Saturday, 14 March 2015

महादेव महार वर्सेस तपन सरकार

 
समाचारों के अनुसार 11 फरवरी 2005 की सुबह महादेव महार पिता भादु महार 36 वर्ष जिम जाने के लिए घर से निकला था। इस दौरान वह सुबह 6:28 बजे सुभाष चौक सुपेला में अपने साथी धनजी के घर पहुंचा। धनजी ट्रेकसूट पहनने के लिए घर के भीतर घूस गया। इस बीच गैंगस्टर तपन सरकार सहित डेढ़ दर्जन लोगों ने उसे घेर लिया और गोली, चाकू, खुखरी व दांव से उस पर ताबड़ तोड़ वारकर उसकी हत्या कर दी।आरोपियों ने महादेव को पांच गोली मारने के अलावा उसके सिर, शरीर के अन्य भागों में धारदार हथियार से भी कई बार किए थे।वारदात को अंजाम देने आरोपी चार मोटर सायकल व एक मिनीडोर में वहां पहुंचे थे।खून की होली खेलने के बाद आरोपी वहां से भाग खड़े हुए। विवेचना में यह बात सामने आई थी कि आरोपियों ने 10-11 फरवरी 2005 की दरम्यिानी रात टेलीफोन पर बातचीत कर घटना का षडयंत्र रचा था।इसके बाद चंद्रा-मौर्या टाकीज सामने वाली गली में एकत्रित होकर हथियार बांटे थे।
 महादेव महार हत्याकांड दुर्ग-भिलाई में चल रहे गैंगवार की एक परिणति थी। घटना के ट्विनसिटी में कई दिनों तक सनसनी फैली रही। वहीं महीनों तक इस घटना की चर्चा यहां होती रही। प्रकरण में आरोपी बनाए गए अनिल शुक्ला उसी दिन पुलिस के हत्थे चढ़ गया था। वहीं अन्य आरोपी एक के बाद एक गिरफ्तार होते रहे और जमानत पर रिहा भी होते रहे। लेकिन कई आरोपी ऐसे भी है जो गिरफ्तार होने के बाद बाहरी दुनिया की तस्वीर तक नहीं देख पाए। वारदात के बाद कई आरोपी महीनों तक फरार रहे। इनमें कुछबिलासपुर, कोरबा व जबलपुर में पनाह लिए हुए थे।कुछ गोवा व केरल तक भी घूम आये। यह मामला पुलिस के लिए भी एक बड़ी चुनौती थी और इसे सुलझाने पुलिस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।
 महादेव हत्याकांड में पुलिस ने कुल 37 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें 18 पर हत्या का आरोप था।इन आरोपियों में एक की मौत हो चुकी है।तीन फरार है।13 को आज सजा हुई है। शेषदोषमुक्त करार दिए गए है।प्रकरण में अभियोजन ने कुल 82 साक्षियों की सूची न्यायालय में पेश किया था।इनमें 77 गवाहों के बयान 400 पृष्ठ में दर्ज किए गए।पुलिस ने प्रकरण के संबंध में 256 दस्तावेजी साक्ष्य जुटाएं थे।विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से आरोपियों से कुल 747 प्रश्न पुछे गए।जिस पर बचाव पक्ष की ओर से 144 तर्क प्रस्तुत किए गए। प्रकरण में अभियोजन साक्षी तारकेश्वर व चंदन साव ने मुख्य परीक्षण में अभियोजन का सर्मथन किया था। लेकिन प्रतिपरीक्षण में दोनों पक्ष द्रोही हो गए थे। पुलिस द्वारा प्रस्तुत बेलेस्टिक रिपोर्ट में मृतक के शरीर में लगी गोली व आरोपियों से बरामद पिस्तोल के बारूद में समानता होने की पुष्टि हुई। यही प्रकरण में सजा का आधार भी बना। न्यायालय ने अपना फैसला कुल 211 पृष्ठों में सुनाया। यह है न्यायालयीन मजबुन
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गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 1 से 10)

 
1- आरोपीगण बच्चा उर्फ जायद, प्रभाष सिंह, विनोद बिहारी, सत्येन माधवन, मंगल सिंह, तपन सरकार, पिताम्बर साहू, रंजीत सिंह, शैलेन्द्र सिंह ठाकुर, बिज्जू उर्फ महेश, छोटू उर्फ कृष्णा राजपूत, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, जयदीप सिंह, गुल्लू उर्फ अरविंद श्रीवास्तव, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, मुजीबुद्दीन पर भा0दं0सं0 की धारा 120 बी, 148, 302/149, 307/149 एवं 3 (2) (5) अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 एवं आरोपी सत्येन माधवन, मंगलसिंह, तपन सरकार, रंजीत सिंह, शैलेन्द्र सिंह ठाकुर, प्रभाष सिंह एवं बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी पर आयुध अधिनियम की धारा 25-27 के तहत यह आरोप है कि उन्होंने दिनांक 11/2/2005 को उक्तानुसार पांच या पांच से अधिक व्यक्तियों का अवैध जमाव इस उद्देश्य से गठित किया कि मृतक महादेव महार की हत्या करें, एवं उक्त उद्देश्य को अग्रसर करते हुये उक्त सभी आरोपियों ने घातक आयुध माउजर, कट्टा, पिस्टल, तलवार, नारियल काटने का दांव और डण्डे से प्रातः 6.35 बजे उसकी हत्या कारित की। शेष आरोपीगण पर भा0दं0सं0 की धारा 212, 216 के तहत यह आरोप है कि उन्होंने महादेव की हत्या के उपरान्त उक्त आरोपियों को बचाने के लिये उनकी सहायता की।
2- इस प्रकरण में विवादित नही है कि प्रकरण के लम्बन के दौरान आरोपी गोविन्द विश्वकर्मा की मृत्यु हो गयी, एवं शेष आरोपी शहजाद, पी0 प्रीतिश एवं गया उड़िया उर्फ जयचंद प्रधान अभी भी फरार है। इस प्रकरण में कुल 82 साक्षियों का साक्ष्य कुल 400 पृष्ठों में प्रस्तुत किया गया है, कुल 256 दस्तावेज में प्रदर्श अंकित हुआ है, इसी प्रकार आरोपीगण से दं0प्र0सं0 की धारा 313 के तहत 747 प्रश्न पुछे गये हैं। जबकि उभयपक्ष की ओर से कुल 144 पेज का लिखित तर्क प्रस्तुत किये गये हैं।
3- संक्षेप में अभियोजन का मामला इस प्रकार है कि- 
(i) घटना दिनांक 11/2/2005 को प्रातः मृतक महादेव महार सुभाष चौक स्थित अपने निवास से सुभाष चौक आया था और अपने साथियों से बातचीत करते हुये खड़ा था। उस समय अ0सा07 चंदन साव, अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा व अ0सा09 गिरवर साहू वही पर खड़े थे एवं मृत साक्षी संतोष के पिता अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से बातचीत कर रहे थे। उसी समय मिनीडोर क्रमांक सी.जी.07 टी-0736 एवं दो बिना नम्बर की बाइक में आरोपीगण आये एवं उन्होंने मृतक महादेव को गाली देते हुये मारने के लिये दौड़े। तब मृत आरोपी गोविन्द विश्वकर्मा ने आरोपी महादेव के सिर में खुखरी से मारा, जिससे महादेव गिर गया। उसी समय आरोपी तपन, मंगल, प्रभाष, सत्येन माधवन ने अपने-अपने कट्टे व पिस्टल से आरोपी के उपर फायर किये, जिससे मृतक महादेव के सिर में चोट आयी। उस समय आरोपीगण ने कड़े भोथरे और धारदार हथियार से मृतक महादेव के साथ मारपीट की। उक्त मारपीट से महादेव के शरीर में कुल 21 चोटें आयी। उसके बाद आरोपीगण अपने-अपने वाहनों से भाग गये, जो चार माह से दो साल तक फरार रहे। विवेचना में यह पाया गया कि आरोपीगण एवं मृतक एवं उसके साथियों के मध्य आपराधिक गतिविधि एवं शराब के व्यावसायिक ठेके को लेकर आपसी प्रतिस्पर्धा थी, जिससे परिणति मृतक महादेव की हत्या से हुई।
(ii) उक्त घटना के तुरन्त बाद अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा नामक व्यक्ति ने घटना दिनांक 11/2/2005 की सूचना टेलीफोन से थाना सुपेला में यह कहकर दी कि महादेव महार की हत्या आरोपी तपन एवं उसके साथियों ने कर दी गयी है, जिसे थाना सुपेला के प्रधान आरक्षक अ0सा060 सुभाष सिंह मण्डावी ने रोजनामचा सान्हा क्रमांक 874 में तत्काल दर्ज किया, जिसकी मूल सान्हा प्रदर्श पी 128 है, जिसकी छाया प्रति प्रदर्श पी 128 सी है। सान्हा दर्ज करते ही थाना सुपेला में पदस्थ नाईट आफिसर तात्कालीन उपनिरीक्षक अ0सा069 अनिता सागर घटनास्थल सुभाष चौक गयी। अ0सा069 अनिता सागर ने तत्काल घटनास्थल पर पहुंचकर सूचनाकर्ता प्रशान्त उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा की सूचना के आधार पर मर्ग सूचना प्रदर्श पी 138 दर्ज की। उन्होंने प्रार्थी प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा के बताये अनुसार घटनास्थल पर ही प्रातः 7.05 बजे आरोपी तपन सरकार, मंगल सिंह, सत्येन माधवन, जयदीप, प्रभाषसिंह, गोविन्द विश्वकर्मा, बच्चा, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, गुल्लू उर्फ अरविंद श्रीवास्तव, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी एवं अन्य लोग एवं विनोद बिहारी के विरूद्ध शून्य पर नालिशी दर्ज की है, जो प्रदर्श पी 15 है। अ0सा069 अनिता सागर को सूचनाकर्ता प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा ने शून्य की नालिशी में यह भी बताया कि घटनास्थल पर अभियोजन साक्षी गिरवर, चंदन, लिंगा राजू आदि भी उपस्थित थे। शून्य की नालिशी को आरक्षक परमजीत सिंह क्रमांक 498 ने देहाती नालिशी थाना सुपेला में लाकर प्रस्तुत किया जिसे थाना सुपेला के सहायक उपनिरीक्षक अ0सा066 जे0पी0चन्द्राकर ने अपराध क्रमांक 141/05 में प्रथम सूचना पत्र दर्ज किया जो प्रदर्श पी 76 है। उन्होंने आरक्षक परमजीत सिंह द्वारा प्रस्तुत करने पर शून्य पर दर्ज मर्ग इन्टीमेशन के आधार पर असल मर्ग क्रमांक 09/2005 दर्ज किया जो प्रदर्श पी 139 है। इसी दौरान घटनास्थल पर थाना प्रभारी सुपेला अ0सा077 राकेश भट्ठ आये।
(iii) अ0सा077 राकेश भट्ठ ने गवाहों को प्रदर्श पी 1 की सूचना देकर मृतक महादेव महार के शव का पंचनामा किया। पंचनामा की कार्यवाही प्रदर्श पी 2 है। उन्होंने पोस्टमार्टम फार्म प्रदर्श पी 35 भरकर मृतक महादेव महार के शव को पोस्टमार्टम के लिये जिला अस्पताल दुर्ग प्रेषित करवाया, जिसे प्रधान आरक्षक अ0सा015 होलसिंह भुवाल जिला अस्पताल लेकर गये। तब महादेव महार के शव का परीक्षण जिला चिकित्सालय दुर्ग के मेडिकल आफिसर अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने किया। अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने मृतक महादेव महार के शरीर में कुल 21 घाव पाये। उन्होंने मृतक के शरीर में पाये गये कपड़ों का भी परीक्षण किया और उसके पश्चात अ0सा010 जे0पी0मेश्राम ने मृतक की मृत्यु शॉक और हेमरेज के कारण होना बताया और यह भी पाया कि सभी चोटें एन्टीमार्टम थी, जिसके संबंध में उनकी रिपोर्ट प्रदर्श पी 34 है। उन्होंने अपने सहयोगी चिकित्सक डॉ0 एम.सी. महनोत के साथ मृतक के शव का परीक्षण किया था। अ0सा010 जे0पी0मेश्राम ने मृतक के टी.शर्ट में एक बुलेट भी पायी। उन्होंने मृतक के कपड़ों का परीक्षण किया। उन्होंने मृतक के कपड़ों को सील पैक करके रासायनिक परीक्षण हेतु अ0सा015 आरक्षक होलसिंह के सुपुर्द किया। उन्होंने मृतक के विसरा को संग्रहित कर उसे भी आरक्षक होलसिंह के सुपुर्द किया।
(iv) अ0सा015 होल सिंह ने अ0सा010 जे0पी0मेश्राम द्वारा दिये गये पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मृतक के कपड़े व मृतक के विसरा को थाने में लाकर प्रस्तुत किया, जिसे तात्कालीन नगर पुलिस अधीक्षक अ0सा076 आर0के0राय ने गवाह आनंद पनिका एवं शिव के समक्ष जप्त किया, जिसकी जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 9 है। अ0सा077 राकेश भट्ठ ने घटनास्थल पर पहुंचकर दिनांक 11/2/2005 को ही संतोष शर्मा उर्फ प्रशांत उर्फ गुड्डा की निशानदेही पर घटनास्थल का नजरी नक्शा तैयार किया, जो प्रदर्श पी 225 है। उन्होंने दिनांक 11/2/2005 को ही खुन आलुदा मिट्टी और सादी मिट्टी प्रदर्श पी 5 के अनुसार जप्त की। तत्कालीन नगर पुलिस अधीक्षक अ0सा076 आर.के.राय ने मृतक के भाई सदवन महार के प्रस्तुत करने पर मृतक का जाति प्रमाण पत्र जप्त किया।
(v) प्रकरण की शेष विवेचना अ0सा076 आर.के.राय एवं अ0सा077 राकेश भट्ठ द्वारा की गयी है। अ0सा076 आर.के.राय ने प्रदर्श पी 58 के जप्ती पत्रक के अनुसार प्रेमचंद श्रीवास्तव नामक व्यक्ति से एक मोबाइल फोन की जप्ती किये। उन्होंने आरोपी नरेन्द्र कुमार दुबे, आरोपी बिहारी उर्फ विनोद बिहारी सिंह, आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर, राजू खंजर, आरोपी मजीबुद्दीन, आरोपी प्रभाष कुमार सिंह, आरोपी तपन सरकार, आरोपी पंकज सिंह, आरोपी एस.सैथिल्य, आरोपी चुम्मन लाल देशमुख, आरोपी सुशील कुमार राठी, आरोपी विद्युत चौधरी, आरोपी मंगल सिंह, आरोपी बिज्जू उर्फ महेश, आरोपी बच्चा उर्फ अब्दुल जायद, आरोपी संजय सिंह राजपूत का बयान मेमोरेण्डम धारा 27 साक्ष्य अधिनियम लेखबद्ध किया और उक्त बयान मेमोरेण्डम के आधार पर उक्त आरोपीगण द्वारा बताये गये स्थान से मोबाइल फोन, सिम, क्वालिस गाड़ी क्रमांक सी.जी.07/2393, चाकू, कट्टा, कारतूस, खोखा, 303 बोर का कट्टा, 303 बोर का नौ कारतुस, बटनदार चाकू, नारियल कांटने का दांव, मोबाइल फोन, मोबाइल फोन की सिम, हीरोहोण्डा मोटर सायकल, इंडिका कार, हीरोहोण्डा पैशन, लोहे का कट्टा, 315 बोर के कारतूस का खाली खोखा आदि की जप्ती किये। उन्होंने उक्त आरोपीगण को गिरफ्तार किये। अ0सा076 आर0के0राय ने दिनांक 17/8/2005 को केन्द्रीय न्यायालयीक विज्ञान प्रयोगशाला, चण्डीगढ़ प्रदर्श पी 134 ए का प्रतिवेदन सहित खाली कारतुस, मृतक महादेव महार की शरीर से निकली बुलेट, महादेव की त्वचा, तीन देशी कट्टा 315 बोर के, एक खाली खोखा परीक्षण के लिये प्रेषित किया।
(vi) अ0सा076 आर.के.राय ने दिनांक 27/9/2005 को प्रदर्श पी 135 ए/सी के जरिये 9 एमएम पिस्टल व एक 9 एमएम कारतूस का खोखा, दो 315 बोर का कट्टा और 315 बोर के नौ नग जिंदा कारतुस, 315 बोर का कारतुस का खोखा परीक्षण हेतु केन्द्रीय न्यायालयीक विज्ञान प्रयोगशाला, चण्डीगढ़ प्रेषित किया। अ0सा076 आर. के.राय ने जिला दण्डाधिकारी, दुर्ग को प्रदर्श पी 96 का पत्र अभिलिखित कर आरोपी तपन सरकार, प्रभाष सिंह और सत्येन माधवन को आयुध अधिनियम के तहत अभियोजित करने की स्वीकृति मांगी। यह पत्र प्रदर्श पी 96 है। इसी प्रकार उन्होंने जिला दण्डाधिकारी दुर्ग से आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर और मंगल सिंह के विरूद्ध आयुध अधिनियम के तहत अभियोजन हेतु प्रदर्श पी 119 का पत्र लिखकर अनुमति मांगी, जो उन्हें प्रदर्श पी 120 के माध्यम से प्राप्त हुई। अ0सा076 आर.के.राय ने दिनांक 10/4/2005 को कॉमर्शियल मैनेजर रिलायंस को पत्र लिखकर ग्यारह मोबाइल नम्बरों के लिये जमा कराये गये आवेदन पत्र एवं दस्तावेजों की प्रति मांगी, जिसके संबंध में उनका पत्र प्रदर्श पी 161 है। तब टेलीकॉम कम्पनी से आरोपियों से जप्त मोबाइल की कॉल डिटेल्स की जो जानकारी प्राप्त हुई वह 45 पन्नों में हैं, जो प्रदर्श पी 162 से 206, प्रदर्श पी 129 से प्रदर्श पी 132 (ए से आई) प्रदर्श पी 207 से 211 है। उन्होंने आइडिया कम्पनी से आरोपी के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल्स की जानकारी चाही, जिसके संबंध में उनका पत्र प्रदर्श पी 78 है। तब आइडिया कम्पनी से जो जानकारी प्राप्त हुई वह प्रदर्श पी 79 से प्रदर्श पी 88 है। अ0सा076 आर.के.राय ने प्रकरण में जप्तशुदा सम्पत्ति को परीक्षण हेतु राज्य न्यायालयीक विज्ञान प्रयोगशाला प्रदर्श पी 212 का पत्र अभिलिखित कर प्रेषित किया। उन्होंने केन्द्रीय न्यायालयीक विज्ञान प्रयोगशाला भी सामग्री परीक्षण हेतु भेजी। एफएसएल रायपुर से जो परीक्षण रिपोर्ट प्राप्त हुई वह प्रदर्श पी 218 है जो तीन पन्नों मे हैं। कलकत्ता स्थित प्रयोगशाला से सिरोलॉजिस्ट की रिपोर्ट प्राप्त हुई जो प्रदर्श पी 220 है। एफएसएल रायपुर से प्राप्त परीक्षण रिपोर्ट प्रदर्श पी 221 है।
(vii) अ0सा076 आर.के.राय ने विवेचना के दौरान साक्षी प्रशांत उर्फ गुड्डू उर्फ संतोष, साक्षी तारकेश्वर सिंह एवं साक्षी धनजी उर्फ संतोष, साक्षी गिरवर साहू, साक्षी लिंगा राजू, साक्षी पी. राजकुमार, साक्षी राजेन्द्र सिंह भदोरिया, साक्षी हनुमान सिंह, साक्षी केशव चौधरी, साक्षी मुरली, साक्षी अतुल बोरकर एवं साक्षी मनोज थॉमस का पूरक बयान लेखबद्ध किया।
(viii) अ0सा077 राकेश भट्ठ ने दिनांक 25/5/2005 को न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, बलौदा बाजार को प्रदर्श पी 226 का आवेदन प्रस्तुत कर जेल में बंद आरोपी पिताम्बर तथा छोटू उर्फ कृष्णा की पहचान की कार्यवाही हेतु अनुमति प्राप्त की। तब नायब तहसीलदार अ0सा057 शिवकुमार तिवारी ने आरोपी पिताम्बर एवं आरोपी छोटू उर्फ कृष्णा की पहचान की कार्यवाही निष्पादित किया, जिससे संबंधित दस्तावेज प्रदर्श पी 16, प्रदर्श पी 28 व प्रदर्श पी 123 है। अ0सा052 यामिनी पाण्डे गुप्ता ने आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर की पहचान की कार्यवाही प्रदर्श पी 17 निष्पादित करवायी। अ0सा077 राकेश भट्ठ ने आरोपी बिहारी उर्फ विनोद बिहारी से एक सफेद लाइनिंग की शर्ट और एक बटन वाला चाकू जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 41 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी सत्येन्द्र माधवन का बयान मेमोरेण्डम प्रदर्श पी 71 गवाहों के समक्ष लेखबद्ध किया। उन्होंने आरोपी सत्येन माधवन के बयान मेमोरेण्डम के आधार पर एक देशी कटटा 315 बोर का जिसके अंदर बैरल में एक कारतूस खोखा फंसा हुआ, खोखे के पेन्दे में 8 एमएमकेएफ लिखा हुआ, जमीन के गढढे से निकालकर पेश करने पर जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 72 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी सत्येन्द्र माधवन से एक हीरोहोण्डा प्लेजर एवं सेम्संग कंपनी का मोबाइल सेट व सिम व चार्जर की जप्ती प्रदर्श पी 73 के अनुसार किया। उन्होंने आरोपी छोटू उर्फ कृष्णा, आरोपी पिताम्बर साहू, आरोपी रंजीत सिंह, आरोपी मंगल सिंह, आरोपी तोरई पांडियन का बयान मेमोरेण्डम क्रमशः प्रदर्श पी 100, प्रदर्श पी 101, प्रदर्श पी 102 एवं प्रदर्श पी 11 लेखबद्ध किया। उन्होंने उक्त आरोपियों के बयान मेमोरेण्डम के आधार पर तीन लोहे का दांव, एक लोहे का नाईन एमएम का पिस्टल, नौ एमएम कारतूस का खोखा जिसके पीतल के पेन्दे में केएफ 95 एमएमटूएल लिखा है, को जप्त किया। उन्होने आरोपी सत्येन माधवन, तपन सरकार, विनोद बिहारी, गोविन्द विश्वकर्मा, मंगल सिंह, अरविंद गुल्लू श्रीवास्तव, राजू खंजर, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, जयदीप सिंह, प्रभाषसिंह, जे.जे.राव का आपराधिक रिकार्ड प्रदर्श पी 244 से प्रदर्श पी 254 संकलित किया।
(ix) थाना सुपेला के तात्कालीन उपनिरीक्षक अ0सा075 जे0एल0साहू ने दिनांक 11/8/2005 को व्ही.लक्ष्मणराव से एक टीवीएस सुजुकी क्रमांक सीजी.07जेड.आर./0193 जप्ती पत्र प्रदर्श पी 146 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी राजू खंजर के बयान मेमोरेण्डम प्रदर्श पी 44 के आधार पर उनके द्वारा निकाल कर पेश करने पर एक नीले रंग की बनियान, एक लोहे का दांव जप्ती पत्र प्रदर्श पी 45 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी मुजीबुद्दीन के बयान मेमोरेण्डम प्रदर्श पी 48 में उल्लेखित स्थान से उनके द्वारा निकालकर पेश करने पर एक बांस की लाठी और दो सिम जप्ती पत्र प्रदर्श पी 49 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी चुम्मन के पेश करने पर जप्ती पत्र प्रदर्श पी 90 के अनुसार एक पल्सर मोटर सायकल बिना नम्बर की जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 90 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी चुम्मन से ही एक नोकिया कम्पनी का मोबाइल सेट तथा युटीआई बैंक में जमा रकम की तीन परची तथा आईसीआईसीआई बैंक मे जमा करने की परची को जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 91 के अनुसार जप्त किया। उन्होंने आरोपी छोटू उर्फ कृष्णा से एक नारियल कांटने का दांव, आरोपी पिताम्बर से एक नारियल कांटने का लोहे का दांव, आरोपी रंजीत सिंह से यामाहा मोटर सायकल, आरोपी सुशील कुमार से इण्डिका कार क्र0 सी.जी.04 बी.0216, एक नोकिया मोबाइल फोन, आरोपी बच्चा उर्फ अब्दुल जायद से बटनदार लोहे का चाकू, एक सैमसंग रिलायंस कम्पनी का सफेद रंग का मोबाइल फोन, आरोपी संजय सिंह से सिल्वर रंग का मोबाइल फोन, आरोपी तोरई पांडियन से एक टोयेटा क्वालिस क्रमांक सीजी07 जेड0डी.9900 एवं उसके दस्तावेज जप्त किये।
(x) थाना सुपेला के तात्कालीन सहायक उपनिरीक्षक अ0सा074 महादेव तिवारी ने आरोपी नरेन्द्र दुबे से एक नोकिया मोबाइल फोन मॉडल नं0 3310 एवं आरोपी एस. सैथिल्य से एक स्कार्पियों गाड़ी क्रमांक सी.जी.12 डी/0189 को जप्त किया। दुर्ग क्राइम ब्रांच के अ0सा071 राजीव शर्मा ने दिनांक 24/7/2005 को देवरी थाने में आरोपी तपन सरकार के आधिपत्य से एक टोयटा क्वालिस वाहन क्र0पी.बी.46 सी/4318 एवं उसके दस्तावेज जप्त किये। थाना सुपेला के तात्कालीन प्रधान आरक्षक अ0सा068 हृदयलाल बंजारे ने साक्षी रामदास का बयान प्रदर्श पी 119 लेखबद्ध किया। थाना सुपेला के तात्कालीन उपनिरीक्षक अ0सा067 प्रकाश सोनी ने दिनाक 10/5/2005 को आरोपी विद्युत चौधरी से एक लोहे की खुखरी एवं नोकिया कम्पनी के दो मोबाइल फोन जप्ती पत्र प्रदर्श पी 139 के अनुसार जप्त किया। थाना सुपेला के तात्कालीन सहायक उपनिरीक्षक अ0सा066 जे0पी. चन्द्राकर ने प्रदर्श पी 76 का प्रथम सूचना पत्र एवं प्रदर्श पी 139 का मर्ग इन्टीमेशन लेखबद्ध किया।
(xi) थाना सुपेला के तात्कालीन आरक्षक अ0सा062 नेमन साहू ने अपराध क्रमांक 141/05 के प्रथम सूचना पत्र की कार्बन प्रति को दिनांक 12/2/2005 को न्यायालय में लाकर प्रस्तुत किया, जिसकी पावती प्रदर्श पी 131 है।
(xii ) इस प्रकरण में साक्षी संतोष उर्फ गुडडा उर्फ प्रशांत शर्मा, साक्षी चंदन साव, गिरवर साहू, साक्षी लिंगा एवं साक्षी संतोष उर्फ धनजी ने तात्कालीन न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग अ0सा059 रामजीवन देवांगन के समक्ष उपस्थित होकर दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत स्वयं का कथन लेखबद्ध किये जाने का निवेदन किया। तब अ0सा059 श्री रामजीवन देवांगन ने उक्त साक्षियों का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत क्रमशः प्रदर्श पी 18, प्रदर्श पी 22, प्रदर्श पी 23, प्रदर्श पी 26, प्रदर्श पी 126 का कथन लेखबद्ध किया है।
(xiii) आरोपियों से जप्त फायर्ड रायफल के खाली खोखा, पिस्टल के कारतूस, रायफल का बुलेट, मृतक की चमड़ी के टूकड़े, देशी कट्टा आदि का रासायनिक परीक्षण केन्द्रीय न्यायिक विज्ञान प्रयोगशाला, चण्डीगढ़ के कनिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी अ0सा063 डॉ0 पी0 सिद्दम्बरी ने किया, जिन्होंने परीक्षण उपरान्त प्रदर्श पी 134, प्रदर्श पी 135 का परीक्षण प्रतिवेदन प्रेषित किया।
(xiv) उक्त अनुसार विवेचना कर नगर पुलिस अधीक्षक अ0सा076 आर0के0राय ने सर्वप्रथम प्रथम आठ आरोपी के विरूद्ध अभियोग पत्र क्रमांक 269/2005 दिनांक 9/5/2005 को प्रस्तुत किया, जो इस न्यायालय में विशेष सत्र प्रकरण 25/2005 के रूप में पंजीबद्ध किया गया। उसके पश्चात आरोपी क्रमांक 9 से 19 के विरूद्ध अभियोग पत्र दिनांक 2/8/2005 को प्रस्तुत किया गया। उस समय अभियोग पत्र में 17 आरोपियों को फरार दर्शाया गया। उसके पश्चात 6 आरोपियों ने विशेष न्यायालय के समक्ष आत्मसमपर्ण किया गया जिन्हें विधिवत गिरफ्तारी की अनुमति लेकर आरोपी के रूप में संयोजित किया गया। अन्य चार आरोपी मंगलसिंह, महेश उर्फ बिज्जू यदू, शैलेन्द्र ठाकुर, बच्चा उर्फ अब्दुल जायद को गिरफ्तार कर आरोपी के रूप में संयोजित किया गया। इस प्रकरण के विवेचकगणों ने आरोपीगण के आपराधिक षडयंत्र को प्रमाणित करने के लिये आरोपीगण के मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स प्रदर्श पी 162 से प्रदर्श पी 206 एवं प्रदर्श पी 129 से प्रदर्श पी 132 ए से आई संकलित किया। अभियोजन के अनुसार आरोपीगण घटना दिनांक 11/2/2005 के एक दिन पहले अर्थात् 10/2/2005 से 11/2/2005 की सुबह तक आपस में मोबाइल टेलीफोन से बात कर मृतक की हत्या का आपराधिक षडयंत्र किये। विवेचना के दौरान ही आरोपी गोविन्द विश्वकर्मा पुलिस एनकाउण्टर में मारा गया। अतः स्पष्ट है कि वर्तमान में शहजाद, पी. प्रीतिश एवं गया उड़िया उर्फ जयचंद प्रधान अभी भी फरार है।
(xv) अभियोग पत्र प्रस्तुत किये जाने के उपरान्त न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग ने प्रकरण को इस न्यायालय में उपार्पित किया, जो विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 25/2005 के रूप में पंजीबद्ध हुआ। बाद में शेष आरोपीगण के विरूद्ध प्रस्तुत अभियोग पत्र को पूर्व पीठासीन अधिकारी द्वारा विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 47/2005 के रूप में पंजीबद्ध किया। चुंकि दोनों विशेष सत्र प्रकरण एक ही घटना से संबंधित थे, इसलिये पूर्व पीठासीन अधिकारी के दं0प्र0सं0 की धारा 220 के आदेश के अनुसार दोनो विशेष प्रकरणों को एक प्रकरण के रूप में समाहित किया गया, जो विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 47/05 है जिसमें समस्त कार्यवाही की गयी है।
4-  अभियोग पत्र प्रस्तुति के उपरान्त आरोपी बच्चा उर्फ जायद, प्रभाष सिंह, विनोद बिहारी, सत्येन माधवन, मंगल सिंह, तपन सरकार, पिताम्बर साहू, रंजीत सिंह, शैलेन्द्र सिंह ठाकुर, बिज्जु उर्फ महेश, छोटू उर्फ कृष्णा राजपूत, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, जयदीप सिंह, गुल्लू उर्फ अरविंद श्रीवास्तव, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, मुजीबुद्दीन को भा0दं0सं0 की धारा 120 बी, 148, 302/149, 307/149 एवं अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण अधि0) 1989 की धारा 3 (2)(5) व आरोपी प्रभाष सिंह, सत्येन माधवन, मंगल सिंह, तपन सरकार, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, रंजीत सिंह एवं शैलेन्द्र सिंह ठाकुर को 25-27 आर्म्स एक्ट एवं शेष आरोपीगण को भा0दं0सं0 की धारा 212, 216 से दण्डनीय आरोप विरचित कर सुनाये व समझाया गया, तब आरोपीगण ने अपराध अस्वीकार करते हुये निर्दोष होने का अभिवचन किया है।
5- आरोपीगण को आरोप अधिरोपित करने के उपरान्त अभियोजन द्वारा 77 साक्षियों का साक्ष्य प्रस्तुत किया गया एवं कुल 254 दस्तावेजों में प्रदर्श अंकित किया गया। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्षी अ0सा01 तारकेश्वर सिंग, अ0सा02 केशवप्रसाद चौबे, अ0सा03 प्रशांत कुमार, अ0सा04 शिव साहू, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा08 प्रशांत शर्मा उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा, अ0सा09 गिरवर साहू, अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम, अ0सा011 अशोक कुमार, अ0सा012 मोहन निषाद, अ0सा013 सत्यनारायण कौशिक, अ0सा014 मनोज साहू, अ0सा015 होलसिंह भुवाल, अ0सा016 प्रदीप ताम्रकार, अ0सा017 गणेश कुमार देवदास, अ0सा018 राजेश कुमार, अ0सा09 आनंद दास, अ0सा020 पी0राजकुमार, अ0सा021 आनंद साहू, अ0सा022 नूर मोहम्मद, अ0सा023 राजेन्द्र सिंह, अ0सा024 परमजीत सिंह, अ0सा025 दयाशंकर पाण्डेय, अ0सा026 दीपक, अ0सा027 श्यामकुमार साहू, अ0सा028 लवकुमार कौशिक, अ0सा029 छन्नूलाल निर्मलकर, अ0सा030 राजकुमार, अ0सा031 अवतार सिंह, अ0सा032 नरेश वर्मा, अ0सा033 मंगलदास, अ0सा034 तारकेश्वर, अ0सा035 सदवन महार, अ0सा036 गोपी, अ0सा037 अतुल बोरकर, अ0सा038 विद्यापति यादव, अ0सा039 प्रेम, अ0सा040 मनोज थामस, अ0सा041 ईश्वरलाल गेन्डे, अ0सा042 गंगाराम यादव, अ0सा043 अजयसिंह भदौरिया, अ0सा044 डॉ0 राजेश गुप्ता, अ0सा045 धीरज शर्मा, अ0सा046 गुरजीत सिंह, अ0सा047 विमलेश कुमार, अ0सा048 ए0के0शुक्ला, अ0सा049 मो0 फारूख, अ0सा050 शेख हफीज, अ0सा051 मनीष कुमार, अ0सा052 श्रीमती यामिनी पाण्डे गुप्ता, अ0सा053 रामदास, अ0सा054 अरूण कुमार निर्मलकर, अ0सा055 प्रीतम निर्मलकर, अ0सा056 अशोक कुमार निर्मलकर, अ0सा057 शिवकुमार तिवारी, अ0सा058 भार्गव शर्मा, अ0सा059 श्री रामजीवन देवांगन, अ0सा060 सुभाष सिंह मण्डावी, अ0सा061 अनिल वर्मा, अ0सा062 नेमन साहू, अ0सा063 डॉ0 पी0 सिद्दम्बरी, अ0सा064 दलबीर सिंह, अ0सा065 ददनसिंह (प्रधान आरक्षक), अ0सा066 जे0पी0चन्द्राकर (सेवानिवृत्त सहायक उपनिरीक्षक), 20 अ0सा067 प्रकाश सोनी (निरीक्षक), अ0सा068 हृदयलाल बंजारे (सहायक उपनिरीक्षक), अ0सा069 अनिता सागर (निरीक्षक), अ0सा070 हनुमान सिंह यादव, अ0सा071 राजीव शर्मा (निरीक्षक), अ0सा072 शिवकुमार गोड़, अ0सा073 ऐनकसिंह ध्रुव, अ0सा074 महादेव तिवारी (सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक), अ0सा075 जे0एल0साहू (उपनिरीक्षक), अ0सा076 आर0के0राय (रिटायर अति0 पुलिस अधीक्षक), एवं अ0सा077 राकेश भट्ठ (नगर पुलिस अधीक्षक) है।
6- दं0प्र0सं0 की धारा 313 के तहत आरोपीगण का कथन लिया गया। तब उन्होंने स्वयं को निर्दोष होने एवं झूठा फंसाने का कथन किया है। आरोपी बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी ने यह अभिवाक लिया कि घाटना दिनांक 11/2/2005 को वह विवाह समारोह में शामिल होने बरेली (उत्तरप्रदेश) गया था। इस अभिवाक के समर्थन में आरोपी विद्युत चौधरी ने प्रतिरक्षा साक्षी संजीव बंसल, अर्चना चौधरी का साक्ष्य प्रस्तुत किया। जबकि आरोपी अनिल शुक्ला और रंजीत सिंह की ओर से प्रतिरक्षा साक्ष्य के रूप में कतिपय दस्तावेज प्रस्तुत किये गये हैं, एवं आरोपी विनोद सिंह उर्फ विनोद बिहारी ने घटना के समय जबलपुर शहर में अपने साले की दशगात्र के कार्यक्रम में उपस्थित होने के तथ्य को प्रमाणित करने हेतु प्रतिरक्षा साक्षी के रूप में अपने ससुर धूपनारायण सिंह का साक्ष्य प्रस्तुत किया है। आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन ने प्रतिरक्षा साक्षी क्रमांक 1 जितेन्द्र वर्मा का साक्ष्य प्रस्तुत किया है।
7- उक्त स्थिति में इस न्यायालय के समक्ष प्रमुख रूप से अवधारणीय प्रश्न यह है कि क्या अभियोजन युक्तियुक्त शंका से परे यह प्रमाणित करने में सफल हुआ है कि:-
1- क्या महादेव महार की मृत्यु दिनांक 11/02/2005 मानवघाती या हत्यात्मक प्रकृति की थी ?
2- क्या आरोपी बच्चा उर्फ जायद, प्रभाष सिंह, विनोद बिहारी, सत्येन माधवन, मंगल सिंह, तपन सरकार, पिताम्बर साहू, रंजीत सिंह, शैलेन्द्र सिंह ठाकुर, बिज्जू उर्फ महेश, छोटू उर्फ कृष्णा राजपूत, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, जयदीप सिंह, गुल्लू उर्फ अरविंद श्रीवास्तव, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, मुजीबुद्दीन ने -
2(1)- दिनांक 11/2/2005 को प्रातः 5 बजे या उसके पूर्व मृतक महादेव महार की हत्या करने के लिये आपस में सहमत होकर योजना तैयार कर आपराधिक षडयंत्र किये?
2(2)- दिनांक 11/2/2005 को 6.20 बजे या उसके लगभग स्थान सुभाष चौक सुपेला में महादेव महार की हत्या करने के सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करते हुये पांच या पांच से अधिक व्यक्तियों का अवैध जमाव गठित किये और क्या उक्त अवैध जमाव का सदस्य होते हुये उसके सामान्य उद्देश्य को अग्रसर करने के लिये घातक आयुध कट्टा, पिस्तौल, गंडासा, चाकू, लाठी जिससे मृत्यु कारित किया जाना संभाव्य है, से सुसज्जित होकर बलवा का अपराध कारित किये ?
2(3)- उक्त दिनांक समय व स्थान में मृतक महादेव महार की साशय या यह जानते हुये कि घातक आयुध कट्टा, पिस्तौल, गंडासा, दांव, चाकू, लाठी आदि से उसके साथ मारपीट किये जाने से उसकी मृत्यु हो सकती है, उसे मारपीट कर सिर में गोली चलाकर, उसकी मृत्यु कारित कर उसकी हत्या का अपराध कारित किये ?
विकल्प में उक्त दिनांक समय व स्थान मे विधि विरूद्ध जमाव का सदस्य रहते हुये, जमाव के सामान्य उद्देश्य मृतक महादेव महार की हत्या करने को अग्रसर करते हुये साशय व यह जानते हुये कि घातक आयुध कट्टा, पिस्तौल, गंडासा, दांव, चाकू, लाठी आदि से उसके साथ मारपीट किये जाने से उसकी मृत्यु हो सकती है, उसे मारपीट कर सिर में गोली चलाकर, उसकी मृत्यु कारित कर उसकी हत्या का अपराध कारित किये ?
2(4)- उक्त दिनांक समय व स्थान में आप अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य न होते हुये अनुसूचित जाति के व्यक्ति मृतक महादेव महार की हत्या उसके अनुसूचित जाति होने के आधार पर कारित किये ?
2(5)- उक्त दिनांक समय व स्थान में उक्तानुसार विधि विरूद्ध जमाव, जिसका सामान्य उद्देश्य मृतक महादेव महार की हत्या करना तथा मृतक महादेव महार की हत्या के समय साशय व यह जानते हुये कि ऐसी परिस्थितियों में उक्त संतोष उर्फ गुड्डा, गिरवर, चंदन की ओर कट्टा व पिस्तौल से फायर किये जिससे संतोष, गिरवर या चंदन की मृत्यु हो जाती तो आप हत्या के दोषी होते?
आरोपी प्रभाष सिंह, सत्येन माधवन, मंगल सिंह, तपन सरकार, शैलेन्द्र ठाकुर, रंजीत सिंह व बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी के संबंध में:-
3- क्या दिनांक 11/2/2005 को 6.25 बजे या उसके लगभग स्थान सुभाष चौक सुपेला में एवं उसके पश्चात अपने अवैध आधिपत्य में बिना किसी वैध अधिकार के आरोपी तपन ने कट्टा, 315 बोर का जिंदा कारतूस, आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर ने 303 बोर के दो कट्टे, व 303 बोर का नौ नग जिंदा कारतुस, बटनदार चाकू, आरोपी प्रभाष ने 315 बोर का कट्टा व कारतुस, आरोपी सत्येन्द्र माधवन ने कट्टा, आरोपी मंगल सिंह ने कट्टा व कारतुस, आरोपी विद्युत चौधरी ने कट्टा व  कारतुस तथा आरोपी रंजीत सिंह ने प्रतिबंधित आयुध को रखा था? इस प्रकार आरोपीगण ने आयुध अधिनियम की धारा 27 के तहत दण्डनीय अपराध कारित किया?
4- क्या दिनांक 11/2/2005 को थाना सुपेला के क्षेत्राधिकार में सुभाष चौक में 6 से 6.30 बजे के मध्य प्रातः आरोपी प्रभाष सिंह ने 315 बोर के कट्टे, आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर ने 303 बोर के कट्टे, आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन ने देशी कट्टा, आरोपी विद्युत चौधरी ने लोहे की खुखरी, आरोपी मंगल ने एक कट्टा व कारतुस एवं आरोपी रंजीत ने धारा 4 आयुध अधिनियम के उल्लंघन में प्रतिबंधित आयुध को बिना किसी लायसेंस के अपने अवैध आधिपत्य में रखा ? इस प्रकार आरोपीगण ने आयुध अधिनियम की धारा 25 के तहत दण्डनीय अपराध कारित किया?
शेष आरोपीगण के लिये
5- क्या आरोपी जसपाल उर्फ गोल्डी, जे.जे.राव, प्रतापसिंह उर्फ मुन्ना, चुम्मन, संजय सिंह, रवि ठाकुर, फरहान उर्फ इरफान, तोरई पांडियन, रज्जन मियां, सुशील कुमार राठी, बलविंदर सिंह, संतोष साहू, शैलेष सिंह, पंकज सिंह, एस. सैथिल्य व नरेन्द्र दुबे ने दिनांक 11/2/2005 को अथवा उसके पश्चात यह जानते हुये कि आरोपी तपन सरकार, मंगल सिंह, शैलेन्द्र ठाकुर, सत्येन माधवन, जयदीप, प्रभाष सिंह, बच्चा उर्फ जायद, अनिल शुक्ला, गुल्लू श्रीवास्तव, बिहारी उर्फ विनोद बिहारी, मुजीबुद्दीन, राजू खंजर, रंजीत सिंह, छोटू उर्फ कृष्णा, पिताम्बर साहू, गया उड़िया, बिज्जू उर्फ महेश यदू द्वारा हत्या एवं हत्या के प्रयत्न जैसा अपराध कारित किया गया है, उन्हें हत्या एवं हत्या के प्रयत्न के लिये दण्डनीय अपराध के दण्ड से बचाने के आशय से आर्थिक सहायता देकर या अपने घर में संश्रय देकर या वाहन मुहैया कराकर या अन्य रीति से आश्रय देकर भा0दं0सं0 की धारा 212 के दण्डनीय अपराध कारित किये?
6- क्या उक्त दिनांक समय व स्थान पर उक्त आरोपियों को जिन्हें गिरफ्तार किये जाने का आदेश दिया जा चुका था, या जो फरार घोषित किये जा चुके थे, उन्हे गिरफ्तारी से बचाने के आशय से उन्हें संश्रय दिया या छिपाया और क्या ऐसा करके भा0दं0सं0 की धारा 216 के तहत दण्डनीय अपराध कारित किया?
।। अवधारणीय प्रश्न क्रमांक 1 पर सकारण निष्कर्ष ।।
8- इस अवधारणीय प्रश्न के संबंध में आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने अधिक विवाद नही किया है। उन्होने मृतक महादेव महार की हत्या के संबंध में यह प्रतिरक्षा ली है कि मृतक महादेव महार दुर्ग जिले का नामचीन आपराधिक प्रकृति का व्यक्ति था, जिसे उसके दुश्मनों ने घटनास्थल सुभाष चौक के अतिरिक्त कहीं और मारकर उसके शव को सुभाष चौक में लाकर छोड़ दिये हैं। आरोपीगण के उक्त प्रतिरक्षा के संबंध में इस निर्णय में आगे उभयपक्ष के साक्ष्य की विवेचना कर निष्कर्ष दिया जावेगा। जहां तक मृतक महादेव महार की मृत्यु की प्रकृति का प्रश्न है, तो इस संबंध में अ0सा077 राकेश भट्ठ, अ0सा015 होलसिंह भुवाल एवं अ0सा010 डॉ0 जे.पी.मेश्राम का साक्ष्य अवलोकनीय है।
9- अ0सा077 राकेश भट्ठ ने मृतक के शव के पंचनामा की कार्यवाही प्रदर्श पी 2 अभिलिखित किया था, एवं उन्होंने मृतक के शव को पोस्टमार्टम हेतु प्रदर्श पी 33 की तहरीर अभिलिखित कर अ0सा015 होलसिंह भुवाल के माध्यम से जिला चिकित्सालय दुर्ग प्रेषित किया था। तब जिला चिकित्सालय दुर्ग के चिकित्सक अ0सा010 डॉ0 जे.पी.मेश्राम ने मृतक के शव का परीक्षण किया है। अ0सा010 डॉ0 जे.पी.मेश्राम ने मृतक के शव का परीक्षण घटना दिनांक 11/2/2005 को ही एक अन्य चिकित्सक डॉ0 एम0सी0 महनोद के साथ मिलकर किया था। उन्होने मृतक महादेव महार के मृत शरीर में निम्नलिखित चोटें पायी थी:-
फायर आर्म इंजूरी:-
1- फायर आर्म इंजूरी की मार्जिन इंवर्टेड ओवल आकार की थी एवं चोर्ड थी, जिसका साइज .1 से.मी. गुणित 3/4 से.मी. जो बोन डीप थी, जो राईट टेम्पोरल रीजन पर अपर पार्ट अप पिन्ना के 3 से.मी. इन्टीरीयर में थी, जो वुंड आफ एन्टरी थी।
2- मल्टीपल पिन हेड साइज के चारिंग मार्क्स, चमड़ी पर थे, जो 15 से 10 से.मी. चेहरे के बांयी तरफ, मेक्सिला में, फ्रन्टल रीजन में जो लेप्ट पिन्ना के सामने थी, जो लेप्ट साइड फेस को कवर कर रहे थे।
3- फायर आर्म इंजूरी - जो इवोर्टेड मार्जिन की, लेप्ट टेम्पोरल रीजन में 1.5 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित बोनडीप थी जिसमें ब्रेन मेटर दिख रहा था, जो 4 से.मी. अपर पार्ट आफ पिन्ना के मार्जिन चार्ज में थी, जो वुंड आफ एक्जिट था।
4- लेसरेटेड वुंड 3 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित थ्रू एण्ड थ्रू लेप्ट उपर ओठ पर।
5- लेसरेटेड वुंड 2 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित थ्रू एण्ड थ्रू, लोवर लिप के मिडिल पार्ट पर।
6- अपर इनसाइजर टूथ मिसिंग था, साकेट में ब्लड क्लाट था।
7- अपर इनसाइजर टूथ ढीला हो गया था।
8- इनसाइज्ड वुंड 15 से.मी. गुणित 2 से.मी. गुणित बोनडीप, वार्टिकली इन्टा पैराइटल रीजन पर।
9- इनसाइज्ड वुंड 10 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित बोनडीप वर्टिकली इन्टापैराइटल रीजन पर।
10- इनसाइज्ड वुंड 10 से.मी. गुणित 1.5 से.मी. गुणित 1 से.मी. टांसवर्सिली आक्सीपीटल रीजन के लोवर पार्ट पर।
11- इनसाइज्ड वुंड 6 से.मी. गुणित 1 से.मी. मसल्स डीप टांसर्विली इंजूरी नम्बर 10 के एकदम नीचे।
12- इनसाइज्ड वुंड 3 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित 1 से.मी., स्केपुला रीजन के लेप्ट अपर पार्ट पर।
13- इनसाइज्ड वुंड 10 से0मी0 गुणित 4 से0मी0 गुणित मसल डीप लेपट लोवर स्केपुला रीजन पर।
14- इनसाइज्ड वुंड 4 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित राईट स्केपुला रीजन पर अपर पार्ट
में मिडलाईन के समीप।
15- इनसाइज्ड वुंड 12 से.मी. गुणित 4 से.मी. गुणित 2 से.मी., वर्टिकली फोरेसिंक स्पाइन के राइट साईड में।
16- इनसाइज्ड वुंड 8 से.मी. गुणित 3 से.मी. गुणित 2 से.मी. राइट स्केपूलर रीजन पर।
17- इनसाइज्ड वुंड 4 से.मी. गुणित 1 से.मी. फोरेंसिक टवेल्व से एल 1 स्पाइन पर वर्टिकली।
18- इनसाइज्ड वुंड 4 से.मी. गुणित 0.5 से.मी. गुणित 0.5 से.मी. आब्लीकली राइट स्केपुलर रीजन के नीचे।
19- इनसाइज्ड वुंड 4 से.मी. गुणित 1 से.मी. गुणित 1 से.मी. इंजुरी नं0 18 के तीन से.मी. राइट साईड में।
20- इनसाइज्ड वुंड 10 से.मी. गुणित 3 से.मी. गुणित 2 से.मी. लंबर स्पाइन एल 3 से एल 5 के राइट साईड में।
21- इन्साइज्ड वुंड 9 से.मी. गुणित 2 से.मी. गुणित 1 से.मी. राइट इलियक रीजन पर।
इस प्रकार अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने मृतक महादेव महार के शरीर में कुल 21 चोटें पायी थी, जिसमें फायर आर्म इंजूरी भी थी।
10- अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 4 में ही आगे यह भी कथन किया है कि:-
1- उक्त सभी चोटों पर ब्लड क्लाट्स मौजुद थे।
2- बहुत सारे इरेगुलर फ्रेक्चर जो टेम्पोरल, पैराइटल और आक्सीपीटल बोन पर थे।
3- इंजुरी नम्बर 1 व 3 एक दूसरे से कम्युनिकेट कर रही थी, जिसमें ब्रेन मेटर का लेसरेशन दिख रहा था।
4- दो ओवल सेप छिद्र 1 से.मी. डायामीटर के, जो इंजुरी नम्बर 1 से 3 के बीच में जोड़ रहे थे। ब्रेन मेटर का लेसरेशन पैराइटल और आक्सीपीटल रीजन पर था।
5- लेप्ट साईड की 10 वी और 11 वी पसलियां टूटी हुई थी। लेफ्ट साईड में हीमोथोरेक्स मौजुद था।
इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 6 में कथन किया है कि मृतक के शरीर में आयी चोट क्रमांक 1, 2, 3 फायर आर्म से, चोट क्रमांक 4,5,6,7 हार्ड एवं ब्लन्ड आब्जेक्ट से, चोट क्रमांक 8 से 21 हार्ड एवं शार्प आब्जेक्ट से आयी थी। सभी चोटें एन्टीमार्टम नेचर की थी। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 9 में मृतक की मृत्यु के संबंध में यह अभिमत दिया है कि मृतक की मृत्यु का कारण शॉक और हेमरेज था, जो उपरोक्त बतायी गयी एन्टीमार्टम चोटों के कारण हुआ था, जिसके संबंध में उनकी रिपोर्ट प्रदर्श पी 34 है, जिसके अ से अ भाग पर उनके और ब से ब भाग में उसके साथी चिकित्सक एम.सी.महनोद के हस्ताक्षर है।

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 11 से 20)

 
11- इस संबंध में अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 11, 12 में पुलिस कांस्टेबिल हरखराम क्रमांक 1028 द्वारा लायी गयी लाठी और दांव का परीक्षण कर यह व्यक्त किया है कि प्रेषित लाठी से मृतक को आयी चोट क्रमांक 4 से 7 आ सकती है। इसी प्रकार उन्होने यह भी व्यक्त किया है कि प्रेषित दांव से मृतक को आयी चोट क्रमांक 8 से 21 आ सकती है। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य में चोट क्रमांक 4 से 21 को गम्भीर प्रकृति की चोट होना भी व्यक्त किया है। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 12 में यह भी व्यक्त किया है कि प्रेषित दांव से प्राणघातक चोट आना संभव है, जिसके संबंध में उनकी रिपोर्ट क्रमशः प्रदर्श पी 36 एवं 37 है। इस प्रकार अ0सा010 डॉ0जे0पी0मेश्राम ने मृतक का शव परीक्षण कर यह पाया कि मृतक को जो 21 चोटें उसकी मृत्यु के पहले आयी थी, उन्ही 21 चोटों के कारण उसे शॉक और हेमरेज हुआ और परिणाम स्वरूप उसकी मृत्यु हुई। इस प्रकार अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम के साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि मृतक की मृत्यु फायर आर्म, हार्ड व ब्लन्ट आब्जेक्ट एवं हार्ड एवं शार्प आब्जेक्ट से कारित की गयी चोटों के कारण हुई थी, जो कि हत्यात्मक प्रकृति की थी।
12- इस अवधारणीय प्रश्न पर निष्कर्ष दिये जाने हेतु मृतक महादेव का शव पंचनामा प्रदर्श पी 2 भी अवलोकनीय है, जिसके साक्षी अ0सा035 सदवन महार भी है। इस प्रदर्श पी 2 के शव पंचनामा में मृतक के सिर में दो जगह धारदार हथियार से चोट आने का और मुंह में चोट का निशान, पूरे मुंह में खुन और सिर के पास काफी खुन पड़े होने का उल्लेख है, जिससे भी यह प्रमाणित होता है कि मृतक की मृत्यु की प्रकृति हत्यात्मक थी। अतः स्पष्ट है कि अभियोजन अवधारणीय प्रश्न क्रमांक 1 को प्रमाणित करने में सफल हुआ है।
अवधारणीय प्रश्न क्रमांक 2 पर सकारण निष्कर्ष
13- इस अवधारणीय प्रश्न पर निष्कर्ष दिये जाने के पूर्व इस प्रकरण में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्य के प्रकार एवं आरोपीगण की प्रतिरक्षाओं का उल्लेख किया जाना आवश्यक है, ताकि इस अवधारणीय प्रश्न पर न्याय की मंशा के अनुरूप निष्कर्ष दिया जा सके। इस प्रकरण में अभियोजन ने उक्त अवधारणीय प्रश्नों को प्रमाणित करने हेतु निम्नानुसार साक्ष्य प्रस्तुत किया है:-
1- मृतक की हत्या के प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य।
2- प्रकरण के विवेचक द्वारा संकलित दस्तावेज एवं रासायनिक परीक्षण का साक्ष्य।
3- प्रकरण के विवेचक द्वारा संकलित इलेक्ट्निक साक्ष्य।
अब यह न्यायालय उक्तानुसार संकलित किये गये साक्ष्य की क्रमवार विवेचना की ओर अग्रसर हो रहा है।
प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य
14- प्रत्यक्षदर्शी साक्षी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा08 प्रशांत शर्मा एवं अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य के संबंध में आरोपीगण की यह प्रतिरक्षा है कि:-
1- उक्त सभी साक्षी पक्षद्राही हुये हैं। उक्त सभी साक्षियों (अ0सा01 को छोडकर) का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में हुआ था, लेकिन उक्त सभी साक्षियों ने अपने-अपने प्रतिपरीक्षण में यह स्वीकार किया है कि उन्होने घटना नही देखी है, उनके कलमबंद कथन के समय पुलिस वाले न्यायालय के बाहर खड़े थे और पुलिस के दबाव में उन्होंने न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में कथन किया था। अ0सा05 लिंगाराजू ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 व अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 13 में यह भी कथन किया है कि तारकेश्वर सिंह ने उन्हें बताया था कि महादेव की हत्या रात में किसी ने कर दी है। अतः सभी आरोपीगण के विद्वान अधिवक्ताओं की प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य के संबंध में यही प्रतिरक्षा है कि उक्त पक्षद्रोही साक्षियों के साक्ष्य मे किये गये कथनों के आधार पर आरोपीगण की दोषसिद्धी नही की जा सकती। इस संबंध में अ0सा08 प्रशांत शर्मा के साक्ष्य की कण्डिका 3,5,6,9, अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की कण्डिका 36, 37, 67 अ0सा05 लिंगाराजू के साक्ष्य की कण्डिका 2, 3, 5 अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की कण्डिका 12, 13 एवं 14 अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य की कण्डिका 4, 7 एवं 8 की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ठ किया है।
2- द्वितीय प्रतिरक्षा है कि जब उक्त साक्षी पक्षद्राही हो गये है और उन्होने न्यायिक मजिस्टेंट के समक्ष दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन पुलिस के दबाव में लेखबद्ध करना बताया है, तब उक्त प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य के दं.प्र.सं. की धारा 164 के तहत लिये गये कथन के आधार पर आरोपीगण की दोषसिद्धी नही की जा सकती। इस संबध में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन लेखबद्ध करने वाले न्यायिक मजिस्टेंट अ0सा059 रामजीवन देवांगन के साक्ष्य की कण्डिका 16, 21 में किये गये कथनों के आधार पर भी यह स्पष्ट है कि उक्त साक्षियों को पुलिस लेकर आयी थी, और उन्होने पुलिस के दबाव में कथन किया था।
3- तृतीय प्रतिरक्षा यह है कि दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन किसी साक्षी के आवेदन/निवेदन पर किसी भी मजिस्टेंट को लेखबद्ध करने की कोई अधिकारिता नही है। अतः इस प्रकरण में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अधिकारिता के अभाव में लिये गये कथन शून्य है। इस संबध में आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन के अधिवक्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय का न्यायदृष्टांत 1999 क्रिमनल लॉ जर्नल 3976, 1990 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्रमांक 385 (पी एण्ड एच), 2006 क्रिमनल लॉ जर्नल 4813 एवं 1998 (2) एमपीडब्ल्यूएन का न्यायदृष्टांत भी प्रस्तुत किया है।
15- जैसा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 में यह उल्लेखित है कि सर्वोत्तम साक्ष्य वही होता है, जो प्रत्यक्ष हो। इस प्रकरण में जैसा कि उपर उल्लेख किया जा चुका है, कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत अ0सा05 लिंगा राजू, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा09 गिरवर साहू ने स्वयं न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग अ0सा059 रामजीवन देवांगन के समक्ष उपस्थित होकर क्रमशः प्रदर्श पी 26, प्रदर्श पी 22, प्रदर्श पी 30 का कथन अभिलिखित करवाया था, जिसमें उन्होंने अभियोजन के मामले की पुष्टि की थी।
16- इस प्रकरण में अभियोजन की कहानी इस प्रकार है कि मृतक महादेव महार की हत्या की घटना को संतोष सिंह उर्फ धनजी, तारकेश्वर सिंह, चंदन साव, गिरवर साहू व लिंगा राजू नामक व्यक्तियों ने देखा था। अर्थात् स्पष्ट है कि अभियोजन ने इस प्रकरण में मृतक महादेव महार की हत्या की घटना को पांच अभियोजन साक्षियों द्वारा देखना बताया है। उक्त पांच अभियोजन साक्षियों में से चार साक्षी संतोष उर्फ धनजी, चंदन साव, गिरवर साहू व लिंगाराजू ने स्वयं दुर्ग न्यायालय के न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) के समक्ष उपस्थित होकर लिखित आवेदन दिया कि मृतक महादेव महार की हत्या के घटना के संबंध में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत उनका कथन लेखबद्ध किया जावे। अतः दुर्ग जिला न्यायालय के तात्कालीन न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) ने घटना दिनांक 11/2/2005 के छठवे दिन दिनांक 17/2/2005 को उक्त चारों प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन लेखबद्ध किया गया, जिसमें से संतोष सिंह उर्फ धनजी, साक्षी तारकेश्वर सिंह के पुत्र थे, जिसकी बाद में अन्य आरोपियों द्वारा हत्या कर दी गयी। अभियोजन ने तारकेश्वर सिंह को भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के रूप में संयोजित किया था, जिसका दं0प्र0सं0 की धारा 161 के तहत कथन लिपिबद्ध किया गया था, जो प्रदर्श डी 1 है।
17- अभियोजन द्वारा उक्त प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों को इस न्यायालय में भी साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा07 चंदन साव एवं अ0सा09 गिरवर साहू हैं। अतः सर्वप्रथम दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अभिलिखित किये गये कथन वाले साक्षी अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य का अवलोकन किया गया। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत उन तीनों साक्षियों से न्यायालय से अनुमति प्राप्त कर अभियोजन द्वारा सूचक प्रश्न जैसे प्रश्न पूछे गये हैं। अतः यह न्यायालय अब उक्त तीनों साक्षियों के साक्ष्य का पृथक-पृथक विवेचन कर यह निष्कर्ष दिये जाने की ओर अग्रसर हो रही है कि क्या उक्त तीनों साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय है, अथवा नही है, और यदि विश्वसनीय है तो क्यो ?
अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की विश्वसनीयता का परीक्षण
18- सर्वप्रथम अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य का अवलोकन किया गया। अ0सा07 चंदन साव ने अपने मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये सम्पूर्ण कथन का अक्षरशः समर्थन किया है। लेकिन आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने अ0सा07 चंदन साव का उसके मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को उसका प्रतिपरीक्षण नही किया गया, जिसका कारण आदेश पत्र दिनांक 2/8/2007 के अनुसार यह है कि साक्षी के प्रतिपरीक्षण से उनका बचाव खुल जावेगा। जबकि इसी दिनांक को अ0सा05 लिंगा राजू का परीक्षण व प्रति परीक्षण आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा किया गया है। बहरहाल, अ0सा07 चंदन साव का प्रतिपरीक्षण उसके मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 के दो माह 9 दिन विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005 बाद दिनांक 11/10/2007 को किया गया। तब अ0सा07 चंदन साव अपने प्रति परीक्षण दिनांक 11/10/2007 में अपने मुख्य परीक्षण में किये गये सम्पूर्ण कथन से मुकर गये एवं उन्होंने यह कथन किया है कि वह मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को पुलिस के अत्याधिक दबाव में थे। उन्होंने पुलिस के डराने धमकाने से दिनांक 2/8/2007 को पुलिस के बताये अनुसार न्यायालय में असत्य कथन दिया था। वास्तव में उन्होंने महादेव की हत्या होते नही देखा है। महादेव की हत्या किसने की, उसे किसने मारा, वह नही जानता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अ0सा07 चंदन साव अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को अपने प्रतिपरीक्षण में अस्वीकार कर दिया है। अतः अब यह न्यायालय अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य में किये गये सम्पूर्ण कथन की सूक्ष्म विवेचन कर यह निष्कर्ष दिये जाने हेतु अग्रसर हो रही है कि क्या अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों पर विश्वास किया जा सकता है?
19- अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 21, 22  में उसे न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) के न्यायालय में हुये बयान व आदेश पत्रिका की प्रतिलिपि दिखाकर पूछा गया तो उसने प्रदर्श पी 21, 22 व प्रदर्श पी 23 के अ से अ भाग में अपने हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है। इस साक्षी को प्रदर्श पी 22 का दं0प्र0सं0 की धारा 164 का बयान पढ़ने दिया गया, तब उसने पढ़कर व्यक्त किया है कि उसने ऐसा ही बयान न्यायिक मजिस्टेंट के न्यायालय में दिया था। लेकिन इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 14 एवं 25 में कथन है कि उसे महादेव की हत्या के बाद पुलिस वाले 5-7 दिन तक थाने में रखे थे और उसे एक बयान लिखकर दिये थे, और कहे थे कि ऐसा ही बयान मजिस्टेंट के समक्ष देना है। उसके 5-7 दिन बाद पुलिस वाले उसे न्यायिक मजिस्टेंट देवांगन साहब के न्यायालय में बयान देने के लिये लाये थे और कहे थे कि अगर ऐसा बयान नही दिये तो किसी केस में फंसा देंगे या एनकाउण्टर करवा देंगे। लेकिन प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि अ0सा07 चंदन साव ने पुलिस के दबाव की शिकायत तात्कालीन न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन से क्यों नही की । इस संबंध में अ0सा07 चंदन साव ने अपने प्रति परीक्षण की कण्डिका 25 में कथन किया है कि यह कहना सही है कि प्रदर्श पी 23 का आवेदन उसने स्वयं न्यायिक मजिस्टेंट श्री देवांगन के समक्ष प्रस्तुत किया था, लेकिन उसने न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन से प्रदर्श पी 22 का कथन करते समय एवं इस न्यायालय में दिनांक 2/8/2007 को बयान देते समय न्यायालय को यह नही बताया कि वह पुलिस दबाव में है।
20- अतः अ0सा07 चंदन साव के प्रतिपरीक्षण में किये गये कथन से यह स्पष्ट होता है कि अ0सा07 चंदन साव ने न तो न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन के समक्ष दिनांक 17/2/2005 को और न ही इस न्यायालय के समक्ष दिनांक 2/8/2007 को इस बात की शिकायत की कि वह पुलिस के दबाव में है। जबकि दं0प्र0सं0 की धारा 164 का कथन लेखबद्ध करते समय उसे न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन द्वारा यह भली-भांति समझाया गया था कि वह कथन करने के लिये बाध्य नही है, और उसने यह कथन स्वेच्छा से करना है। अतः अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन पर विश्वास करने का प्रथम कारण यह है कि अ0सा07 चंदन साव ने न तो दिनांक 2/8/2007 को इस न्यायालय में और न ही दिनांक 17/2/2005 को न्यायिक मजिस्टेंट के न्यायालय में इस तथ्य की कोई शिकायत नही किया कि वह पुलिस के दबाव में है।

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 21 से 30)

 
21- अ0सा07 चंदन साव का उसके मुख्य परीक्षण के दो माह नौ दिन बाद सर्वप्रथम आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा प्रति परीक्षण किया गया और जब इस साक्षी ने अपने प्रति परीक्षण में अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को अस्वीकार कर दिया तब इस न्यायालय के विशेष लोक अभियोजक ने अ0सा07 चंदन साव से सूचक प्रश्न जैसे प्रश्न पूछे हैं। अतः अ0सा07 चंदन साव का आरोपीगण के अधिवक्तागण द्वारा किये गये प्रतिपरीक्षण एवं इस न्यायालय के विशेष लोक अभियोजक द्वारा किये गये प्रति परीक्षण का अवलोकन किया गया। अ0सा07 चंदन साव का सर्वप्रथम प्रतिपरीक्षण आरोपी तपन सरकार एवं आरोपी सत्येन माधवन के अधिवक्ता श्री टी0सी0पंड्या द्वारा कियागया। इस प्रति परीक्षण में अ0सा07 चंदन साव ने आरोपीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री टी0सी0पंड्या द्वारा दिये गये दस सुझावों को लगातार सही होने का कथन किया है, जबकि इस साक्षी का जब विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रतिपरीक्षण किया गया तो इस साक्षी ने लगभग 18 बार दिये गये सुझावों को गलत होने का कथन किया है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि अ0सा07 चंदन साव को यह समझाया गया है कि आरोपीगण की ओर से जो भी सुझाव उसे दिया जावेगा, उसे वह सही होने का कथन करेगा, और विशेष लोक अभियोजक द्वारा जो सूझाव दिये जायेंगे उसे वह गलत बतायेगा। अतः अ0सा07 चंदन साव के प्रतिपरीक्षण में दिये गये सुझावों की स्वीकारोक्ति से भी यह प्रमाणित होता है कि अ0सा07 चंदन साव का उसके दं0प्र0सं0 की धारा 164 के बयान दिनांक 17/2/2005 और इस न्यायालय में हुये मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 के बाद आरोपीगण द्वारा Win Over किया गया है। अतः यह द्वितीय कारण है कि जिसके कारण अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन पर विश्वास किया जा सकता है।
22- अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य में यह स्वीकार किया है कि उसने अ0सा060 श्री रामजीवन देवांगन के समक्ष दं0प्र0सं0 की धारा 164 का कथन किया था। यह न्यायालय दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथन की इस विधि से पूर्णतः अवगत है कि दं0प्र0सं0 की धारा 164 एवं 161 के तहत लिये गये कथनों में मुख्य अंतर यह होता है कि दं0प्र0सं0 की धारा 161 के कथनों का उपयोग न्यायालय में किये गये साक्षियों के कथनों के (Contra-diction) के  लिये किया जाता है। लेकिन दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथनों का उपयोग साक्षियों के न्यायालय में किये गये कथनों के (Contra-diction) एवं समर्थन (Support) दोनों के लिये किया जा सकता है। अतः दं0प्र0सं0 की धारा 164 की उक्त विधिक स्थिति को दृष्टिगत रखते हुये अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन एवं उसके दं0प्र0सं0 की धारा 164 में लिये गये कथन प्रदर्श पी 22 का अवलोकन किया गया। प्रदर्श पी 22 का कथन दिनांक 17/2/2005 को हुआ था, जबकि लगभग दो वर्ष बाद दिनांक 2/8/2007 को अ0सा07 चंदन साव का मुख्य परीक्षण इस न्यायालय में हुआ है। लेकिन अ0सा07 चंदन साव ने अपने मुख्य परीक्षण में प्रदर्श पी 22 के कथनो का अक्षरशः समर्थन किया है। यह तभी संभव हो सकता है जब किसी साक्षी ने किसी गम्भीर घटना को स्वयं देखा हो। अतः अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में विश्वास करने का तृतीय कारण यह भी है कि अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन एवं दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथन प्रदर्श पी 22 में कोई भी विरोधाभाष नही है।
23- अ0सा07 चंदन साव का प्रति परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा इसलिये नही किया गया, क्योंकि उनके अनुसार आरोपीगण का बचाव खुल जावेगा। जबकि इसी दिन अभियोजन द्वारा अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली का प्रतिपरीक्षण किया गया है। अ0सा05 लिंगाराजू एवं अ0सा06 मुरली का परीक्षण 12.30 बजे दोपहर को प्रारम्भ किया गया और 2.00 बजे दोपहर को समाप्त हो गया था। चुंकि दोनों साक्षी पक्षद्रोही हुये थे, इसलिये आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा उनका प्रतिपरीक्षण कर लिया गया है। लेकिन अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण 2.40 से प्रारम्भ किया जाकर 3.10 बजे दोपहर को समाप्त हो गया था। लेकिन इस साक्षी का प्रति परीक्षण न्यायालय का समय होने के बाद भी आरोपीगण द्वारा नही किया गया। लेकिन दिनांक 11/10/2007 को अ0सा07 चंदन साव का प्रति परीक्षण किया गया, तब आरोपीगण की ओर से आरोपीगण की प्रतिरक्षा से संबंधित ऐसा कोई भी प्रश्न नही पुछा गया जो आरोपीगण की प्रतिरक्षा को खोलता हो। अतः यह चतुर्थ कारण है जिसके कारण अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों पर अविश्वास नही किया जा सकता है।
अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की विश्वसनीयता का परीक्षण
24- इसी प्रकार प्रकरण का द्वितीय प्रत्यक्षदर्शी साक्षी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह है। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने पुलिस को घटना दिनांक 11/2/2005 के ठीक दूसरे दिन 12/2/2005 को प्रदर्श डी 1 का पुलिस बयान दिया था, जिसमें उसने घटना दिनांक 11/2/2005 को घटना देखने की पुष्टि की थी। इस साक्षी का न्यायालय में परीक्षण दिनांक 17/4/2006 को हुआ और उस दिन इस साक्षी का आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा प्रतिपरीक्षण भी पूर्ण कर लिया गया। लेकिन इस प्रकरण के दो आरोपी जयदीप एवं अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू, अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मुख्य परीक्षण व प्रति परीक्षण दिनांक 27/4/2006 को फरार थे, जो अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के बाद गिरफ्तार किये गये। तब अ0सा07 तारकेश्वर सिंह को पुनः दिनांक 1/8/2008 को अर्थात् उसके साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के लगभग दो वर्ष बाद पुनः प्रतिपरीक्षण हेतु आहुत किया गया। तब आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से प्रश्नोत्तरी के रूप में उसका प्रतिपरीक्षण किया। जिसमें अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने मुख्य परीक्षण दिनांक 27/4/2006 को किये गये सम्पूर्ण कथन को अस्वीकार कर दिया। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 को अपने साक्ष्य की कण्डिका 36 से 38 में यह व्यक्त किया है कि ‘‘उसने महादेव की हत्या होते नही देखा, उसे क्राइम ब्राच दुर्ग के इंचार्ज राजीव शर्मा ने यह धमकी दिया था कि उसके पुत्र संतोष सिंह के मर्डर के केस को खराब कर देंगे और उसे भी अंदर कर देगे, इसीलिये उसने दिनांक 27/4/2006 को पुलिस के दबाव में बयान दिया था। उसके सामने जप्ती पत्र प्रदर्श पी 4 के अनुसार खोख की जप्ती नही हुई थी।‘‘ इसके बाद अ0सा01 तारकेश्वर सिंह को पक्षद्रोही साक्षी घोषित करवाकर दिनांक 17/10/2008 को विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रति परीक्षण किया गया, जिसका आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा पुनः दिनांक 24/11/2008 को प्रति परीक्षण किया गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का साक्ष्य कुल चार तिथियों में पूर्ण हुआ है।
25- उक्त स्थिति में प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास किया जावे अथवा न किया जावे ? इस प्रश्न के उत्तर के लिये अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की ‘‘सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक मूल्यांकन‘‘ की आवश्यकता है। अतः अब यह न्यायालय अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की ‘‘सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक मूल्यांकन‘‘ करने की ओर अग्रसर हो रहा है।
26- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का दिनांक 01/8/2008 को अर्थात् उसके साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के दो वर्षो बाद किया गया प्रति परीक्षण केवल आरोपी जयदीप एवं आरोपी अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव से संबंधित होना चाहिये था, लेकिन इस साक्षी के प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 के अवलोकन से यह विदित होता है कि इस साक्षी का प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 आरोपी जयदीप एवं आरोपी अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव तक सीमित नही था। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का प्रथम कारण यह है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 आरोपी जयदीप एवं अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव तक सीमित नही था। द्वितीय कारण यह भी है कि यदि किसी साक्षी का एक बार परीक्षण प्रतिपरीक्षण हो जाता है, उसके बाद उस साक्षी के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को ‘‘उस साक्षी का पूर्व कथन‘‘ नही माना जा सकता है। चुंकि पूर्व कथन नही माना जा सकता है, इसलिये अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 का उपयोग केवल आरोपी जयदीप सिंह एवं आरोपी अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू के लिये ही साक्ष्य के रूप में ग्राह्य हो सकता है, अन्य आरोपियों के संबंध में साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नही हो सकता है। इस संबंध में मिश्री लाल एवं अन्य विरूद्ध म0प्र0 राज्य एवं अन्य 2005 ए.आई.आर.एस.सी.डब्ल्यू. 2770 का पैरा 5 एवं 6 अवलोकनीय है:-
5. The learned Counsel for the appellants seriously attacked the evidence of PW2 Mokam Singh. This witness was examined by the Sessions Judge on 6-2-1991 and cross-examined on the same day by the defence counsel. Thereafter, it seems, that on behalf of the accused persons an application was filed and PW2 Mokam Singh was recalled. PW-2 was again examined and cross-examined on 31-7-1991. It may be noted that some of the persons who were allegedly involved in this incident were minors and their case was tried by the Juvenile Court. PW2 Mokam Singh was also examined
as a witness in the case before the Juvenile Court. In the Juvenile Court, he gave evidence to the effect that he was not aware of the persons who had attacked him and on hearing the voice of the assailants, he assumed that they were some Banjaras. Upon recalling, PW-2 Mokam Singh was confronted with the evidence he had given latter before the Juvenile Court on the basis of which the accused persons were acquitted of the charge under Section 307 IPC for having made an attempt on the life of this witness.
6. In our opinion, the procedure adopted by the Sessions Judge was not strictly in accordance with law. Once the witness was examined in-chief and cross-examined fully, such witness should not have been recalled and re- examined to deny the evidence he had already given before the court, even though that witness had given an inconsistent statement before any other court or forum subsequently. A witness could be confronted only with a previous statement made by him.At the time of examination of PW2 Mokam Singh on 6-2-2001, there was no such previous statement and the defence counsel did not confront him with any statement alleged to have been made previously. This witness must have given some other version before the Juvenile Court for extraneous reasons and he should not have been given a further opportunity at a later stage to completely efface the evidence already given by him under oath. The courts have to follow the procedures strictly and cannot allow a witness to escape the legal action for giving false evidence before the court on mere explanation that he had given it under the pressure of the police or some other reason. Whenever the witness speaks falsehood in the court, and it is proved satisfactorily, the court should take a serious action against such witnesses.
27- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर विश्वास करने का तृतीय कारण यह भी है कि पटवारी अ0सा013 सत्यनारायण कौशिक द्वारा बनाये गये प्रदर्श पी 3 के नक्शे के अनुसार लाल स्याही से चिन्हित स्थल पर मृतक महादेव महार का शव पड़ा था, जहां से अ0सा01 तारकेश्वर का मकान (नक्शे में क्रमांक 1 से चिन्हित है) मात्र तीन फूट की दूरी पर है। अतः स्पष्ट है कि अभियोजन के अनुसार मृतक महादेव महार की हत्या की घटना अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मकान के ठीक सामने हुई है। अतः ऐसी स्थिति में अ0सा01 तारकेश्वर सिंह घटना का स्वाभाविक साक्षी है। अतः स्वाभाविक साक्षी के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर अविश्वास नही किया जा सकता।
28- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर विश्वास करने का चतुर्थ कारण यह भी है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का पुलिस बयान प्रदर्श डी 1 घटना के ठीक दूसरे दिन दि0 12/2/2005 को लिया गया था। इस पुलिस बयान प्रदर्श डी 1 एवं इस साक्षी के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 में कोई भी महत्वपूर्ण विरोधाभाष या लोप नही है।
29- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से पक्षद्रोही घोषित होने के पश्चात विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रश्न किया गया है, तब अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 52 और 53 में यह स्वीकार किया है कि यह कहना सही है कि उसने क्राइम ब्रांच के इंचार्ज राजीव शर्मा के दबाव में दिनांक 27/4/2006 को बयान देने की शिकायत 47 विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005 पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी को अथवा शासन को नही किया। इस साक्षी का यह भी कथन है कि उसने दिनांक 1/8/2008 के पूर्व, व दिनांक 01/8/2008 को न्यायालय के समक्ष अपने पुनः परीक्षण के दौरान भी स्वतः होकर कोई शिकायत नही किया एवं किसी न्यायालय में परिवाद भी प्रस्तुत नही किया। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का पंचम कारण ऐसी किसी शिकायत का अभाव भी है।
30- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 को यह व्यक्त किया है कि उस पर क्राइम ब्रांच के राजीव शर्मा का यह दबाव था कि वह आरोपीगण के विरूद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करें, नही तो उसके पुत्र संतोष सिंह के मर्डर के केस को बिगाड़ देंगे। लेकिन इस साक्षी के पुत्र धनजी उर्फ संतोष का मर्डर दिनांक 2 मार्च 2005 को हुआ था, जिसकी स्वीकारोक्ति अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 46 में की है। अतः स्पष्ट है कि 2 मार्च 2005 को हुये हत्या के प्रकरण का अभियोग पत्र अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के पूर्व ही प्रस्तुत कर दिया गया होगा। अतः अभियोग पत्र प्रस्तुति के उपरान्त क्राइम ब्राच के इंचार्ज राजीव शर्मा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के पुत्र की हत्या के प्रकरण को कैसे बिगाड़ देंग, यह इस न्यायालय के समझ के परे है। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का छठवा कारण यह भी है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने दबाव का जो कारण बताया है, वह विश्वास के योग्य नही है। इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि जब विशेष लोक अभियोजक द्वारा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से उसके साक्ष्य की कण्डिका 48 में उसके पुत्र के हत्या के प्रकरण मे अभियोग पत्र प्रस्तुत करने की तिथि पूछी गयी तो उसने पहले तो नही बता सकने का कथन किया है और जब उसे दिनांक 24/5/2005 की तिथि बताकर प्रश्न किया गया तो इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 48 में व्यक्त किया है कि उसके पुत्र की हत्या का अभियोग पत्र दिनांक 24/5/2005 को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया होगा। अतः यदि दिनांक 24/05/2005 को अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के पुत्र की हत्या का अभियोगपत्र प्रस्तुत कर दिया गया है, तब इस साक्षी का इस न्यायालय में साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 को हुआ है, तब इस साक्षी के पुत्र की हत्या के प्रकरण को इंस्पेक्टर राजीव शर्मा द्वारा बिगाड़े जाने का प्रश्न ही उत्पन्न नही होता है।

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 31 से 40)

 
31- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 58 में कथन किया है कि उसके पुत्र धनजी के मर्डर के मामले में अपर सत्र न्यायाधीश श्री शर्मा के न्यायालय में उसका कथन हुआ है। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह की उक्त स्वीकारोक्ति को दृष्टिगत रखते हुये विशेष लोक अभियोजक द्वारा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के पुत्र की हत्या के मामले में पंजीबद्ध सत्र प्रकरण क्रमांक 122/05 में हुये इस साक्षी के बयान की कण्डिका 15, 16 दिखाकर कुल छः प्रश्न किये गये, तब इस साक्षी ने सभी छः प्रश्नों का उत्तर ‘‘मुझे आज याद नही है, कहकर दिया है‘‘ लेकिन जब इस साक्षी का प्रति परीक्षण आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा दिनांक 24/11/2008 को किया गया, तब इस साक्षी के साक्ष्य की कण्डिका 66 में उससे प्रश्न पुछा गया तब इस साक्षी का यह कथन है कि यह सही है कि उसने सत्र प्रकरण क्रमांक 122/05 की कण्डिका 16 में यह कथन दिया था कि महादेव महार हत्याकांड में वह, उसका लड़का संतोष उर्फ धनजी, गिरवर, चंदन साव, लिंगाराजू गवाह थे। लेकिन इस साक्षी का यह भी कथन है कि उसे उक्त तथ्य की व्यक्तिगत जानकारी नही थी, बल्कि उसने क्राइम ब्राच के इंचार्ज के बताये अनुसार उक्त बात बतायी थी।
32- उक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 58 में सत्र प्रकरण क्रमांक 122/05 में हुये उसके स्वयं के बयान प्रदर्श पी 34 से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर ‘‘याद नही होन‘‘ का कथन करके दिया है। लेकिन इसी साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 66 में प्रथम तो यह स्वीकार कर लिया है कि उसने प्रदर्श पी 34 के बयान की कण्डिका 16 का बयान दिया था। लेकिन स्वयं यह भी कहता है कि उसे व्यक्तिगत जानकारी नही है। यह व्यक्तिगत जानकारी नही होने की बात प्रदर्श पी 34 के बयान में नही है। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 व 24/11/2008 पर विश्वास नही किया जा सकता है। इस साक्षी का आचरण ऐसा नही है कि उसके प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 व 24/11/2008 पर विश्वास किया जावे।
33- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008, 17/10/2008 व 24/11/2008 पर विश्वास नही किये जाने का आठवां कारण इस साक्षी के साक्ष्य की कण्डिका 61, 62 और 63 में किया गया कथन है। इस साक्षी ने उक्त कण्डिकाओं में यह स्वीकार किया है कि उसके पास 12 बोर की बंदुक है, उसके बाद भी उसने रिवाल्वर के लिये आवेदन दिया था और रिवाल्वर के लायसेंस के लिये कलेक्टर के समक्ष समर्थन में शपथ दिया था। इस साक्षी को उसके शपथ पत्र की कण्डिका 14 में लिये गये शपथ को दिखाकर पूछा गया, तब इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 63 में यह स्वीकार किया है कि उसने कलेक्टर के समक्ष रिवाल्वर के लायसेंस के लिये प्रस्तुत आवेदन के समर्थन में शपथपत्र प्रस्तुत किया था, जिसकी कण्डिका 14 में यह लिखा था कि ‘‘वह महादेव महार मर्डर केस का चश्मदीद गवाह है, जिसके कारण उनके विरोधी पक्ष का दबाव हमेशा उसके उपर बना रहता है, जिसके कारण उसे अपने तथा अपने परिवार की सुरक्षा के लिये रिवाल्वर लायसेंस की आवश्यकता है।‘‘ अ0सा01 तारकेश्वर सिंह द्वारा रिवाल्वर लायसेंस प्राप्त करने के लिये जो आवेदन दिया गया था, उसके मूल नस्ती को छत्तीसगढ़ शासन गृह मंत्रालय में सहायक ग्रेड 1 के पद पर पदस्थ अ0सा072 शिवकुमार गोड़ ने लाकर प्रस्तुत किया है, जिसमें जिला मजिस्टेंट की अनुशंसा प्रदर्श पी 140 है, जिसकी प्रतिलिपि प्रदर्श पी 140 सी, तारकेश्वर सिंह द्वारा दिया गया आवेदन प्रदर्श पी 141, प्रतिलिपि प्रदर्श पी 141 सी, मूल शपथपत्र प्रदर्श पी 142, प्रतिलिपि प्रदर्श पी 142 सी और मूल नस्ती जो कुल 52 पन्नों में है, प्रदर्श पी 143 प्रतिलिपि प्रदर्श पी 143 सी है। इसी प्रकार अ0सा073 ऐनकसिंह ध्रुव ने भी जिला मजिस्टेंट कार्यालय में दिये गये लायसेंस के आवेदन से संबंधित नस्ती को लाकर प्रस्तुत किया है, जो प्रदर्श पी 144 है, जिसकी प्रतिलिपि प्रदर्श पी 144 सी है। अतः उक्त समस्त दस्तावेजो का अवलोकन किया गया, जो कि क्रमशः आवेदन पत्र, फार्म ए, शपथपत्र एवं सम्पूर्ण नस्ती है, जिसमें अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का बयान प्रदर्श पी 144 सी भी संलग्न है।
34- इस प्रदर्श पी 144 सी के बयान में भी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने जिला मजिस्टेंट के न्यायालय में यह बयान दिया था कि वह तपन सरकार के विरूद्ध महादेव महार हत्याकाण्ड में मुख्य गवाह है, जिसके कारण तपन सरकार और उसके ग्रुप द्वारा उसे और उसके परिवार को हमेशा डराया और धमकाया जाता है, जिससे वह भयभीत है और उसे अपने परिवार की सुरक्षा हेतु रिवाल्वर की आवश्यकता है। इस प्रकार इस साक्षी ने कलेक्टर दुर्ग के समक्ष जो रिवाल्वर के लायसेंस के आवेदन के समर्थन में जो शपथपत्र प्रस्तुत किया था, उसमें भी चश्मदीद गवाह होने के तथ्य को स्वीकार किया है और यह भी स्वीकार किया है कि उस पर विरोधी पक्ष का दबाव है। अतः अ0सा01 तारकेश्वर के साक्ष्य की कण्डिका 60 से लेकर 63 तक पुछे गये उक्त प्रश्न के उत्तर से भी यही प्रमाणित होता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने आरोपीगण के डर या दबाव के कारण अपने प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008, 17/8/2008, 24/11/2008 का बयान दिया है, जो विश्वास के योग्य नही है।
35- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य के अनुसार उसे क्राइम ब्रांच के इंचार्ज राजीव शर्मा ने डराया था कि वह दिनांक 27/4/2006 को अभियोजन के पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करें। लेकिन इस प्रकरण में तात्कालीन क्राइम ब्रांच के इंचार्ज अ0सा071 राजीव शर्मा ने देवरी थाना के पास आरोपी तपन से एक क्वालिस वाहन क्रमांक पी.बी. 46 सी. /4318 एवं उसके दस्तावेज जप्ती पत्र प्रदर्श पी 110 के अनुसार जप्त कर आरोपी तपन एवं जप्तशुदा वाहन व दस्तावेज थाना सुपेला के सुपुर्द किया था। इसके अतिरिक्त अ0सा071 राजीव शर्मा ने इस प्रकरण में कोई अन्य कार्यवाही नही की है। अतः ऐसी स्थिति में यह समझ के परे है कि अ0सा071 राजीव शर्मा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह को क्यो उक्त अनुसार दबाव देंगे, जबकि अ0सा071 राजीव शर्मा की न तो मृतक महादेव से कोई मित्रता या रिश्तेदारी है, और न ही उनकी आरोपीगण से कोई शत्रुता है एवं उन्होंने प्रकरण में कोई विवेचना भी नही की है।
36- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मुख्य परीक्षण दिनांक 27/4/2009 पर विश्वास करने का नवम कारण यह है कि अ0सा071 राजीव शर्मा से उनके प्रतिपरीक्षण में आरोपी सत्येन माधवन एवं तपन सरकार के विद्वान अधिवक्ता द्वारा इस आशय का एक भी सुझाव नही दिया गया है कि उन्होंने अ0सा01 तारकेश्वर सिंह को दिनांक 27/4/2006 के पहले न्यायालय में अभियोजन के पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये डराया या यह कहकर धमकाया था कि वह उसके पुत्र धनजी के मर्डर के केस को बिगाड़ देगा।
37- उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 में किये गये कथन (परीक्षण एवं प्रतिपरीक्षण मिलाकर) एवं अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण दिनांक 02/8/2007 को किया गया कथन उक्त उल्लेखित सभी कारणों से विश्वास के योग्य है। आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने इस न्यायालय के समक्ष यह भी तर्क प्रस्तुत किया है कि कोई भी न्यायालय साक्षियों के साक्ष्य मे किये गये कुछ कथनों को सत्य और कुछ कथनों को असत्य मानकर आरोपीगण के विरूद्ध निष्कर्ष नही दे सकते हैं, लेकिन आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण का उक्त तर्क स्वीकार योग्य नही है, क्योंकि ‘‘भारत में यह सिद्धान्त लागू नही है कि यदि कोई साक्षी एक तथ्य में मिथ्या है, तो वह सभी तथ्य में मिथ्या होगा।‘‘ अतः उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 एवं अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण दिनांक 02/8/2007 का कथन पूर्णतः विश्वसनीय है। जबकि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रतिपरीक्षण दिनांक 01/8/2008, 17/10/2008, 24/11/2008 उन्हें डराकर या धमकाकर या Win Over करके दिलवाया गया है। सुक्ति Falsus in uno, falsus in omnibus भारत में लागू नही होने के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के निम्न न्यायदृष्टांत अवलोकनीय है:-
1- Kulwinder Singh v. State of Punjab, (2007) 10 SCC 455, 2- Ganesh v. State of Karnataka, (2008) 17 SCC 152, 3- Jayaseelan v. State of Tamil Nadu, (2009) 12 SCC 275, 4- Mani @ Udattu Man and Ors. v. State represented by Inspector of Police, (2009) 12 SCC 288 and 5- Balraje @ Trimbak v. State of Maharashtra, (2010) 6 SCC 673).
38- अतः उक्त स्थिति में सर्वप्रथम निम्न विधिक प्रश्न उत्पन्न होता है कि:-
1- दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत किसी साक्षी का कथन लेखबद्ध करने का अधिकार किसी मजिस्टेंट को है या नही है ?
2- यदि कोई साक्षी न्यायालय में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन से मुकर जाता है तो क्या मजिस्टेंट के समक्ष हुये दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन का उपयोग आरोपीगण की दोषसिद्धी के लिये किया जा सकता है ?
3- पक्षद्राही साक्षियों के साक्ष्य का क्या साक्ष्यिक मूल्य होता है?
4- यदि कोई साक्षी अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों का कतिपय अंतराल के बाद प्रतिपरीक्षण होने पर, मुख्य परीक्षण के कथनों से मुकर जाता है तो ऐसे साक्षी के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों का क्या साक्ष्यिक मूल्य होता है?
इस संबंध में आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत न्यायदृष्टांत 1999 क्रिमनल लॉ जर्नल 3976 का अवलोकन किया गया। लेकिन इस न्यायदृष्टांत में अजनबी व्यक्तियों ने न्यायालय से सम्पर्क किया था कि उनका साक्ष्य लिया जावे, तब माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह अवलोकित किया था कि यदि अजनबी व्यक्तियों के लिए मजिस्टेंट का न्यायालय खोल दिया जाए तब मजिस्टेंट के समक्ष बहुत से ऐसे व्यक्ति साक्ष्य देने हेतु उपस्थित होने लगेंगे जो आरोपी के द्वारा प्रायोजित होगे। वर्तमान में पास्को एक्ट में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत साक्षियों के कथन लेखबद्ध किये जाने का प्रावधान भी किया गया है। जबकि इस प्रकरण में अ0सा059 रामजीवन देवांगन ने घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिपिबद्ध किया है। वस्तुतः प्रस्तुत न्याय दृष्टांत में माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रकरण के तथ्य और परिस्थितियों के तहत यह अभिनिर्धारित किया है कि किसी मजिस्टेंट को दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत साक्षियों का कथन लेखबद्ध करने की अधिकारिता नही है। अतः प्रस्तुत न्यायदृष्टांत 1999 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज 3976 का कोई लाभ तथ्य एवं परिस्थितियों की भिन्नता के कारण आरोपीगण को नही दिया जा सकता है।
39- अब यह न्यायालय इस निर्णय की कण्डिका 46 में उल्लेखित उक्त चारों प्रश्नों के उत्तरों को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो रहा है।
विधिक प्रश्न क्रमांक 1 और 2 का उत्तर
40- दं0प्र0सं0 की धारा 164 के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय का न्यायदृष्टांत RAMPRASAD VS. STATE OF MAHARASHTRA [1999 CRI.L.J. 2889 (SC)]  में माननीय उच्चतम न्यायालय ने पैरा 15 में
यह अवलोकित किया है कि:-
"15. Be that as it may, the question is whether the Court could treat it as an item of evidence for any purpose. Section 157 of the Evidence Act permits proof of any former statement made by a witness relating to the same fact before any authority legally competent to investigate the fact but its use is limited to corroboration of the testimony of such a witness. Though a police officer is legally competent to investigate, any statement made to him during such an investigation cannot be used to
corroborate the testimony of a witness because of the clear interdict contained in Section 162 of the Code. But a statement made to a Magistrate is not affected by the prohibition contained in the said section. A Magistrate can record the statement of a person as provided in Section 164 of the Code and such a statement would either be elevated to the status of Section 32 if the maker of the statement subsequently dies or it would remain within the realm of what it was originally. A statement recorded by a Magistrate under Section 164 becomes usable to corroborate the witness as provided in Section 157 of the Evidence Act or to contradict him as provided in Section 155 thereof."

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 41 से 50)

 
41. इसी प्रकार माननीय आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने न्यायदृष्टांत In GURUVINDAPALLI ANNA RAO VS. STATE OF A.P. [2003 CRI.L.J. 3253],  ने यह अभिनिर्धारित किया है कि:-
that since the previous statement of a witness under Section 164 Cr.P.C., has been recorded by a Magistrate, it is a public document, the Magistrate need not be summoned and examined as a witness.
माननीय आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा 7 में यह अवलोकित किया है कि:-
"7.We would like to put one more discrepancy on record, viz., that while recording evidence, the learned II Additional Sessions Judge had summoned the I Additional Munsif Magistrate, Tenali (PW.10) to prove the statement of P.W.1 recorded by him under Section 164 Cr.P.C. This Court has already ruled if any Magistrate records the statement of a witness under Section 164 Cr.P.C, it is not necessary for the Sessions Judges to summon that Magistrate to prove the contents of the statement recorded by him. This Court has already ruled that when a Magistrate, discharging his official functions as such, records the statement of any witness under Section 164 Cr.P.C, such statement is a 'public document' and it does not require any formal proof. Moreover, it is seen that the learned II Additional Sessions Judge, Guntur, while recording the evidence of the I Additional Munsif Magistrate, Tenali (PW.10), has exhibited the statement of P.W.1 recorded by the Magistrate as Ex.P.10. As a matter of fact, such statement cannot be treated as a substantive piece of evidence. Such statement can be made use of by the prosecution for the purpose of corroboration, or by the defence for contradiction, under Section 145 of the Evidence Act. Therefore, the II Additional Sessions Judge, Guntur, is directed to note the provisions contained in Section 145 of the Evidence Act. Even if a statement is recorded by a Magistrate, it is not a substantive piece of evidence, but it is only a previous statement."
इसी प्रकार माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायदृष्टांत RAM LAKHAN SHEO CHARAN AND OTHERS VS. STATE OF U.P. [1991 CRI.L.J. 2790]  में ऐसी स्थिति में जबकि कोई साक्षी अपने साक्ष्य में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन से मुकर जाता है, तब यह अभिनिर्धारित किया है कि:-
"12.The trial was held when the new Code of Criminal Procedure had come into force. The wordings of Section 164 in the new and old Code of Criminal Procedure with little changes are the same. As early as in Manik Gazi v. Emperor, AIR 1942 Cal 36 : (1942) 43 Cri LJ 277 a Division Bench of the Calcutta High Court had held that the statements Under Section 164 of the Code can be used only to corroborate or contradict the statements made Under Sections 145 and 157 of the Indian Evidence Act. In Brij Bhushan Singh Vs. Emperor, AIR 1946 PC 38 and in Mamand v. Emperor, AIR 1946 PC 45 : (1946) 47 Cri LJ 344) the Privy Council had observed that the statement Under Section 164 of the Code cannot be used as a substantive evidence and which can only be used to contradict and corroborate the statement of a witness given in the Court. Similar observations, as made in the two cases below, were made by the Privy Council, in Bhuboni Sahu v. King, AIR 1949 PC 257 : (1949) 50 Cri LJ 872) and in Bhagi v. Crown, 1950 Cri LJ 1004 : (AIR (37) 1950 HP 35). It was also held by a single Bench of the Himachal Pradesh Judicial Commissioner's court that statement Under Section 164 of Code cannot be used as a substantive piece of evidence. In State v. Hotey Khan, 1960 ALJ 642 : (1960 Cri LJ 1167). A division Bench of this Court had also observed that statements Under Section 164 of the Code cannot be used as a substantive evidence.
अतः माननीय उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के उक्त न्यायदृष्टांतों में अभिनिर्धारित की गयी विधि से प्रश्न क्रमांक 1 और 2 का यह उत्तर है कि इस प्रकरण में भी जो साक्षी दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन से न्यायालय में मुकर गये हैं, उनके दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन के आधार पर आरोपीगण की दोषसिद्धी नही की जा सकती है। लेकिन जिन साक्षियों ने न्यायालय में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथनों की पुष्टि अपने साक्ष्य में की है, तब दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत किये गये कथन का प्रयोग साक्षियों के साक्ष्य में किये गये कथनों के समर्थन में भी किया जा सकता है।
विधिक प्रश्न क्रमांक 3 का उत्तर
43- जहां तक पक्षद्रोही साक्षियों के साक्ष्य में किये गये कथनों की ग्राह्यता का प्रश्न है तो इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के निम्नलिखित न्यायदृष्टांत अवलोकनीय है:-
1- STATE OF U.P. VS. RAMESH PRASAD MISRA [1996 (10) SCC 360], that evidence of a hostile witness would not be totally rejected if spoken in favour of the prosecution or accused. But, it requires to be subjected to close scrutiny and that portion of evidence which is consistent with the
case of the prosecution or defence can be relied upon.
2- Balu Sonba Shinde v. State of Maharashtra [2002 (7) SCC 543], Gagan Kanojia v. State of Punjab [2006 (13) SCC 516]; Radha Mohan Singh v. State of U.P.[2006 (2) SCC 450], Sarvesh Narain Shukla v. Daroga Singh[2007 (13) SCC 360] and Subbu Singh v. State[2009 (6) SCC 462].
83. Thus, the law can be summarised to the effect that the evidence of a hostile witness cannot be discarded as a whole, and relevant parts thereof which are admissible in law, can be used by the prosecution or the defence.
3-इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत C. Muniappan v. State of T.N.[2010 (9) SCC 567] (SCC p. 596, para 83) and Himanshu v. State (NCT of Delhi)[(2011 (2) SCC 36.]" भी अवलोकनीय है।
विधिक प्रश्न क्रमांक 4 का उत्तर
44- अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि यदि कोई साक्षी अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को मुख्य परीक्षण के बाद हुये प्रतिपरीक्षण में अस्वीकार कर देता है तो क्या उसके मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों का अवलम्ब अभियोजन के समर्थन में लिया जा सकता है। इस प्रश्न का उत्तर माननीय उच्चतम न्यायालय ने क्रिमनल अपील क्रमांक 554/12 ‘‘विनोद कुमार बनाम पंजाब राज्य‘‘ निर्णय दिनांक 21 जनवरी 2015 में दिया है। यह न्यायदृष्टांत भ्रष्टाचार अधिनियम से संबंधित अपराध से संबंधित है। इस न्यायदृष्टांत में अ0सा05 शिकायतकर्ता था, जो साक्ष्य में पूर्णतः पक्षद्रोही हो गया। अ0सा07 जगदीश वर्मा ने अपने मुख्यपरीक्षण में अभियोजन के मामले का पूर्णतया समर्थन किया लेकिन प्रतिपरीक्षण में उसने मुख्यपरीक्षण में किये गये कथनों से मुकर गया। अ0सा01 एवं अ0सा04 औपचारिक साक्षी थे, अ0सा08 पुलिस अधिकारी था, जिसने रेड की थी। तब विचारण न्यायालय एवं माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने प्रार्थी एवं अ0सा07 जगदीश वर्मा के पक्षद्रोही होने के बाद भी आरोपी को दोषसिद्ध किया था, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय में प्रश्नाकिंत किया गया था। तब माननीय उच्चतम न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा की गयी दोषसिद्धी को स्थिर रखते हुये अपने निर्णय के पैरा 40 के प्रथम भाग में यह अवलोकित किया कि:-
40. Reading the evidence in entirety, his evidence  cannot be brushed aside. The delay in cross- examination has resulted in his pre-varication from the examination-in-chief. But, a significant one, his examination-in-chief and the re-examination impels us to accept the testimony that he had gone into the octroi post and had witnessed about the demand and acceptance of money by the accused. In his cross- examination he has stated that he had not gone with Baj Singh to the vigilance department at any time and no recovery was made in his presence. The said part of the testimony, in our considered view, does not commend acceptance in the backdrop of entire evidence in examination-in-chief and the re-examination. The evidence of PW6 and PW7 have got corroboration from PW8. He in all material particulars has stated about the documents recovery and proven pertaining the phenolphthalein powder. 
45- इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत रमेशभाई मोहनभाई कोली बनाम स्टेट आफ गुजरात पेज 442 के पैरा 7 और 8 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह अवलोकित किया है कि:-
7. In the instant case, all the eye-witnesses examined on the prosecution side have en bloc turned hostile due to influence and pressure of the accused persons which included a sitting MLA of the ruling party. This aspect has been analyzed by the trial Court while convicting and awarding sentence on the accused/appellants. This Court has noted and observed in a large number of cases that witnesses may lie but circumstances do not. On going through the entire materials, particularly, the chain of circumstances, we are satisfied that the prosecution has been successful in bringing home the guilt of the appellants herein for the commission of murder of Prakashbhai Raveshia and the eye-witnesses turning hostile, do not, in any manner, crate a dent in the case of the prosecution.
8.It is settled legal proposition that the evidence of a prosecution witness cannot be rejected in toto merely because the prosecution chose to treat him as hostile and cross-examine him. The evidence of such witnesses cannot be treated as effaced or washed off the record altogether but the same can be accepted to the extent that their version is found to be dependable on a careful scrutiny thereof. (vide Bhagwan Singh v. The State of Haryana, AIR 1976 SC 202; Rabindra Kumar Dey v. State of Orissa, AIR 1977 SC 170; Syad Akbar v. State of Karnataka, AIR 1979 SC 1848 and Khujji @ Surendra Tiwari v. State of Madhya Pradesh, AIR 1991 SC 1853. -
46- इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय का न्यायदृष्टांत स्टेट आफ एम.पी. बनाम बद्री यादव एवं अन्य 2006 क्रिमनल लॉ जर्नल 2128 के पैरा 5 से 11 अवलोकनीय है:-
5. The facts of this case illustrate a disquieting feature as to how the High Court has committed a grave miscarriage of justice in recording the acquittal of the respondents.
6. Few dates wouldsuffice. PW-8 Mohd. Amin and P.W.9 Zakir Ali's statements were recorded under Section 164, Cr. P.C. before the Magistrate on 21-9-1989. On 18-12-1990 their statements on oath were recorded before the Trial Court as prosecution witnesses.
7. It appears that PW-8 and PW-9 filed an affidavit on 16-8-1994 that the statements made before the Magistrate by them were under pressure, tutored by police of Madhav Nagar and due to their pressure the statements were recorded. It was further stated that the policemen threatened them that if they did not make statements as tutored by the police they would implicate PW-8 and PW-9 in this case and when the statements were recorded before the Magistrate the policemen were standing outside and, therefore, the statements were made as tutored by the police and due to threat and coercion. By this affidavit they have completely resiled from their previous statements recorded before the court as prosecution witnesses. They further stated that they did not see any marpeet and who had inflicted injuries. They further denied that they did not see any incident at all nor any person. Though the affidavit appeared to be dated 16-8-1994, it was actually signed by both on 17-8-1994.
8. In the affidavit of Zakir Ali PW-9 dated 17-8-1994 it is also stated that his statement was recorded on 18-12-1990 before the Sessions Judge. The affidavit further stated that the statement recorded on 18-12-1990 was made due to threat and under the pressure of police. It is further stated that the applicant was going for Haj and according to the religious rites, he wanted to bid good-bye to all the sins he had committed. It is further stated that the statements he made before the Court of Magistrate and before the Sessions Judge were false. It is unfortunate that the said application was allowed by the Sessions Judge on 9-2-1995 and they were allowed to be examined as defence witnesses juxtaposed as DW-1 and DW-2. The Sessions Judge, however, on examining the credibility of PW-8 and PW-9 juxtaposed as DW-1 and DW- 2 rejected it as not trustworthy, in our view rightly.
9. The Sessions Judge came to a finding that the statements of DW-1 and DW-2 were recorded under Section 164, Cr. P.C. before the Magistrate on 21-9-1989 as PW-8 and PW-9. Thereafter, their statements were recorded before the Sessions Judge on 18-12-1990 and after four years on 17-7-1995 they gave a different version resiling from their previous statements on grounds of threat, coercion and being tutored by the police. It will be noticed that in between 18-12-1990 the day on which their statements were recorded before the Sessions Judge as PWs and their statements as defence witnesses which were recorded on 17-7-1995 as DWs, no complaint whatsoever was made by DW-1 and DW-2 to any Court or to any authority that they gave statements on 18-12-1990 due to coercion, threat or being tutored by the police. This itself could have been a sufficient circumstance to disbelieve the subsequent statements as DW-1 and DW-2 as held by the Sessions Judge, in our view, rightly.
10. The High Court, while reversing the order of conviction recorded by the Sessions Judge gave the following reasons in support of the reversal in paragraph 16 as under: -
"This case has focused a very strange phenomenon before us. The witnesses were examined initially as prosecution witnesses. The trial was not completed within short span of time. It lingered on for about five years. After lapse of five years these witnesses stated in favour of the accused and against the prosecution. The question arises whether the prosecutor in charge of the prosecution was vigilant enough to see that all prosecution witnesses are examined within reasonable time span, so as to see that the case is completed within that time span. The question arises whether the court was vigilant enough to see that the trial is conducted day-by- day system. The both answers would be negative. Unfortunately, the Sessions Trial was not conducted day- by-day. The prosecution witnesses were not produced by making them to remain present for day-by-day trial. The adjournments were sought by defence and they were also granted liberally. All this resulted in strange situation where those two witnesses stated something as prosecution witnesses and after lapse of sufficient time, they appeared before the court and gave the evidence as defence witnesses and stated against the prosecution."
11. In our view, the reasoning recorded by the High Court, itself would have been sufficient to reject the testimony of DW-1 and DW-2. However, having said so the High Court reversed the order of conviction and recorded the order of acquittal, which is perverse.
47- इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत गुड्डराम बनाम स्टेट आफ हिमाचल प्रदश 2013 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्रमांक 481 का पैरा 22, 23 अवलोकनीय है, जिसमें एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी साक्षी पक्षद्राही हो गया था और उसने अपने मुख्यपरीक्षण में घटना को देखना बताया है और प्रतिपरीक्षण में पक्षद्रोही होते हुये यह कहा कि वह पांच फीट गढ्ढे में गिर गया था, उसने आरोपी गुड्डू को मृतक दिलीप सिंह को चोट पहुंचाते नही देखा। तब माननीय उच्चतम न्यायालय ने घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के मुख्य परीक्षण के कथन एवं प्रतिपरीक्षण के कथन का उल्लेख पैरा 22 में करते हुये पैरा 23 में यह उल्लेख किये थे कि पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य को पूर्णतः अस्वीकार नही करना चाहिये। इस न्यायदृष्टांत में भी आरोपी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया था।
48- इसी प्रकार न्यायदृष्टांत निसार खान उर्फ गुड्डू बनाम स्टेट आफ उत्तरांचल 2006- LAW (SC) -1-57  में भी परीक्षण प्रतिपरीक्षण के एक वर्ष बाद आरोपीगण द्वारा साक्षी को विनओवर करके अपने पक्ष में कथन दिलवाये थे। इस न्यायदृष्टांत में अभियोजन साक्षी क्रमांक 1 और 2 प्रत्यक्षदर्शी साक्षी थे, जिन्हें परीक्षण प्रतिपरीक्षण कर दिनांक 4/1/2001 को उन्मुक्त कर दिया गया था, वे पुनः दिनांक 7/1/2002 को बुलाये गये, उनका पुनः प्रति परीक्षण आरोपीगण द्वारा किया गया, तब वे पक्षद्रोही हो गये एवं अपने पूर्व में किये गये कथनों को अस्वीकार कर दिये। तब माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा 9 में यह उल्लेख किया था कि:-
It clearly appears that the eye-witnesses were won over by threat or intimidation after more than 1 year of there examination and cross examination and ultimately when the eye-witnesses were won over by the accused they were recalled and re- examined on 7-1-2002 --------------- Naturally, by the time the eye-witnesses were recalled they were  won over either by money, by muscle power by threats or intimidation 
49- इसी प्रकार माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत अकील उर्फ जावेद बनाम स्टेट आफ एन.सी.टी. आफ देहली (2013) क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्र0 571 में भी साक्षी अ0सा020 का प्रतिपरीक्षण दिनांक 18/9/2000 को स्थगित किया गया था, उसके बाद अ0सा020 का प्रतिपरीक्षण दिनांक 18/11/2000 को हुआ। तब अपने प्रतिपरीक्षण में अ0सा020 पक्षद्रोही हो गयी और कहा कि उसने अपीलार्थी/आरोपी को इंस्पेक्टर राजेन्द्र गौतम के कहने से पहचाना था, जो मुख्य परीक्षण के दिन उससे मिले थे। तब माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि न्यायालय के समक्ष कोई भी स्वीकार करने वाला विधिक साक्ष्य नही है। इस न्यायदृष्टांत में माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी अ0सा020 के मुख्यपरीक्षण पर विश्वास किया था।
50- इसी प्रकार माननीय उच्चतम न्यायालय ने याकूब इस्माईल भाई पटेल विरूद्ध स्टेट आफ गुजरात एआईआर 2004 एससी 4209 के पैरा 37, 40 एवं 41 अवलोकनीय है, जो इस प्रकार है:-
37.The testimony of PW-2, in our view, is wholly believable and worthy of inspiring confidence but is also sufficient by itself to prove the case against the appellant and that the credibility of this witness has not been impaired in the cross-examination by the appellant. This witness has stuck to his police statement and the subsequent examination-in-chief in Court where he identified the appellant accused as well as the co-accused as the assailants of the deceased. This deposition, in our view, proved the intention of the accused to cause the  death of the deceased inasmuch as he deposes that the  assault was directed at the neck of the deceased. It is also  not the case of the appellant that this witness was  inimical to the appellant or that there was a reason for  PW-2 to implicate the appellants falsely. The factum of  his friendship with the deceased does not reduce PW-2 to the position of being an interested witness. 40.Significantly this witness, later on filed an affidavit  wherein he had sworn to the fact that whatever he had  deposed before Court as PW-1 was not true and it was so  done at the instance of Police. 41.The averments in the affidavits are rightly rejected by  the High Court and also the Sessions Court. Once the  witness is examined as a prosecution witness, he cannot  be allowed to perjure himself by resiling from testimony  given in Court on oath. It is pertinent to note that during  the intervening period between giving of evidence as PW-1 and filing of affidavit in Court later he was in jail in a narcotic case and that the accused persons were also fellow inmates there. 
अतः स्पष्ट है कि इस प्रकरण में विधिक प्रश्न क्रमांक 4 का उत्तर यह है कि यदि कोई साक्षी अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों का कतिपय अंतराल के बाद प्रतिपरीक्षण किये जाने पर, मुख्य परीक्षण के कथनों से मुकर जाता है, तो ऐसे साक्षी के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों की सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक विवेचना के पश्चात विश्वास किया जा सकता है। 

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 51 से 60)

 
0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की विवेचना 
51- इस न्यायालय इस निर्णय की उपर की कण्डिकाओं में अ0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन सिंह के साक्ष्य एवं मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों की विश्वसनीयता का सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक परीक्षण कर यह निष्कर्ष दिया जा चुका है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का दिनांक 27/4/2006 को लिया गया साक्ष्य एवं अ0सा07 चंदन साव का दिनांक 2/8/2007 को लिया गया मुख्य परीक्षण विश्वास के योग्य है। अतः उक्त दोनों साक्षियों के साक्ष्य का अवलोकन किया गया। सर्वप्रथम अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की कण्डिका 2 और 3 का अवलोकन किया गया।
52- अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 में कथन किया है कि दिनांक 11/2/2005 को ‘‘6 से 6.30 बजे के लगभग‘‘ वह अपने घर से निकलकर सुभाष चौक सुपेला गया था, वहां पर पहले से महादेव पहलवान, गुड्डा और गिरवर खड़े थे (इस साक्षी ने अभियोजन साक्षी गुड्डा, गिरवर के घटनास्थल पर खड़े होने की पुष्टि की है), तब उसने पुछा कि क्या कर रहे हो, तब वे लोग बोले कि क्लब जा रहे हैं। वे लोग आपस में बात कर रहे थे, उसी समय कल्लू की घर की तरफ से दो बाइक और चैम्पियन मिनीडोर आकर रूकी, एक बाइक से बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, छोटू उर्फ कृष्णा तथा दूसरी बाइक से गोल्डी व पिताम्बर उतरे। चैम्पियन मिनीडोर से तपन सरकार, मंगल सिंह, प्रभाष सिंह, गोविन्द विश्वकर्मा (मृत), राजू खंजर, अनिल शुक्ला, बिज्जू, सत्येन माधवन, शैलन्द्र ठाकुर, बच्चा उर्फ अब्दुल जायद, रंजीत सिंह उतरे। इस साक्षी का इसी कण्डिका में यह भी कथन है कि मृत आरोपी गोविन्द विश्वकर्मा गाली देते हुये पास में आया और महादेव पहलवान के सिर में खुखरी से वार किया, जिससे महादेव पहलवान तारकेश्वर के घर के पास गिर पड़ा। उसके बाद आरोपी तपन सरकार, मंगलसिंह, प्रभाष सिंह, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, बच्चा उर्फ अब्दुल जायद, सत्येन माधवन और राजू खंजर ये लोग कट्टा पिस्टल लेकर महादेव पहलवान, जो गिरा पड़ा था, की ओर दौड़े और महादेव को गोली मारने लगे। बाकी गोल्डी, पिताम्बर, छोटू उर्फ कृष्णा, मंगल सिंह, अनिल शुक्ला, बिज्जू, रंजीत सिंह, सत्येन माधवन उनकी ओर दौड़े, जो सभी तलवार, डण्डा, राड, नारियल कांटने का औजार, कट्टा, पिस्टल रखे हुये थे और फायर करते हुये और गाली बकते हुये उनकी ओर दौड़े, तो वे डर के कारण वहां से भाग गये और मुरली के घर के पास छिप गये।
53- अ0सा07 चंदन साव का अपने साक्ष्य की कण्डिका 3 में कथन है कि मुरली के घर के पास से दस मिनट बाद घटनास्थल पर आये, तो देखे कि महादेव पहलवान खुन से लथपथ चित्त हालत में तारकेश्वर सिंह के घर के पास गिरा पड़ा था, उसकी मृत्यु हो चुकी थी। उसके थोड़ी देर बाद पुलिस घटनास्थल पर आ गयी। इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 4 में यह भी कथन है कि घटना के संबंध में उन्होंने न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, श्री देवांगन के न्यायालय में बयान भी दिया था।
54- अ0सा07 चंदन साव का प्रतिपरीक्षण केवल आरोपी तपन और आरोपी सत्येन माधवन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा किया गया है, शेष आरोपीगण के अधिवक्ताओं ने इस साक्षी से कोई भी प्रश्न नही किया है। आरोपी तपन सरकार और सत्येन माधवन के विद्वान अधिवक्ता ने इस साक्षी का जो प्रति परीक्षण किया है उसमें उक्त अभिकथित तथ्यों के संबध में कोई भी प्रश्न नही पुछा है, बल्कि वे इस साक्षी से यही प्रश्न करते रहे कि उसने अपने मुख्य परीक्षण के कथन पुलिस के दबाव में कहे है। चुंकि यह न्यायालय अ0सा07 चंदन साव के ‘‘पुलिस दबाव‘‘ के कथन को विश्वास के योग्य नही पाया है। अतः स्पष्ट है कि अ0सा07 चंदन साव ने अपने मुख्य परीक्षण में जो भी कथन किया है, वह प्रति परीक्षण के अभाव में अखण्डित रहा है। इसके अतिरिक्त अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किया गया कथन केवल आरोपी बिज्जू, शैलेन्द्र ठाकुर व आरोपी रंजीत सिंह को एवं बाईक से उतरने वाले छोटू उर्फ कृष्णा व पिताम्बर को छोड़कर शेष के संबंध में ठीक वैसा ही है, जैसा उन्होने अ0सा059 रामजीवन देवांगन के समक्ष प्रदर्श पी 22 का दिया था। इस प्रकरण में अभियोजन द्वारा आरोपी पिताम्बर, आरोपी छोटू उर्फ कृष्णा एवं आरोपी बिज्जू उर्फ महेश यादव की पहचान की कार्यवाही साक्षियों से करवायी गयी है, जिसके संबंध में प्रस्तुत साक्ष्य का विवेचन इस निर्णय में उचित अवसर पर किया जावेगा। जहां तक अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य में किये गये कथन का प्रश्न है तो अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 और 3 में अभियोजन के मामले को प्रमाणित किया है। लेकिन अभी तक यह निष्कर्ष दिया जाना शेष है कि मृतक महादेव की हत्या में अ0सा07 चंदन साव द्वारा उल्लेखित उक्त सभी आरोपियों की संलिप्तता है या किसी आरोपी की संलिप्तता नही है, इसका विवेचन भी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों के विवेचन के बाद किया जावेगा।
55- अ0सा01 तारकेश्वर सिह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 में कथन किया है कि वह प्रतिदिन सुबह घुमने जाता है और वह सुभाष चौक में रहता है। इस साक्षी का यह भी कथन है कि महादेव, गिरवर, गुड्डा, चंदन साव (इस साक्षी ने भी गिरवर, गुड्डा, चंदन साव की घटनास्थल पर उपस्थिती को प्रमाणित किया है) ये चारों सुभाष चौक में खड़े थे, तब वह घुमने गया था, उसी समय उसने देखा कि प्रभाष सिंह, मंगल सिंह, तपन, सत्येन, गुल्लु श्रीवास्तव, गोविन्द विश्वकर्मा, बेनी चौधरी, बच्चा और इनके साथ आठ-दस आदमी और थे, वे टेम्पो समान एक गाड़ी व मोटर सायकल से आये और आकर महादेव को मां-बहन की गाली देने लगे।
56- अ0सा01 तारकेश्वर का अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 में कथन है कि गोविन्द विश्वकर्मा (मृत) ने महादेव को उसके सिर में कटार मारा, तब महादेव गिर गया, फिर तपन, सत्येन, मंगल पिस्टल से फायर किये। तब उसने आवाज दिया कि मत मारो, मत मारो, तब आरोपी तपन ने उसके सिर में पिस्टल लगा दिया तो वह चुप हो गया। उसका लिंगा, गिरवर, चंदन का मकान सुभाष चौक में है, उसका लड़का संतोष सिंह (जिसका मर्डर हो गया है) उसके मकान के उपर मंजिल में चढ़ा था, तब वह नीचे आया, तो उसने अपने पुत्र को आवाज दिया कि भाग बेटा भाग, तो वह घर में चला गया। उस समय गिरवर (अ0सा09), लिंगा (अ0सा05) व चंदन (अ0सा07) भी वहां से भाग गये और फिर मौके पर पुलिस आ गयी, लेकिन पुलिस के आने के पहले आरोपीगण मौके से भाग गये।
57- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रति परीक्षण किया गया है,तब अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण की विभिन्न कण्डिकाओं में पुनः अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 में बताये गये आरोपीगण की अभियोजित अपराध में संलिप्तता की पुष्टि की है। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण में कथन किया है कि उसके रूकने के तुरन्त बाद आरोपीगण आये थे। यह कहना सही है कि जो आरोपीगण मौके पर आना बताया है, वे सभी गाली देते हुये आ रहे थे। यह सही है कि उसने चार लोगों के हाथ में पिस्टल, रिवाल्वर, माउजर देखा था। आरोपी तपन माउजर रखा था, पिस्टल मंगल, सत्येन और प्रभाष के पास था। यह सही है कि चारों आरोपीगण ने महादेव के सिर में पिस्टल मारे थे और आरोपी तपन ने उसके (साक्षी के) सिर में पिस्टल टिकाया था। दो-चार-पांच मिनट के अंदर पूरी घटना हो गयी। इस साक्षी का अपने प्रति परीक्षण की कण्डिका 11 में यह भी कथन है कि मौके पर पिस्टल चलने से काफी आवाजें आयी थी। इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 18 में कथन है कि पुलिस महादेव को गोली मारने के 15-20 मिनट बाद आयी थी (तात्पर्य यह है कि घटनास्थल पर पुलिस घटना के तुरन्त बाद पहुंची थी)। यह कहना सही है कि मौके पर बहुत सारा खुन बहा था (तात्पर्य यह है कि घटनास्थल सुभाष चौक ही है)। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 22 में घटना के दूसरे दिन बयान लिये जाने का कारण बताते हुये कथन किया है कि उसका पुलिस बयान घटना के दूसरे दिन हुआ था, उस दिन नही हो पाया क्योंकि उस दिन माहौल खराब था।
58- उक्त विवेचन से स्पष्ट यह होता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मुख्य परीक्षण में किया गया कथन का खण्डन उसके उसी दिन किये गये प्रतिपरीक्षण में नही होता है, बल्कि प्रति परीक्षण में भी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने उक्तानुसार कतिपय तथ्यों की पुष्टि की है। यद्यपि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने पुलिस बयान प्रदर्श डी 1 में अपने सिर में आरोपी तपन द्वारा पिस्तौल रखकर धमकी देने, अपना मकान तिमंजिला होने, आरोपी तपन द्वारा गाली देने की बात नही बताया है, लेकिन उक्त लोप महत्वपूर्ण प्रकृति का नही है, जो अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य में किये गये कथन के जड़ को प्रभावित करता हो। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने सम्पूर्ण घटना देखी है और उसने यह भी प्रमाणित किया है कि घटनास्थल सुभाष चौक है।
59- का उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह प्रतिपरीक्षण दिनांक 01/8/2008, 17/10/2008 व 24/11/2008 एवं अ0सा07 चंदन साव का प्रति परीक्षण में उक्तानुसार जो भी कथन किये हैं, वे विश्वास के योग्य नही है, बल्कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किये गये उक्त साक्ष्य से जिसका उक्तानुसार सुक्ष्मता से एवं सावधानीपूर्वक विवेचन किया गया है, जिससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन साव ने अपने-अपने प्रतिपरीक्षण में आरोपीगण के डर या भय के कारण अथवा उनके द्वारा जीत (Win over)  लिये जाने के कारण उक्तानुसार कथन किये हैं। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह अपने मुख्य परीक्षण एवं प्रति परीक्षण दिनांक 27/4/2006 में अडिग रहा है, बल्कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रतिपरीक्षण दिनांक 27/4/2006 में अभियोजन के मामले को प्रमाणित किया है। जहां तक अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली, अ0सा08 प्रशांत शर्मा उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा, अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य में किये गये कथनों का प्रश्न है, तो अभी तक इस न्यायालय ने उनके साक्ष्य का विवेचन नही किया है, लेकिन जहां तक अ0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य में किये गये कथनों का प्रश्न है तो उसके संबंध में इस न्यायालय का स्पष्ट निष्कर्ष है कि उक्त दोनों साक्षी घटना दिनांक 11/2/2005 को भी मृतक महादेव महार की घाटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी हैं, उनके घटनास्थल के पास ही घर है, वे घटना दिनांक को घटना समय में मार्निंग वॉक में निकले थे। अतः वे स्वाभाविक साक्षी भी हैं। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य के संबध में आरोपीगण की प्रतिरक्षा क्रमांक 1, 2 एवं 3 स्वीकार योग्य नही है। अतः अस्वीकार की जाती है।
60- जहां तक अ0सा05 लिंगा राजू, अ0सा06 मुरली, अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा व अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य का प्रश्न है तो इस संबंध में यह उल्लेखनीय है कि अ0सा059 राम जीवन देवांगन ने दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा08 प्रशांत शर्मा व अ0सा09 गिरवर साहू का कथन लेखबद्ध किया था। यद्यपि अ0सा059 रामजीवन देवांगन ने अपने साक्ष्य में इस तथ्य की पुष्टि किये हैं कि उन्होंने उक्त तीनों साक्षियों का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन लेखबद्ध किया था, जो कि अ0सा05 लिंगाराजू का प्रदर्श पी 12, अ0सा08 प्रशांत शर्मा का प्रदर्श पी 18 व अ0सा09 गिरवर साहू का प्रदर्श पी 30 है, तथापि अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा08 प्रशांत शर्मा एवं अ0सा09 गिरवर साहू ने अपने-अपने साक्ष्य में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अभिलिखित किये गये कथन प्रदर्श पी 12, प्रदर्श पी 18 एवं प्रदर्श पी 30 के संबंध में यह कथन है कि कथन के समय पुलिस वाले न्यायालय के बाहर खड़े थे और उन्होंने दबाववश बयान दिया था। इस संबंध में अ0सा08 प्रशांत शर्मा के साक्ष्य की कण्डिका 3, 6, 9 अवलोकनीय है, जबकि अ0सा05 लिंगाराजू के साक्ष्य की कण्डिका 3, 5, 6 अवलोकनीय है। उक्त सभी साक्षियों ने अपने-अपने साक्ष्य में स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी होने से भी इंकार किया है। चुकि वे सभी साक्षी पक्षद्रोही भी हुये हैं और जब विशेष लोक अभियोजक द्वारा उनसे प्रतिपरीक्षण में प्रश्न पुछा गया तो उन्होंने अपने-अपने साक्ष्य में यह तो स्वीकार किया है कि उन्होंने अ0सा059 रामजीवन देवांगन, न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में कथन किया था, लेकिन वह पुलिस के दबाव में दिये थे।

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149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी