सान्हा संलग्न नहीं है, अर्थात् मुखबीर से मिली सूचना संबंधी लिखे रोजनामचा सान्हा को प्रस्तुत कर प्रमाणित नहीं किया गया है। पूर्व में भी इस साक्षी के द्वारा दिनांक 22-9-2005 को दिये गये बयान ऐसा ही साक्ष्य दिया गया है। 
12- उपरोक्त परीक्षित साक्षियों के साक्ष्य से प्रकरण में अभियुक्तगण घटना तिथि को घटना स्थल पर मौजूद थे, यह प्रमाणित नहीं होता है। स्वतंत्र साक्षी इलियास, शंकर चौरसिया ने अभियुक्तों की उपस्थिति एवं उनकी पहचान को प्रमाणित नहीं किये हैं और अभियुक्तों से घटना स्थल पर जप्त किये गये तलवार एवं अन्य हथियारों की जप्ती करना भी प्रमाणित नहीं किये हैं। घटना की सूचना मुखबीर द्वारा जो मिली थी, उसे रोजनामचा सान्हा में लिखा गया था, लेकिन रोजनामचा सान्हा भी प्रमाणित नहीं किया गया है। घटना के विवेचक श्री एस.एनअख्तर के साक्ष्य का समर्थन स्वतंत्र साक्षी इलियास, शंकर चौरसिया ने नहीं किये हैं, जबकि अभियोजन घटना अनुसार उन दोनों साक्षियों को मुखबीर की सूचना बताकर उन्हें घटना स्थल पर ले जाया गया था, लेकिन उक्त साक्षी अभियोजन घटना के विवेचक एस.एन. अख्तर द्वारा दिये गये कथनों का समर्थन नहीं करते हैं, ऐसी स्थिति में घटना तिथि 28-5-1994 को अभियुक्तगण पांच या उससे अधिक व्यक्तियों का समूह बनाकर डकैती की योजना एवं तैयारी कर कुम्हारी बस्ती के आगे विरान झोपडे में एकत्रित हुये थे और डकैती के प्रयोजन में भाग लेने के आशय से एकत्रित हुये थे, यह प्रमाणित नहीं होता है। फलस्वरूप अभियोजन का मामला शंका से परे अभियुक्त मोह. कासिम एवं अनवर के विरूद्ध प्रमाणित नहीं होता है। फलस्वरूप विचारणीय प्रश्न क्रमांक 1 एवं 2 को प्रमाणित होना नहीं पाया जाता है । परिणामस्वरूप अभियुक्त मोहकासिम एवं अनवर को आरोपित अपराध धारा 399, 402 भा0दं 0सं0 के दं डनीय अपराध से शंका का लाभ देते हुये दोषमुक्त करते हुये स्वतंत्र किया जाता है। उक्त अभियुक्तों के जमानत मुचलका निरस्त किया जाता है। 
13- प्रकरण के दो अन्य अभियुक्त सतीश ठाकुर एवं इलाउद्दीन अनुपस्थित है, वे फरार हैं उनके विरूद्ध विचारण शेष है। ऐसी स्थिति में प्रकरण में जप्तशुदा सम्पत्ति के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया जा रहा है। 
14- निर्णय की निःशुल्क प्रतिलिपि अति लोक अभियोजक एवं जिला दण्डाधिकारी को दी जावे । 
खुले न्यायालय में निर्णय मेरे निर्देशन में टंकित दिनांकित, हस्ताक्षरित कर घोषित। 
(ऋषि कुमार बर्मन
द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, 
दुर्ग(छ0ग0) 
25-9-2014 

छ.ग.राज्य बनाम मोसु पिता काया व अन्‍य

दाण्डिकप्रकरण  क्रमांक -125/2016
CNR NO.- CGDA02-000024-2016

न्यायालयः-श्रीमती प्रतिभा  वर्मा , मुख्‍य न्‍यायिक मजिस्‍ट्रेट ,
दंतेवाड़ा , जिला-द.ब.दंतेवाड़ा (छ.ग.)
संस्थित दिनांक-12.05.2016
छ.ग.राज्य,
द्वारा आरक्षी केन्द्र दंतेवाड़ा...................................................................अभियोजन
बनाम
01. मोसु पिता काया, उम्र-45 वर्ष,
02. भैरम पिता पिलू, उम्र-36 वर्ष,
03. मुन्ना पिता पिलू, उम्र-33 वर्ष,
सभी सा.-घोटपाल, थाना-गीदम,
जिला-दंतेवाड़ा(छ.ग.)..........................................................................अभियुक्तगण
................................................................................
-: : निर्णय : :-
(आज दिनांक  17.08.2016 को  घोषित)
01. आरोपीगण के विरूद्ध छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवा. अधि. 2005 की धारा 5 के तहत आरोप है कि अभियुक्तगण ने दिनांक 04.04.2016 को समय 06.00 बजे स्थान परपा पारा घोटपाल, अंतर्गत थाना-गीदम में प्रार्थीगण मोहन लेकामी एवं श्रीमती रामबती लेकामी को टोनही के रूप में पहचान कर शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
02. अभियोजन का मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि घटना दिनांक 04.04.2016 को घोटपाल गांव में पंचायत हुआ, जिसमें गांव के सभी लोग तथा प्रार्थी मोहन लेकामी तथा उसकी पत्नी श्रीमती रामबती को भी बैठक में बुलाये थे। गांव का मुन्ना राम, भैरम लेकामी तथा मोसू भी बैठक में उपस्थित थे, तीनों, प्रार्थीगण को बोलने लगे कि तुम झाड़ में देवी कर दिये थे, इसलिये मेहतु राम गिरकर मर गया। मां-बहन की गाली देकर तीनों हाथ-मुक्का लात से प्रार्थी तथा उसके पत्नी को मारपीट किये, जिससे उन्हें चोट लगा है। प्रार्थी द्वारा घटना की रिपोर्ट थाना गीदम में किये जाने पर थाना गीदम द्वारा अप.क्र.-39/16 अंतर्गत धारा 294,323,506(भाग-2)/34 भा.द.सं. का प्रथम सूचना रिपोर्ट प्र.पी.-1 लेखबद्ध किया गया। अन्वेषण प्रारंभ कर घटना स्थल का मौका नक्शा तैयार किया गया। धारा 161 द.प्र.सं. के तहत गवाहों के कथन लेखबद्ध किया गया। अन्वेषण की संपूर्ण कार्यवाही पश्चात धारा 294,323, 506(भाग-2)/34 भा.द.सं. एवं छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवा.अधि. 2005 की धारा 5 के तहत अभियोग पत्र विचारण हेतु न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
03. अभियुक्तगण ने अपराध अस्वीकार किया। दिनांक 16.08.16 को प्रार्थीगण मोहन लेकामी, श्रीमती रामबती लेकामी, पोदिया एवं श्रीमती कोपे का अभियुक्तगण से राजीनामा हो जाने से अभियुक्तगण को धारा 294,323, 506 (भाग-2)/34 भा.द.सं. के आरोप से दोषमुक्त किया गया। धारा 5 छ.ग टोनही प्रताड़ना निवा.अधि. 2005 का आरोप राजीनामा योग्य न होने से प्रकरण में विचारण की कार्यवाही जारी रखी गई। 
04. द.प्र.स. की धारा 313 के तहत आरोपीगण का परीक्षण किया गया, उनके द्वारा दिया गया उत्तर उन्हीं के शब्दों में दर्ज किया गया। बचाव में प्रवेश कराने पर अपने आप को निर्दोष एवं झूठा फसाना व्यक्त किया और बचाव साक्ष्य नहीं देना व्यक्त किया, उनका अभिवाक दर्ज किया गया।
05. इसप्रकरण  में निम्न विचारणीय प्रश्‍न हैं -
1. क्या आरोपीगण ने दिनांक 04.04.2016 को समय 06.00 बजे स्थान परपा पारा घोटपाल, अंतर्गत थाना-गीदम में प्रार्थीगण मोहन लेकामी एवं श्रीमती रामबती लेकामी को टोनही के रूप में पहचान कर शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किया?
प्रश्‍न पर सकारण निष्कर्ष
06. मोहन(अ.सा.-1) का कथन है कि सल्फी झाड़ को लेकर अभियुक्तगण के साथ हमारा बाता-बाती हुआ था, जिसकी रिपोर्ट उसने थाना गीदम में किया है, जो प्र.पी.-1 है। रामबती(अ.सा.-2) का भी कथन है कि सल्फी झाड़ को लेकर अभियुक्तगण के साथ उसका बाता-बाती हुआ था, जिसकी रिपोर्ट उसके पति मोहन ने थाना गीदम में किया था। उसकी कोई डॉक्टरी जांच नहीं हुई थी। पोदिया (अ.सा.-3) का भी कथन है कि हम लोगों का अभियुक्तगण के साथ बाता-बाती हुआ था, उसकी कोई डॉक्टरी जांच नहीं हुआ था। कोपे (अ.सा.-4) का भी कथन है कि प्रार्थीगण एवं अभियुक्तगण के बीच बाता-बाती हुई थी, कोई मारपीट नहीं की गई थी। मोहन (अ.सा.-1), रामबती (अ.सा.-2), पोदिया (अ.सा.-3) एवं कोपे (अ.सा.-4) को अभियोजन द्वारा पक्षद्रोही घोषित कर सूचक प्रश्न पूछे जाने पर इस बात से इंकार किया है कि तीनों अभियुक्तगण ने यह कहा था कि तुम झाड़ में देवी करते हो, इसलिये मेहतु राम गिरकर मर गया है। बल्कि मोहन (अ.सा.-1), रामबती (अ.सा.-2), पोदिया (अ.सा.-3) एवं कोपे (अ.सा.-4) के अनुसार अभियुक्तगण के साथ उन लोगों का बाता-बाती होने के संबंध में कथन किया गया है। अभियोजन की ओर परिक्षित किसी भी साक्षी ने अभियुक्तगण द्वारा प्रार्थी मोहन एवं श्रीमती रामबती लेकामी को टोनही के रूप में पहचान कर शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किये जाने के संबंध में कोई कथन नहीं किया है। एैसी स्थिति में साक्ष्य से यह प्रमाणित नहीं होता है कि आरोपीगण ने घटना दिनांक 04.04.2016 को समय 06.00 बजे स्थान परपा पारा घोटपाल, अंतर्गत थाना-गीदम में प्रार्थीगण मोहन लेकामी एवं श्रीमती रामबती लेकामी को टोनही के रूप में पहचान कर शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अतः विचारणीय प्रश्न का निष्कर्ष ‘‘प्रमाणित नहीं’’ के रूप में दिया जाता है।
07. उपरोक्त संपूर्ण साक्ष्य विश्लेषण पश्चात अभियोजन, अभियुक्तगण के विरूद्ध धारा 5 छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवा.अधि. 2005 के आरोप को युक्तियुक्त संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा है। अतः अभियुक्तगण को धारा 5 छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवा.अधि. 2005 के आरोप से दोषमुक्त कर स्वतंत्र किया जाता है।
08. अभियुक्तगण के पूर्व के जमानत मुचलका निरस्त कर भारमुक्त किये जाते हैं। धारा 437-ए द.प.सं. के तहत पूर्व मुचलका अपील न होने की दशा में छः माह बाद भार मुक्त माना जावेगा।
09. प्रकरण में जप्तशुदा संपत्ति कुछ नहीं है।

निर्णय खुले न्यायालय मेरे निर्देशन में टंकित हस्ताक्षरित दिनांकित घोषित
सही/- सही/-
(श्रीमती प्रतिभा वर्मा)
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
द0ब0दन्तेवाड़ा(छ.ग.)

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